भारत आ रहे LNG वाहक जहाज 'दिशा' ने पार किया होर्मुज, फारस की खाड़ी में फंसे अन्य 34 जहाजों की जगी उम्मीद
पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक शांति समझौते की घोषणा के बाद वैश्विक समुद्री व्यापारिक मार्गों पर लगे गतिरोध टूटने शुरू हो गए हैं। सोमवार को भारत आ रहे एक एलएनजी (LNG) वाहक जहाज 'दिशा' के होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित गुजरने के बाद फारस की खाड़ी में फंसे 34 अन्य भारतीय और विदेशी झंडे वाले जहाजों के घरेलू बंदरगाहों तक सुरक्षित और तेजी से पहुंचने की उम्मीद काफी बढ़ गई है।
यह राहत ऐसे समय में मिली है जब दोनों देशों ने लंबे समय से जारी नाकेबंदी को हटाने के फैसले पर अंतिम मुहर लगाई है। इस बड़े कूटनीतिक बदलाव से भारत के ऊर्जा और कृषि क्षेत्र से जुड़े नीति निर्माताओं ने भी राहत की सांस ली है।
जहाजरानी और उर्वरक मंत्रालय ने जारी किया जहाजों का पूरा विवरण
जहाजरानी मंत्रालय के निदेशक ओपेश कुमार शर्मा ने बताया कि 62,370 टन एलएनजी कार्गो लेकर आ रहा 'दिशा' जहाज होर्मुज के सबसे संवेदनशील घेरे को पार कर चुका है और इस जहाज के संभावित तौर पर आगामी 18 जून को गुजरात के दाहेज बंदरगाह पर पहुंचने की पूरी उम्मीद है। इसके साथ ही उर्वरक विभाग की संयुक्त सचिव वंदना प्रेयशी ने बताया कि इस
जलमार्ग में मौजूद कुल 16 उर्वरक जहाजों की रवानगी का रास्ता भी साफ हो गया है। इन 16 जहाजों में से 8 जहाज यूरिया, 4 जहाज डाई-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), 3 जहाज सल्फर और 1 जहाज अमोनिया लेकर भारत के लिए रवाना हो रहे हैं, जिससे घरेलू स्तर पर कृषि तत्वों की कमी को दूर किया जा सकेगा।
कतर और यूएई के गैस प्लांटों को हुआ भारी नुकसान
समुद्री मार्ग के खुलने से जहां एक तरफ जहाजों की रवानगी शुरू हो गई है, वहीं दूसरी तरफ पश्चिम एशिया के बुनियादी ढांचे को पहुंचे नुकसान ने भारतीय नीति निर्माताओं की चिंता को अभी भी बरकरार रखा है। संघर्ष के दौरान संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के हबशान गैस प्लांट को भारी नुकसान पहुंचा था, जिससे वहां का सामान्य परिचालन पूरी तरह बाधित हो गया है।
हालांकि वहां के अधिकारियों का दावा है कि प्लांट की 60 फीसदी क्षमता को बहाल कर लिया गया है और साल 2026 के अंत तक 80 फीसदी रिकवरी के साथ 2027 तक ढांचागत रूप से पूर्ण बहाली की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त, भारत को दीर्घकालिक गैस आपूर्ति करने वाले मुख्य केंद्र कतरएनर्जी की 'रास लाफान' सुविधा के लिक्विफाइड नेचुरल गैस प्रोसेसिंग यूनिट्स को भी तगड़ी चोट पहुंची है, जिससे उसकी लगभग 17 फीसदी उत्पादन क्षमता फिलहाल पूरी तरह समाप्त हो गई है।
पश्चिम एशिया पर भारत की निर्भरता और ऊर्जा संकट का विमर्श
इस समझौते के बाद भी भारत आशंकित है क्योंकि कतर जैसे केंद्रों को हुए भारी नुकसान के कारण सामान्य आपूर्ति को दोबारा पटरी पर लौटने में लंबा समय लग सकता है। अगर भारत के आयात ढांचे को देखें तो इस संघर्ष से पहले भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का 88 फीसदी से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता था, जिसका लगभग आधा हिस्सा अकेले पश्चिम एशिया के देशों से आता था।
इसके अलावा भारत की 60 फीसदी से अधिक आयातित एलएनजी और एलपीजी की आवश्यकताओं की आपूर्ति भी इसी होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती थी, जिसमें से एलपीजी का लगभग 90 फीसदी हिस्सा इसी रूट पर निर्भर था। वर्तमान में खाड़ी में फंसे शेष जहाजों में से 15 जहाज केवल कच्चा तेल, एलएनजी और एलपीजी से लदे हुए हैं, जिन्हें जल्द से जल्द भारतीय बंदरगाहों पर उतारने के लिए सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर काम कर रही हैं।
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