इंडियन आर्मी की दो ड्रेसेज में हुआ बदलाव, इंडियन आर्मी ने ब्रिटिश काल की कई निशानियों को बदला
भारतीय सेना ने जवानों की यूनिफॉर्म से गुलामी के दौरान वाली निशानियों को एक बार फिर से हटा दियया है. 174 पेज की नई आर्मी यूनिफॉर्म-2026 बुक में विदेशी एरा के नियमों में भी बदलाव हुआ है. सेना का कहना है कि ये बदलाव भारत की संप्रभु पहचान और राष्ट्रीय भावना को ध्यान में रखकर किए गए हैं.
नए नियमों में रिव्यूइंग ऑफिसर के लिए परेड में तलवार रखना वैकल्पिक कर दिया गया है. वहीं, कुछ मैस ड्रेस के साथ इस्तेमाल होने वाली पाउच बेल्ट हटा दी गई है. नए नियमों में रॉयल जैसे पुराने शब्दों को हटा दिया गया है. अब फॉर्मल सिविल ड्रेस में स्वदेशी बंदी जैकेट को भी शामिल किया गया है. बंद गला जैकेट फुल स्लीव शर्ट, फॉर्मल ट्राउजर और बंद जूतों के साथ पहना जाता है. बता दें, इससे पहले फरवरी 2023 में भी सेना ने कई पुरानी परंपराएं खत्म की थीं, जिनमें घोड़ा गाड़ी के इस्तेमाल, पुल-आउट इवेंट और डिनर में पाइप बैंड की परंपरा शामिल थी.
तलवार का इस्तेमाल भी लिमिटेड
सेना के नए नियमों के अनुसार, अब तलवार सिर्फ परेड कमांडर, कंंटिंजेंट कमांडर और निर्धारित अफसर ही रख सकेंगे. खास तौर पर गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, सेना दिवस और गार्ड ऑफ ऑनर जैसे प्रमुख समारोहों में इसका इस्तेमाल किया जाएगा. नई गाइडलाइन में कहा गया है कि रिव्यूइंग अफसर परेड के दौरान तलवार नहीं रख सकते हैं. सेना का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य परंपराओं को खत्म करना नहीं, बल्कि गुलामी के दौर की बची हुई निशानियों को आधुनिक भारतीय सोच के अनुरूप बनाना है.
बिना अनुमति के शादियों-पार्टियों और प्रदर्शनों में यूनिफॉर्म पहनने पर रोक
नए नियमों में पर्सनल अपीयरेंस, मिलिट्री बिहेवियर और यूनिफॉर्म कंडक्ट पर भी पूरी गाइडलाइन दी गई है. इसके अनुसार, बिना अनुमति दाढ़ी रखना, हेयरस्टाइल, दिखने वाले इलेक्ट्रॉनिक गैजेट, टैटू, बॉडी पियर्सिंग और मेकअप पर बैन रहेगा. सैन्य अधिकारियों और जवानों को अनुमति नहीं है कि वह बिना अनुमति के किसी भी पॉलिटिकल, प्रोटेस्ट, धार्मिक, गैदरिंग, प्राइवेट पार्टियों, पेड मीडिया इवेंट्स और शादियों में यूनिफॉर्म पहनकर जाएं.
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इसी साल 246 सड़कों, इमारतों के भी नाम बदले
थल सेना ने 2026 की शुरुआत में अपने स्वामित्व वाली 246 सड़कों, इमारतों और सुविधाओं का नाम बदला, जो ब्रिटिश काल की विरासत को खत्म करने की बड़ी पहल है. इस बदलाव का उद्देश्य भारत के अपने इतिहास, माहौल और मिलिट्री परंपराओं में निहित एक संस्थागत पहचान को मजबूत करना है. इसके अलावा, देश के वीरों, वॉर हीरोज और जाने-माने मिलिट्री लीडरों का सम्मान करना है.
हेलीपैड-पार्क्स के नाम भी बदले
सेना ने 124 सड़कें, 77 कॉलोनियां, 27 इमारतें सहित अन्य मिलिट्री सुविधाओं के नाम बदले थे. अन्य सुविधाओं में पार्क्स, ट्रेनिंग एरिया, खेल के मैदान, गेट और हेलीपैड शामिल थे. दिल्ली कैंट में किर्बी प्लेस का नाम केनुगुरुसे विहार तो वहीं, मॉल रोड का नाम अरुण खेत्रपाल मार्ग रखा गया है.
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यूनिफॉर्म बुक में दिए गए बड़े बदलाव
- सभी रैंकों के लिए नई विंटर ड्रेस 3B शुरू की गई है. इसमें अंगोला शर्ट, बैटल जैकेट और बेरेट शामिल हैं.
- महिला अधिकारी सादे रंग की साड़ी पहन सकती हैं. दुपट्टे के साथ कुर्ता-सलवार और एंकल-लेंथ स्ट्रेट पैंट पहन सकती हैं. स्लीवलेस कुर्ते, पलाजो और सिगरेट पैंट अलाउ नहीं है.
- महिला सैनिक-अफसर, लिपस्टिक, रंगीन नेल पॉलिश, बिंदी, नोज पिन नहीं पहन सकेंगी. सिंदूर लगाने की परमिशन है, लेकिन वह बेरेट या पीक कैप पहनने पर दिखाई नहीं देना चाहिए.
- पूजा के दिन कलाई पर एक पवित्र धागे को छोड़कर कोई ब्रेसलेट नहीं पहना जा सकता. सिख सैनिकों को छोड़कर दूसरे सैनिक धार्मिक चिन्ह पहनने की परमिशन नहीं है.
- मूंछों की लंबाई 12 सेंटीमीटर से ज्यादा नहीं हो सकती. यूनिफॉर्म में डिओ और परफ्यूम नहीं लगा सकेंगे. हालांकि आफ्टर-शेव लोशन यूज कर सकते हैं.
Explainer: TMC के बागी सांसद-विधायकों की सदस्यता जाएगी? जानें क्या कहता है दलबदल विरोधी कानून
Anti Defection Law: दल बदलकर किसी दूसरी पार्टी में जाना राजनीति का अहम हिस्सा होता है। हाल ही में, राघव चड्ढा समेत 7 सांसदों के आप पार्टी छोड़कर बीजेपी में आने के बाद एक बार फिर दिल्ली से लेकर पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र तक इस्तीफों का शोर चल रहा है। बंगाल में टीएमसी के 80 सांसद बागी हो गए। दिल्ली में करीब 22 सांसद बागी होकर एनडीए के साथ आने जा रहे हैं। वहीं महाराष्ट्र में शिवसेना उद्धव गुट के 3 सांसद उद्धव की मीटिंग से गायब रहे। अब सवाल उठता है कि क्या दल बदलने पर सांसद या विधायकों की सदस्यता बनी रहती है या चली जाती है। आइए विस्तार से जानते हैं।
साल 1985 से पहले भारत की राजनीति में अलग नियम थे। तब जनप्रतिनिधियों के दल बदलने पर कोई स्पष्ट संवैधानिक रोक नहीं थी। सांसद और विधायक कभी भी किसी भी राजनीतिक दल में शामिल हो सकते थे या छोड़ सकते थे। इससे उनकी सदस्यता पर कोई फर्क नहीं पड़ता था।
साल 1960-70 के दशक में सत्ता हासिल करने और गिराने के लिए नेताओं का पार्टी बदलना बेहद आम था। उस दौरान इसे "आया राम, गया राम" की राजनीति का नाम दिया गया। इससे राजनीति काफी प्रभावित होती थी। पार्टी बदलना नेताओं का मानो खेल बन गया हो। साल 1985 में दलबदल विरोधी कानून बन गया।
क्यों बना था दलबदल विरोधी कानून?
दलबदल विरोधी कानून मुख्य रूप से सांसदों और विधायकों को लालच या व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए राजनीतिक दल बदलने से रोकने और सरकारों को अस्थिर होने से बचाने के लिए बनाया गया था। 1967 आम चुनावों के बाद 'आया राम-गया राम' जैसी घटनाएं आम हो गई थीं, जहां नेता कुछ ही घंटों में कई बार पार्टियां बदल लेते थे। इससे चुनी हुई सरकारें बार-बार गिर जाती थीं।
पैसे या मंत्री पद के लालच में विधायकों-सांसदों की खरीद-फरोख्त को बढ़ावा मिलता था। इसके अलावा जो नेता जिस पार्टी के टिकट और वादों पर चुनाव जीतते हैं, उन्हें बीच में दल बदलकर मतदाताओं के साथ विश्वासघात करने से रोकना भी कानून बनाने की वजह रही। इस कानून को 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से लागू किया गया और इसे संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
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साल 2003 में हुआ रिफॉर्म
साल 1985 में संसद में दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) पास किया गया। इसे 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया। नया कानून 1 मार्च 1985 से पूरे देश में लागू हो गया था। बाद में, साल 2003 में 91वें संविधान संशोधन के जरिए इसमें और अधिक स्पष्टता लाई गई। राजनैतिक दलों के सामूहिक दलबदल को बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सके।
क्या कहता है कानून?
कानून के तहत अगर कोई सांसद और विधायक अपनी मर्जी से पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या पार्टी के व्हिप (निर्देश) के खिलाफ जाकर किसी बिल में वोट करता है तो सदस्य की सदस्या समाप्त हो जाती है।
अगर कोई नेता निर्दलीय सांसद या विधायक बना है, बाद में अगर किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है तो उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।
वहीं जो सदस्य मनोनीत होते हैं, वो अगर मनोनीत होने के 6 महीने के भीतर किसी पार्टी में शामिल हो जाते हैं तो सदस्यता बनी रहेगी। लेकिन अगर 6 महीने बाद किसी पार्टी में शामिल होते हैं तो उनकी सदस्यता चली जाएगी। हालांकि दलबदल पर अंतिम फैसला लेने का अधिकार सदन के पीठासीन अधिकारी पर होता है।
दलबदल के आधार पर जब किसी सदस्य की सदस्यता जाती है तो उसे दोबारा चुनाव जीतकर सदन पहुंचना होता है। तब तक वह किसी मंत्री पद या लाभ के पद पर नहीं रह सकता है।
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कब सदस्यता जाने से मिलती है छूट?
दलबदल विरोधी कानून में पार्टी बदलने पर सदस्यता नहीं जाने का भी नियम है। कानून में स्पष्ट है कि अगर किसी पार्टी के कम के कम 2/3 सदस्य किसी दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं या नया गुट बनाते हैं तो उन पर दलबदल कानून लागू नहीं होगा। यानी उनकी सदस्यता बरकरार रहेगी। दिल्ली में आप पार्टी से अगल होने पर राघव चड्ढा समेत 7 सांसदों पर इसीलिए यह कानून लागू नहीं हुआ था। क्योंकि उस समय आप के पास कुल 10 सांसद थे। 7 सांसदों की संख्या 2/3 से भी ज्यादा हो गई।
कानून बनने से पहले कब आयोग्य होते थे?
साल 1985 से पहले दल बदलने के कारण किसी भी जनप्रतिनिधि की सदस्यता रद्द नहीं की जा सकती थी। उन्हें सिर्फ तभी अयोग्य ठहराया जा सकता था, जब वे संविधान के अन्य नियमों (जैसे पागलपन, दिवालियापन या नागरिकता का समाप्त होना) का उल्लंघन करते थे। राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए, राजीव गांधी सरकार के समय 1985 में 52वां संविधान संशोधन पारित किया गया। इसके तहत दसवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसने स्वेच्छा से दल छोड़ने या पार्टी के व्हिप (Whip) का उल्लंघन करने पर सांसदों/विधायकों की सदस्यता समाप्त करने का नियम बनाया।
दल-बदल कानून आसान शब्दों में
पार्टी वाला सांसद: खुद पार्टी छोड़ी या पार्टी के कहने के खिलाफ वोट किया तो कुर्सी गई।
निर्दलीय सांसद: जीतने के बाद किसी पार्टी में गया तो सदस्यता रद्द।
मनोनीत सांसद: शपथ के 6 महीने तक पार्टी जॉइन कर सकते हो। 6 महीने बाद जॉइन किया तो सदस्यता गई।
छूट कब मिलती है: अगर पार्टी के 2/3 लोग मिलकर दूसरी पार्टी में जाते हैं या नया ग्रुप बनाते हैं तो कानून लागू नहीं होगा।
फैसला कौन करेगा: लोकसभा में स्पीकर और राज्यसभा में सभापति का फैसला आखिरी होगा।
सजा क्या: अयोग्य होने के बाद दोबारा चुनाव जीते बिना मंत्री या कोई फायदे वाली कुर्सी नहीं मिलेगी।
इन दिग्गजों की जा चुकी है सदस्यता
भारत में दल-बदल करने पर कई सांसदों और विधायकों की सदस्यता रद्द हो चुकी है। इसमें शरद यादव, अली अनवर, AIADMK के 18 विधायक और कुलदीप विश्नोई समेत तमाम दिग्गज शामिल हैं।
2017 में, जनता दल (यूनाइटेड) ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के आधार पर शिकायत की थी, जिसके बाद राज्यसभा के तत्कालीन सभापति ने राज्यसभा सांसद शरद यादव की सदस्यता रद्द कर दी थी। अनवर शरद यादव के साथ ही राज्यसभा सांसद अली को भी जनता दल (यूनाइटेड) से बगावत करने और अन्य दलों के मंच साझा करने पर अयोग्य घोषित कर दिया गया था।
इसके अलावा 2017 में, अन्नाद्रमुक (AIADMK) के 18 विधायकों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री के खिलाफ बगावत की थी। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष ने दलबदल विरोधी कानून के तहत इन सभी विधायकों की सदस्यता समाप्त कर दी थी। वहीं हरियाणा विधानसभा में 2009 में हरियाणा जनहित कांग्रेस के विधायक कुलदीप बिश्नोई ने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय किया था, लेकिन स्पीकर ने इसे दलबदल माना था। बाद में कई कानूनी दांव-पेंच के बाद उन्हें सदस्यता गंवानी पड़ी थी।
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