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Explainer: इतना शक्तिशाली है G7 समिट, 8वीं बार PM मोदी होंगे शामिल, आखिर रूस और चीन क्यों नहीं इसके सदस्य?

Explainer: इंटरनेशनल पॉलिटिक्स और कूटनीति में जी7 शिखर सम्मेलन की चर्चाएं इन दिनों जोरों पर हैं. जी7 समिट 2026 में प्रधानमंत्री मोदी भी शामिल होंगे. इस बार फ्रांस इस समिट की मेजबानी कर रहा है. वैसे तो भारत इस ग्रुप का सदस्य नहीं है लेकिन पीएम मोदी फ्रांसीसी राष्ट्रपति के न्योते पर इस कार्यक्रम में शामिल हो रहे हैं. समिट में दुनिया की सबसे विकसित अर्थव्यवस्थाओं के नेता वैश्विक अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्त और जियो-पॉलिटिकल चुनौतियों जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा करेंगे. 

जी7 समिट के दौरान, हर बार एक सवाल आता है कि आखिर ये क्या है. दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन और सैन्य महाशक्ति रूस इसमें शामिल क्यों नहीं है. आइए समझते हैं आसान भाषा में…

क्या है G7 समिट?

G7 का पूरा नाम "ग्रुप ऑफ सेवन" है. ये दुनिया की सात सबसे विकसित और औद्योगिक लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्थाओं का एक अनौपचारिक लेकिन बेहद प्रभावशाली ग्रुप है. सदस्य देशों के अलावा यूरोपीय संघ भी बैठकों में शामिल होता है. हालांकि, वह आधिकारिक सदस्य नहीं है. बता दें, ये जी7 कोई संधि आधारित संस्था नहीं है. ये दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक मुद्दों पर साझा रणनीति तैयार करती है. 

G7 के सदस्य देश हैं...

  1. अमेरिका
  2. ब्रिटेन
  3. फ्रांस
  4. जर्मनी
  5. इटली
  6. जापान
  7. कनाडा

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G7 की शुरुआत कैसे हुई?

साल 1975 में G7 की स्थापना हुई थी. उस वक्त पूरी दुनिया तेल संकट, बढ़ती महंगाई, आर्थिक मंदी और वैश्विक वित्तीय अस्थिरता जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही थी. इन्हीं समस्याओं का समाधान खोजने के लिए फ्रांस ने ब्रिटेन, अमेरिका, इटली, जापान और पश्चिम जर्मनी को एक मंच पर बुलाया. यहीं से जी-6 की शुरुआत हुई. इसके एक साल बाद कनाडा भी इसमें शामिल हो गया और जी-6 एक साल बाद जी-7 बन गया. 1976 से सदस्य देशों के शीर्ष नेता हर साल शिखर सम्मेलन के जरिए एक मंच पर आते हैं और वैश्विक चुनौतियों पर चर्चा करते हैं.

समय के साथ कैसे बदला G7 का एजेंडा?

शुरुआती दौर में G7 का मुख्य फोकस सिर्फ आर्थिक मुद्दों पर था. बदलती दुनिया के साथ इसके एजेंडे का दायरा भी बढ़ता गया. आज G7 विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करता है, जिनमें वैश्विक अर्थव्यवस्था, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर सुरक्षा, रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व संकट और वैश्विक व्यापार सहित अन्य विषय शामिल हैं. जी7 अब सिर्फ आर्थिक मंच नहीं है बल्कि वैश्विक रणनीतिक नीति निर्धारण का प्रमुख मंच बन गया है. 

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आखिर कितना ताकतवर है G7?

G7 में वैसे तो महज सात देश शामिल हैं, लेकिन इनका वैश्विक प्रभाव बहुत बड़ा है. सातोें देश दुनिया की सबसे बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाएं हैं. साथ ही सदस्य देश अत्याधुनिक तकनीक, विशाल निवेश क्षमता, मजबूत सैन्य शक्ति और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं पर प्रभाव जैसी विशेषताओं से लैस है. दुनिया के अहम आर्थिक और रणनीतिक फैसलों पर जी7 सदस्यों का प्रभाव साफ दिखाई देता है.  

क्या G7 की ताकत अब भी पहले जैसी ही है?

वैश्विक आर्थिक शक्ति का संतुलन पिछले दो दशकों में तेजी से बदला है. चीन, भारत, ब्राजील, इंडोनेशिया और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने तेजी से विकास किया है. एक समय ऐसा भी था, जब वैश्विक जीडीपी का अधिकांश हिस्सा जी7 सदस्य देशों के पास ही थी लेकिन उनके हिस्से में अब गिरावट जरूर हुई है. तमाम चुुनौतियों के बावजूद वैश्विक निवेश, रक्षा सहयोग, तकनीकी नवाचार और कूटनीतिक प्रभाव के मामले में जी7 अब भी दुनिया का सबसे प्रभावशाली समूह माना जाता है. 

क्यों G7 से बाहर हुआ रूस?

खास बात है कि रूस भी एक वक्त में जी7 का हिस्सा था. साल 1998 में रूस इस ग्रुप में शामिल हो गया है, जिस वजह से जी7 का नाम जी8 हो गया था. इसके बाद 2014 में रूस ने यूक्रेन के क्रीमिया पर कब्जा कर लिया था. अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन सहित अन्य पश्चिमी देशों ने उसका कड़ा विरोध किया. पश्चिमी देशों का आरोप है कि रूस ने इंटरनेशनल नियमों और यूक्रेन की संप्रभुता का उल्लंघन किया है. इस वजह से रूस की सदस्यता रद्द कर दी गई और जी-8 दोबारा जी-7 बन गया था. 2022 में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से रूस की वापसी की संभावनाएं करीब समाप्त हो गईं.

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क्यों G7 में शामिल नहीं है चीन?

अब सवाल है कि आखिर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बाद भी चीन जी7 का सदस्य क्यों नहीं है? इसकी बहुत सारी वजहें हैं. जैसे…

G7 खुद को विकसित लोकतांत्रिक देशों का समूह मानता है. चीन एकदलीय राजनीति व्यवस्था वाला देश है, जिस वजह से पश्चिमी देश उसे पूर्ण लोकतंत्र नहीं मानते हैं.

जब G7 की स्थापना हुई थी, तब चीन की अर्थव्यवस्था आज जैसी शक्तिशाली नहीं थी. उस समय चीन वैश्विक आर्थिक व्यवस्था का प्रमुख खिलाड़ी नहीं था।

चीन और G7 देशों के बीच कई मुद्दों पर गंभीर मतभेद हैं, जिनमें ताइवान विवाद, दक्षिण चीन सागर, मानवाधिकार मुद्दे, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और वैश्विक व्यापार नियम शामिल है. चीन को इन्हीं वजहों से सदस्यता देने पर कोई सहमति नहीं बन पाई.

फिर हर बार भारत को क्यों बुलाया जा रहा है?

बता दें, भारत G7 का सदस्य नहीं है. बावजूद इसके पिछले आठ वर्षों से लगातार भारत विशेष आमंत्रित देश के रूप में शामिल हो रहा है. इसकी बहुत सारी वजहें हैं…

  1. भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है.
  2. भारत वैश्विक दक्षिण (Global South) की मजबूत आवाज माना जाता है.
  3. भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है.
  4. जलवायु, ऊर्जा और तकनीकी सहयोग में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है.

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Patna Coaching Row: जेल से छूटते ही रौशन आनंद का बड़ा बयान, खान सर पर लगाया भाई को जान से मारने का आरोप

Patna Coaching Row:  पटना के चर्चित कोचिंग सेंटर विवाद ने एक बार फिर नया मोड़ ले लिया है.  ज्ञान विंदु कोचिंग के संचालक रौशन आनंद को जेल से रिहा होने के बाद जमानत मिल गई है, लेकिन बाहर आते ही उन्होंने ऐसे आरोप लगाए हैं, जिसने पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है. रौशन आनंद ने अपने भाई प्रिंस यादव की मौत को हत्या बताते हुए मशहूर शिक्षक फैजल खान उर्फ खान सर और एक कारोबारी पर गंभीर आरोप लगाए हैं.

रौशन आनंद के इस बयान के बाद बिहार की शिक्षा और राजनीतिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है. वहीं पुलिस और जांच एजेंसियों पर भी मामले की निष्पक्ष जांच का दबाव बढ़ गया है.

12 दिन बाद मिली जमानत

रौशन आनंद को पटना के चर्चित कोचिंग सेंटर विवाद में गिरफ्तार किया गया था. उन पर खान ग्लोबल स्टडीज से जुड़े विवाद में साजिश रचने और एक सुरक्षा गार्ड के साथ मारपीट करने का आरोप लगाया गया था. पटना सिविल कोर्ट में उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई हुई, जहां दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने उन्हें राहत दे दी. इससे पहले दो बार उनकी जमानत पर सुनवाई टल चुकी थी। आखिरकार 12 दिन जेल में रहने के बाद उन्हें रिहाई मिल गई.

भाई की मौत को बताया हत्या

जेल से बाहर आते ही रौशन आनंद ने अपने भाई प्रिंस यादव की मौत को लेकर बड़ा दावा किया. उन्होंने कहा कि यह कोई सामान्य मौत नहीं बल्कि सुनियोजित हत्या है. मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जब तक वह जेल से बाहर थे, तब तक उनके भाई को कोई खतरा नहीं था. लेकिन जैसे ही उन्हें जेल भेजा गया, उनके भाई की मौत हो गई. उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे बड़ी साजिश हो सकती है.

हालांकि अभी तक उनके आरोपों के समर्थन में कोई आधिकारिक सबूत सामने नहीं आया है और जांच एजेंसियां मामले की पड़ताल कर रही हैं.

नेपाल के होटल में मिला था शव

रविवार को नेपाल के विराटनगर स्थित एक होटल से प्रिंस यादव का शव बरामद होने की खबर सामने आई थी. इस घटना ने बिहार से लेकर नेपाल तक हलचल मचा दी थी. जानकारी के अनुसार, 2 जून को हुए कोचिंग सेंटर विवाद के बाद प्रिंस यादव अपने कुछ साथियों के साथ नेपाल चले गए थे. वह वहां एक होटल में ठहरे हुए थे. बाद में संदिग्ध परिस्थितियों में उनका शव मिला.

नेपाल पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है और मौत के कारणों का पता लगाने के लिए विभिन्न पहलुओं पर काम किया जा रहा है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य फोरेंसिक साक्ष्यों का भी इंतजार किया जा रहा है.

पहले भी विवादों में रहा था नाम

प्रिंस यादव का नाम इससे पहले भी कई विवादों में सामने आ चुका था. वर्ष 2021 में उन पर खान सर के कोचिंग संस्थान में घुसकर हंगामा करने और मारपीट करने का आरोप लगा था. हालिया कोचिंग सेंटर विवाद में भी उनका नाम एफआईआर में शामिल था. यही वजह है कि घटना के बाद वह बिहार छोड़कर नेपाल चले गए थे.

जांच पर टिकी सबकी नजर

रौशन आनंद के गंभीर आरोपों के बाद अब पूरे मामले की जांच और भी महत्वपूर्ण हो गई है. एक तरफ प्रिंस यादव की संदिग्ध मौत है, तो दूसरी तरफ कोचिंग संस्थानों के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद की परतें खुल रही हैं. फिलहाल पुलिस और जांच एजेंसियां सभी तथ्यों को जुटाने में लगी हैं. जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी. हालांकि इतना तय है कि पटना का यह हाई-प्रोफाइल कोचिंग विवाद आने वाले दिनों में और अधिक चर्चा का विषय बना रह सकता है.

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