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Explainer: TMC के बागी सांसद-विधायकों की सदस्यता जाएगी? जानें क्या कहता है दलबदल विरोधी कानून

Anti Defection Law: दल बदलकर किसी दूसरी पार्टी में जाना राजनीति का अहम हिस्सा होता है। हाल ही में, राघव चड्ढा समेत 7 सांसदों के आप पार्टी छोड़कर बीजेपी में आने के बाद एक बार फिर दिल्ली से लेकर पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र तक इस्तीफों का शोर चल रहा है। बंगाल में टीएमसी के 80 सांसद बागी हो गए। दिल्ली में करीब 22 सांसद बागी होकर एनडीए के साथ आने जा रहे हैं। वहीं महाराष्ट्र में शिवसेना उद्धव गुट के 3 सांसद उद्धव की मीटिंग से गायब रहे। अब सवाल उठता है कि क्या दल बदलने पर सांसद या विधायकों की सदस्यता बनी रहती है या चली जाती है। आइए विस्तार से जानते हैं।

साल 1985 से पहले भारत की राजनीति में अलग नियम थे। तब जनप्रतिनिधियों के दल बदलने पर कोई स्पष्ट संवैधानिक रोक नहीं थी। सांसद और विधायक कभी भी किसी भी राजनीतिक दल में शामिल हो सकते थे या छोड़ सकते थे। इससे उनकी सदस्यता पर कोई फर्क नहीं पड़ता था। 

साल 1960-70 के दशक में सत्ता हासिल करने और गिराने के लिए नेताओं का पार्टी बदलना बेहद आम था। उस दौरान इसे "आया राम, गया राम" की राजनीति का नाम दिया गया। इससे राजनीति काफी प्रभावित होती थी। पार्टी बदलना नेताओं का मानो खेल बन गया हो। साल 1985 में दलबदल विरोधी कानून बन गया। 

क्यों बना था दलबदल विरोधी कानून?

दलबदल विरोधी कानून मुख्य रूप से सांसदों और विधायकों को लालच या व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए राजनीतिक दल बदलने से रोकने और सरकारों को अस्थिर होने से बचाने के लिए बनाया गया था। 1967 आम चुनावों के बाद 'आया राम-गया राम' जैसी घटनाएं आम हो गई थीं, जहां नेता कुछ ही घंटों में कई बार पार्टियां बदल लेते थे। इससे चुनी हुई सरकारें बार-बार गिर जाती थीं। 

पैसे या मंत्री पद के लालच में विधायकों-सांसदों की खरीद-फरोख्त को बढ़ावा मिलता था। इसके अलावा जो नेता जिस पार्टी के टिकट और वादों पर चुनाव जीतते हैं, उन्हें बीच में दल बदलकर मतदाताओं के साथ विश्वासघात करने से रोकना भी कानून बनाने की वजह रही। इस कानून को 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से लागू किया गया और इसे संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल किया गया।

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साल 2003 में हुआ रिफॉर्म

साल 1985 में संसद में दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) पास किया गया। इसे 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया। नया कानून 1 मार्च 1985 से पूरे देश में लागू हो गया था। बाद में, साल 2003 में 91वें संविधान संशोधन के जरिए इसमें और अधिक स्पष्टता लाई गई। राजनैतिक दलों के सामूहिक दलबदल को बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सके। 

क्या कहता है कानून?

कानून के तहत अगर कोई सांसद और विधायक अपनी मर्जी से पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या पार्टी के व्हिप (निर्देश) के खिलाफ जाकर किसी बिल में वोट करता है तो सदस्य की सदस्या समाप्त हो जाती है।

अगर कोई नेता निर्दलीय सांसद या विधायक बना है, बाद में अगर किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है तो उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।

वहीं जो सदस्य मनोनीत होते हैं, वो अगर मनोनीत होने के 6 महीने के भीतर किसी पार्टी में शामिल हो जाते हैं तो सदस्यता बनी रहेगी। लेकिन अगर 6 महीने बाद किसी पार्टी में शामिल होते हैं तो उनकी सदस्यता चली जाएगी। हालांकि दलबदल पर अंतिम फैसला लेने का अधिकार सदन के पीठासीन अधिकारी पर होता है। 

दलबदल के आधार पर जब किसी सदस्य की सदस्यता जाती है तो उसे दोबारा चुनाव जीतकर सदन पहुंचना होता है। तब तक वह किसी मंत्री पद या लाभ के पद पर नहीं रह सकता है। 

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कब सदस्यता जाने से मिलती है छूट?

दलबदल विरोधी कानून में पार्टी बदलने पर सदस्यता नहीं जाने का भी नियम है। कानून में स्पष्ट है कि अगर किसी पार्टी के कम के कम 2/3 सदस्य किसी दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं या नया गुट बनाते हैं तो उन पर दलबदल कानून लागू नहीं होगा। यानी उनकी सदस्यता बरकरार रहेगी। दिल्ली में आप पार्टी से अगल होने पर राघव चड्ढा समेत 7 सांसदों पर इसीलिए यह कानून लागू नहीं हुआ था। क्योंकि उस समय आप के पास कुल 10 सांसद थे। 7 सांसदों की संख्या 2/3 से भी ज्यादा हो गई। 

कानून बनने से पहले कब आयोग्य होते थे?

साल 1985 से पहले दल बदलने के कारण किसी भी जनप्रतिनिधि की सदस्यता रद्द नहीं की जा सकती थी। उन्हें सिर्फ तभी अयोग्य ठहराया जा सकता था, जब वे संविधान के अन्य नियमों (जैसे पागलपन, दिवालियापन या नागरिकता का समाप्त होना) का उल्लंघन करते थे। राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए, राजीव गांधी सरकार के समय 1985 में 52वां संविधान संशोधन पारित किया गया। इसके तहत दसवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसने स्वेच्छा से दल छोड़ने या पार्टी के व्हिप (Whip) का उल्लंघन करने पर सांसदों/विधायकों की सदस्यता समाप्त करने का नियम बनाया।

दल-बदल कानून आसान शब्दों में

पार्टी वाला सांसद: खुद पार्टी छोड़ी या पार्टी के कहने के खिलाफ वोट किया तो कुर्सी गई।
निर्दलीय सांसद: जीतने के बाद किसी पार्टी में गया तो सदस्यता रद्द।
मनोनीत सांसद: शपथ के 6 महीने तक पार्टी जॉइन कर सकते हो। 6 महीने बाद जॉइन किया तो सदस्यता गई।
छूट कब मिलती है: अगर पार्टी के 2/3 लोग मिलकर दूसरी पार्टी में जाते हैं या नया ग्रुप बनाते हैं तो कानून लागू नहीं होगा।
फैसला कौन करेगा: लोकसभा में स्पीकर और राज्यसभा में सभापति का फैसला आखिरी होगा।
सजा क्या: अयोग्य होने के बाद दोबारा चुनाव जीते बिना मंत्री या कोई फायदे वाली कुर्सी नहीं मिलेगी।

इन दिग्गजों की जा चुकी है सदस्यता

भारत में दल-बदल करने पर कई सांसदों और विधायकों की सदस्यता रद्द हो चुकी है। इसमें शरद यादव, अली अनवर,  AIADMK के 18 विधायक और कुलदीप विश्नोई समेत तमाम दिग्गज शामिल हैं। 

2017 में, जनता दल (यूनाइटेड) ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के आधार पर शिकायत की थी, जिसके बाद राज्यसभा के तत्कालीन सभापति ने राज्यसभा सांसद शरद यादव की सदस्यता रद्द कर दी थी। अनवर शरद यादव के साथ ही राज्यसभा सांसद अली को भी जनता दल (यूनाइटेड) से बगावत करने और अन्य दलों के मंच साझा करने पर अयोग्य घोषित कर दिया गया था।

इसके अलावा 2017 में, अन्नाद्रमुक (AIADMK) के 18 विधायकों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री के खिलाफ बगावत की थी। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष ने दलबदल विरोधी कानून के तहत इन सभी विधायकों की सदस्यता समाप्त कर दी थी। वहीं हरियाणा विधानसभा में 2009 में हरियाणा जनहित कांग्रेस के विधायक कुलदीप बिश्नोई ने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय किया था, लेकिन स्पीकर ने इसे दलबदल माना था। बाद में कई कानूनी दांव-पेंच के बाद उन्हें सदस्यता गंवानी पड़ी थी।

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IND W vs PAK W: मंधाना-हरमनप्रीत के बाद ऋचा घोष और दीप्ति का धमाल, भारत ने पाकिस्तान को दिया 171 रनों का लक्ष्य

IND W vs PAK W: ICC महिला टी20 वर्ल्ड कप 2026 का 6वां मैच बर्मिंघम के एजबेस्टन स्टेडियम में भारत और पाकिस्तान के बीच खेला जा रहा है. भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए 6 विकेट पर 170 रनों का स्कोर बनाया है. टीम इंडिया के लिए स्मृति मंधाना ने सबसे ज्यादा 68 रनों की पारी खेली. जबकि कप्तान हरमनप्रीत कौर 36 रन बनाईं. वहीं आखिरी के ओवरों में ऋचा घोष और दीप्ति शर्मा ने अच्छी बल्लेबाजी की और टीम के स्कोर को 170 तक पहुंचाया. पाकिस्तान के लिए कप्तान फातिमा सना और सादिया इकबाल 2-2 विकेट चटकाई. जबकि तस्मिया रुबाब और रमीन शमीम को 1-1 सफलता मिली.

टीम इंडिया की शुरुआत रही थी खराब

पाकिस्तान के खिलाफ इस मैच में टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी टीम इंडिया की शुरुआत खराब रही थी. ओपनर शैफाली वर्मा पहले ही ओवर में आउट हो गईं. उन्हें 6 रन के निजी स्कोर पर सादिया इकबाल ने पवेलियन भेजा. इसके बाद टीम इंडिया को 18 रन के स्कोर पर जेमिमा रोड्रिग्स के रूप में दूसरा झटका लगा. जेमिमा को तस्मिया रुबाब ने चलता किया. वो सिर्फ एक रन बनाईं. इसके बाद कप्तान हरमनप्रीत कौर और स्मृति मंधाना के बीच तीसरे विकेट के लिए 91 रनों की शानदार साझेदारी हुई,

हरमनप्रीत कौर और स्मृति मंधाना के बीच हुई थी अच्छी साझेदारी

स्मृति मंधाना शानदार बल्लेबाजी कर रहे थी, लेकिन रमीन शमीम उन्हें आउट कर टीम इंडिया को बड़ा झटका दिया. मंधाना ने 44 गेंदों पर 68 रनों की पारी खेली, जिसमें 9 चौका और 2 छक्का शामिल रहा. इसके बाद भारती फुलमाली सिर्फ 1 रन बनाकर चलती बनीं. उन्हें सादिया इकबाल ने पवेलियन भेजा. 

ऋचा घोष और दीप्ति शर्मा ने बनाया तेजी से रन

कप्तान हरमनप्रीत कौर के रूप में भारतीय टीम को पांचवा झटका लगा. उन्हें पाकिस्तान की कप्तान फातिमा सना ने पवेलियन भेजा. हरमनप्रीत 35 गेंद पर 36 रन बनाईं. इस दौरान उनके बल्ले से सिर्फ 4 चौका निकला. इसके बाद ऋचा घोष और दीप्ति शर्मा ने तेजी से रन बनाया और टीम को एक अच्छी स्कोर पर पहुंचाया. ऋचा घोष 17 गेंद पर 34 रन बनाकर आउट हुईं. इस दौरान उनके बल्ले से 5 चौका और 1 छक्का निकला. वहीं दीप्ति शर्मा 9 गेंद पर 12 रन और श्रेयंका पाटिल 1 रन बनाकर नाबाद रहीं. 

ऐसी है दोनों टीमों की प्लेइंग 11

भारतीय महिला टीम की प्लेइंग 11: स्मृति मंधाना, शैफाली वर्मा, जेमिमा रोड्रिग्स, हरमनप्रीत कौर (कप्तान), भारती फुलमाली, ऋचा घोष (विकेटकीपर), दीप्ति शर्मा, अरुंधति रेड्डी, श्रेयंका पाटिल, श्री चरणी, क्रांति गौड़. 

पाकिस्तान महिला टीम की प्लेइंग 11: गुल फ़िरोज़ा, मुनीबा अली (विकेटकीपर), आयशा जफर, सायरा जबीन, आलिया रियाज़, नतालिया परवेज़, फातिमा सना (कप्तान), रमीन शमीम, नशरा संधू, तस्मिया रुबाब, सादिया इकबाल. 

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