आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू अमरावती और अन्य प्रमुख परियोजनाओं से जुड़े सहयोग की समीक्षा एवं निवेश आकर्षित करने के मकसद से 15 से 16 जून तक सिंगापुर का दौरा करेंगे।
राज्य सरकार की तरफ से शनिवार को जारी एक विज्ञप्ति के मुताबिक, नायडू 14 जून को बेंगलुरु से सिंगापुर के लिए रवाना होंगे।
इस दौरान मुख्यमंत्री सिंगापुर में भारत के उच्चायुक्त शिल्पक अंबुले से मुलाकात करेंगे और स्टार्टअप उद्यम पूंजी निवेशकों के साथ गोलमेज बैठक में शामिल होंगे। वह संयुक्त राष्ट्र-हैबिटैट की कार्यकारी निदेशक एनाक्लॉडिया रोसबाख के साथ भी बैठक करेंगे।
विज्ञप्ति के मुताबिक, नायडू सिंगापुर के प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग, विदेश मंत्री विवियन बालाकृष्णन और अन्य वरिष्ठ मंत्रियों से मुलाकात कर विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग पर चर्चा करेंगे।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, मुख्यमंत्री गूगल क्लाउड के अध्यक्ष (एशिया-प्रशांत) करण बाजवा, जीआईसी के सलाहकार लिम सियांग गुआन, वाईसीएच ग्रुप के कार्यकारी चेयरमैन रॉबर्ट याप और नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के अध्यक्ष प्रो. टैन एंग चाय सहित उद्योग एवं अकादमिक जगत के प्रतिनिधियों से भी मिलेंगे।
इसके अलावा, नायडू वर्ल्ड सिटीज समिट के लीडरशिप प्लेनरी सत्र को भी संबोधित करेंगे और विभिन्न निवेश-संबंधी कार्यक्रमों में भाग लेंगे।
विज्ञप्ति के अनुसार, यह यात्रा आंध्र प्रदेश एवं सिंगापुर के बीच सहयोग को मजबूत करने, वैश्विक निवेश आकर्षित करने और अमरावती सहित राज्य की प्रमुख अवसंरचना परियोजनाओं को गति देने के उद्देश्य से की जा रही है।
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कुछ साल पहले तक, किसी म्यूज़िक कॉन्सर्ट के टिकट पर ₹10,000 खर्च करने की बात अधिकांश भारतीयों को हैरान कर देती थी। लेकिन आज की कहानी बिल्कुल अलग है। आज देश के युवा प्रोफेशनल्स केवल एक संगीत समारोह का हिस्सा बनने के लिए फ्लाइट पकड़कर दूसरे शहरों की यात्रा कर रहे हैं, तो वहीं छात्र अपने पसंदीदा अंतरराष्ट्रीय आर्टिस्ट के टूर के लिए महीनों पहले से पॉकेट मनी बचा रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि यह दीवानगी सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक डांस म्यूज़िक (EDM) नाइट्स या वेस्टर्न पॉप कॉन्सर्ट तक सीमित नहीं है। आज हज़ारों युवा भक्ति संगीत सत्रों, कीर्तन और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे "भजन क्लबिंग" जैसे अनूठे अनुभवों के लिए भी भारी संख्या में जुट रहे हैं। भारत की लाइव इवेंट्स इकॉनमी अब सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं, बल्कि एक बड़ा सांस्कृतिक और आर्थिक आंदोलन बन चुकी है।
आंकड़ों की जुबानी: ₹19,600 करोड़ के भविष्य की ओर
BookMyShow-EY Parthenon की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत का संगठित लाइव एंटरटेनमेंट मार्केट (Organised Live Entertainment Market) वर्तमान में ₹13,000 करोड़ के आंकड़े को पार कर चुका है। अनुमान है कि यह सेक्टर 2028 तक ₹19,600 करोड़ के विशाल बाजार में तब्दील हो जाएगा। कॉन्सर्ट, स्पोर्ट्स इवेंट्स, कम्युनिटी गैदरिंग्स और आध्यात्मिक सत्र इस जादुई आंकड़े को हासिल करने में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं।
बड़ा बदलाव: भौतिक चीज़ों (Products) के बजाय यादें (Experiences) खरीदने की होड़
शहरी युवाओं के उपभोक्ता व्यवहार (Consumer Behavior) में एक बुनियादी बदलाव आया है। वे अब महंगी घड़ियां या ब्रांडेड कपड़े खरीदने के बजाय 'अनुभवों' (Experiences) पर निवेश करना पसंद कर रहे हैं।
मार्केटिंग प्रोफेशनल पलक थापर (25 वर्ष) के अनुसार, "मेरी उम्र के लोगों में यह एक आम ट्रेंड है। भौतिक वस्तुएं खरीदने के बजाय हम यादें संजोना पसंद करते हैं। यह महंगा जरूर है, लेकिन जब आप समान सोच वाले हजारों लोगों के साथ सप्ताहांत पर अपने पसंदीदा संगीत का आनंद लेते हैं, तो वह अनुभव पूरी तरह से पैसा वसूल (Worth it) होता है। लाइव इवेंट्स हमें वह जुड़ाव और 'मौजूदगी' (Presence) देते हैं जो कोई डिजिटल प्लेटफॉर्म नहीं दे सकता।"
युवाओं के लिए अनुभव देने वाले प्लेटफ़ॉर्म 'स्पेक्टल' (Spectal) के फ़ाउंडर हिमांशु चौधरी बताते हैं कि महामारी (Covid-19) ने इस बदलाव की रफ़्तार को कई गुना तेज कर दिया। लोग लंबे समय तक घरों में कैद रहने के बाद अब असल जिंदगी में मिलने-जुलने और सामूहिक अनुभवों के लिए बेताब हैं। इसी का नतीजा है कि कभी छोटे स्तर पर होने वाले कॉलेज फेस्टिवल्स अब बड़े स्पॉन्सर्स और अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रोडक्शन के साथ ग्रैंड एंटरटेनमेंट इवेंट्स बन चुके हैं।
'कॉन्सर्ट टूरिज़्म'– आर्थिक विकास का नया इंजन
इस बूम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि कॉन्सर्ट अब पर्यटन (Tourism) को बढ़ावा दे रहे हैं। जब कोई बड़ा शो होता है, तो टिकट की कीमत केवल शुरुआत होती है; इसके बाद लोग फ्लाइट, होटल, स्थानीय परिवहन, रेस्तरां और शॉपिंग पर भारी खर्च करते हैं।
सरकारी दृष्टिकोण: केंद्र सरकार ने साल 2030 तक भारत को लाइव एंटरटेनमेंट के क्षेत्र में ग्लोबल लीडर बनाने की इच्छा जताई है, जिससे लाखों रोजगार पैदा होने की उम्मीद है।
राज्यों के बीच होड़: भारत के राज्य अब लाइव इवेंट्स को अपनी अर्थव्यवस्था चमकाने के मौके के रूप में देख रहे हैं। उदाहरण के लिए, असम सरकार ने हाल ही में म्यूज़िक टूरिज़्म के जरिए करोड़ों रुपये की 'कॉन्सर्ट इकॉनमी' बनाने की अपनी रणनीतिक योजना साझा की है।
'जेन जे' (Gen Z) और समुदायों का प्रभाव
यूथ कम्युनिटी प्लेटफ़ॉर्म 'Under25' की सीईओ झील गांधी का मानना है कि 'जेन जे' (Gen Z) सफलता और खर्च को पुरानी पीढ़ियों की तरह नहीं देखता। उनके लिए किसी खास फेस्टिवल या फैनडम इवेंट का हिस्सा बनना अपनी पहचान (Identity) को बयां करने का एक जरिया है। महामारी के दौरान अकेलेपन से जूझने के बाद, आज का युवा उन समुदायों (Communities) की तलाश में है जो उनकी पसंद और जीवन मूल्यों से मेल खाते हों। इसलिए, आज इवेंट्स में जाना केवल मुख्य परफॉर्मर को देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समान विचारधारा वाले लोगों से मिलने का एक माध्यम बन गया है।
इस बदलाव को भांपते हुए ब्रांड्स ने भी अपनी 'एक्सपीरिएंशियल मार्केटिंग' (Experience-based Marketing) का बजट बढ़ा दिया है। इंस्टाग्राम पर 30 सेकंड के स्क्रॉलिंग विज्ञापन के मुकाबले, कॉलेज फेस्टिवल्स या लाइव ग्राउंड पर ब्रांड्स को उपभोक्ताओं का 'एक्सक्लूसिव' और पूरा ध्यान (Attention) मिल रहा है।
आस्था से परे: 'भजन क्लबिंग' और वेलनेस का नया क्रेज
लाइव इवेंट्स इकॉनमी में सबसे चौंकाने वाला मोड़ भक्ति संगीत (Devotional Music) और कीर्तन का मुख्यधारा में आना है। युवा वर्ग मानसिक शांति, वेलनेस और बिना किसी नशे के एक सामूहिक 'हाई' या सकारात्मक उत्साह की तलाश में इन कीर्तन सत्रों की तरफ आकर्षित हो रहा है।
यूके (UK) में रहने वाले वैश्विक कीर्तन संगीतकार राधिका दास और डिवोशनल आर्टिस्ट प्रेमांजलि का मानना है कि यह ट्रेंड समाज की एक गहरी जरूरत को दिखाता है। डिजिटल रूप से जुड़े होने के बावजूद आज का युवा भावनात्मक रूप से अकेला है। सामूहिक मंत्रोच्चार भाषा और भूगोल की सीमाओं से परे जाकर लोगों को आपस में जोड़ता है। योग की ही तरह, भारत का यह भक्ति संगीत (Devotional Music) आने वाले समय में दुनिया भर में भारत का अगला सबसे बड़ा 'कल्चरल एक्सपोर्ट' (सांस्कृतिक निर्यात) और सॉफ्ट पावर बनने की क्षमता रखता है।
निष्कर्ष: पलों पर खर्च करने का नया भारत
भविष्य की लाइव-इवेंट इकॉनमी अब केवल बड़े मास-ऑडियंस (Mass Audience) के भरोसे नहीं है, बल्कि अब एनिमे कन्वेंशन, बोर्ड-गेम नाइट्स, क्रिएटर मीटअप्स और क्षेत्रीय सांस्कृतिक उत्सवों जैसे विशिष्ट शौक (Niche Passions) रखने वाले समुदायों के दम पर नए बाजार खड़े हो रहे हैं।
वजह चाहे स्टार्स के प्रति दीवानगी हो, समुदाय की भावना हो या फिर आत्मिक शांति—एक बात बिल्कुल साफ है कि भारत का उपभोक्ता अब 'चीज़ों' पर नहीं, बल्कि 'पलों' पर निवेश कर रहा है। और ये पल भारत की मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ा और गंभीर बिजनेस साबित हो रहे हैं।
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