आज अधिकमास वरदा चतुर्थी व्रत है, हिन्दू धर्म में इस व्रत को बहुत पवित्र माना जाता है। अधिकमास वरदा चतुर्थी व्रत से जीवन में सुख समृद्धि आती है तो आइए हम आपको अधिकमास वरदा चतुर्थी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।
जानें अधिकमास वरदा चतुर्थी के बारे में
अधिकमास वरदा चतुर्थी व्रत भगवान गणेश को समर्पित एक अत्यंत शुभ और पवित्र तिथि मानी गई है, क्योंकि यह अधिक मास की शुक्ल चतुर्थी को पड़ती है। इसे वरद चतुर्थी या वरद विनायक चतुर्थी के नाम से भी कहते हैं। इस साल यह त्योहार बुधवार 20 मई को पड़ रहा है। यह दिन 'वरदा' अर्थात वरदान देने वाला माना गया है इसलिए इस दिन यदि आप गणेश जी की पूजा में इस मंत्रों के जप द्वारा उसकी विशेष कृपा प्राप्त कर सकते हैं।
अधिकमास वरदा विनायक चतुर्थी का शुभ मुहूर्त
अधिकमास की वरदा चतुर्थी 19 मई 2026 को दोपहर 2 बजकर 18 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 20 मई 2026 को सुबह 11 बजकर 06 मिनट पर समाप्त होगी।
चतुर्थी मध्याह्न मुहूर्त - सुबह 10:56 - सुबह 11:06
वर्जित चंद्रदर्शन का समय - सुबह 8.43 - रात 11.08
इसलिए खास है अधिकमास वरदा विनायक चतुर्थी व्रत
पंडितों के अनुसार इस मास को "अतिशय पुण्यप्रद मास" कहा गया है, इसीलिये इसमें किया गया गणपति व्रत सहस्र गुणा पुण्यदायी होता है। ये व्रत समस्त प्रकार की समस्याओं से मुक्त कर उन्हें सुख, शान्ति एवं समृद्धि प्रदान करता है। ग्रंथों के अनुसार मलमास की चतुर्थी व्रत का पालन करने से व्यक्ति के पूर्वजन्म के दोष और वर्तमान जीवन के विघ्न दूर होते हैं। ये व्रत साधक के लौकिक और पारलौकिक, दोनों तरह के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है. साथ ही इसके प्रताप से पितृगणों एवं देवताओं की तृप्ति भी होती है।
अधिकमास वरदा विनायक चतुर्थी व्रत के दिन ऐसे करें पूजा, होगा लाभ
पंडितों के अनुसार वरदा चतुर्थी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र पहनें। इसके बाद पूजा स्थान को शुद्ध करके चौकी पर भगवान गणेश की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। पूजा के दौरान गणपति बप्पा को सिंदूर का तिलक अर्पित करें, क्योंकि यह उन्हें अत्यंत प्रिय माना जाता है। गणेश जी की पूजा में दूर्वा का विशेष महत्व बताया गया है, पूजा करते समय “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का उच्चारण करते हुए 21 दूर्वा दल अर्पित करें। इसके बाद भगवान गणेश को मोदक या उनके प्रिय मिठाई का भोग लगाएं, विधि-विधान से विघ्नहर्ता गणेश की आराधना करें और अंत में आरती उतारें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वरदा चतुर्थी का व्रत करने से घर में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। इस दिन गणेश पूजन के बाद ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना और अपनी क्षमता अनुसार दान देना शुभ माना जाता है। पंडितों के अनुसार “ॐ गणेशाय नमः” मंत्र का जाप करने से आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं और स्वास्थ्य संबंधी कष्टों में भी राहत मिलती है।
अधिकमास वरदा विनायक चतुर्थी व्रत पर गणेश जी को सिंदुर चढ़ाने का मंत्र
सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम् । शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ॥
शास्त्रों के अनुसार धार्मिक दृष्टि से सिंदूर ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। गणेश जी को सिंदूर अर्पित करने से मानसिक शक्ति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
अधिकमास वरदा विनायक चतुर्थी व्रत पर जरूर करें ये काम
पंडितों के अनुसार अधिकमास वरदा विनायक का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है इसलिए वरदा चतुर्थी पर दिनभर उपवास (व्रत) रखतें हैं और मध्याह्न (दोपहर) में गणेश जी की पूजा करें। भगवान गणेश को सिंदूर बहुत प्रिय है, ऐसे में वरदा चतुर्थी की पूजा में उन्हें सिंदूर का तिलक जरूर लगाएं। 'श्री गणेशाय नमः दूर्वांकुरान् समर्पयामि।' मंत्र का जप करते हुए गणेश जी को 21 दुर्वा (दूब) अर्पित करें। चतुर्थी पर बप्पा की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करना भी शुभ माना जाता है। पूजा के बाद जरूरतमंदों को अपनी क्षमता के अनुसार अन्न या धन का दान करें।
अधिकमास वरदा विनायक चतुर्थी का धार्मिक महत्व भी है खास
धार्मिक ग्रंथों, विशेषकर भविष्य पुराण के अनुसार, अधिकमास में की जाने वाली वरदा विनायक चतुर्थी का व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है। पंडितों के अनुसार इस व्रत का पालन करने से सामान्य 12 मासों की चतुर्थी व्रत के बराबर या उससे भी अधिक पुण्य प्राप्त होता है। यह व्रत सभी प्रकार के विघ्नों को दूर कर जीवन में सुख, शांति, धन, संतान, यश और दीर्घायु प्रदान करता है। इसे आत्मिक और भौतिक दोनों प्रकार के कल्याण का मार्ग माना गया है।
जानें अधिकमास वरदा विनायक चतुर्थी व्रत का महत्व
पंडितों के अनुसार अधिकमास को ‘अतिशय पुण्यप्रद मास’ कहा गया है, इसलिए इस समय किए गए गणपति व्रत का विशेष महत्व होता है। इस व्रत से पूर्व जन्म के दोष और वर्तमान जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। यह व्रत साधक को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है और पितृगणों तथा देवताओं की कृपा भी प्राप्त होती है।
अधिकमास विनायक चतुर्थी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा
पुराणों में अधिकमास विनायक चतुर्थी व्रत से जुड़ी एक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती शिवजी के साथ चौपड़ खेल रही थीं। उन्हें खेल खेलने में बड़ी ही दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। वो ये सोच रहे थे कि आखिर इस खेल की हार-जीत का फैसला कौन करेगा। इसके लिए घास-फूस से एक बालक बनाया गया और उसमें प्राण प्रतिष्ठा की गई। साथ ही उस बालक पर हार-जीत का दारोमदार सौंपा गया। खेल में तीन बार पार्वती जी जीतीं। लेकिन बालक ने गलतफहमी ने महादेव को विजेता बता दिया। इस पर पार्वती जी को बहुत गुस्सा आया और उस बालक को कीचड़ में रहने का श्राप दे दिया। बालक ने माता पार्वती से माफी मांगी। तब उन्होंने कहा कि एक वर्ष बाद यहां नागकन्याएं आएंगी। जैसे वो कहें उसी के अनुसार गणेश चतुर्थी का व्रत करना। इससे तुम्हारे कष्ट दूर हो जाएंगे।
इसके बाद उस बालक ने गणेश जी की उपासना की। उनकी भक्ति देख गणेश जी बेहद प्रसन्न हो गए। गणेश जी ने उन्हें अपने माता-पिता यानी भगवान शिव-पार्वती के पास जाने का वरदान दिया। वह बालक कैलाश पहुंच गया। शिवजी ने भी पार्वती जी को मनाने के लिए 21 दिन तक गणेश जी का व्रत किया। इसके बाद पार्वती जी मान गईं। इसके बाद अपने पुत्र से मिलने के लिए पार्वती जी ने भी 21 दिन तक व्रत किया। मान्यता है कि वह बालक कार्तिकेय थे।
- प्रज्ञा पाण्डेय
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वट सावित्री व्रत सौभाग्य देने वाला और संतान की प्राप्ति में सहायता देने वाला व्रत माना गया है। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका है। स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को व्रत करने की बात कही गई है। यह स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन सत्यवान सावित्री तथा यमराज की पूजा की जाती है। सावित्री ने इस व्रत के प्रभाव से अपने मृतक पति सत्यवान को धर्मराज से छुड़ाया था।
पूजा विधान
वट वृक्ष के नीचे मिट्टी की बनी सावित्री और सत्यवान तथा भैंसे पर सवार यम की मूर्ति स्थापित कर पूजा करनी चाहिए तथा बड़ की जड़ में पानी देना चाहिए। पूजा के लिए जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप होनी चाहिए। जल से वट वृक्ष को सींच कर तने को चारों ओर कच्चा धागा लपेट कर तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए। इसके बाद सत्यवान−सावित्री की कथा सुननी चाहिए। इसके बाद भीगे हुए चनों का बायना निकालकर उस पर यथाशक्ति रुपए रखकर अपनी सास को देना चाहिए तथा उनके चरण स्पर्श करने चाहिएं।
वट सावित्री व्रत कथा
मद्र देश के राजा अश्वपति ने पत्नी सहित संतान के लिए सावित्री देवी का विधिपूर्वक व्रत तथा पूजन करके पुत्री होने का वर प्राप्त किया। सर्वगुण संपन्न देवी सावित्री ने पुत्री के रूप में अश्वपति के घर कन्या के रूप में जन्म लिया। कन्या के युवा होने पर अश्वपति ने अपने मंत्री के साथ सावित्री को अपना पति चुनने के लिए भेज दिया। सावित्री अपने मन के अनुकूल वर का चयन कर जब लौटी तो उसी दिन महर्षि नारद उनके यहां पधारे। नारदजी के पूछने पर सावित्री ने कहा कि महाराज द्युमत्सेन जिनका राज्य हर लिया गया है, जो अंधे हो गए हैं और अपनी पत्नी सहित वनों की खाक छानते फिर रहे हैं, उन्हीं के इकलौते पुत्र सत्यवान की कीर्ति सुनकर उन्हें मैंने पति रूप में वरण कर लिया है।
नारदजी ने सत्यवान तथा सावित्री के ग्रहों की गणना कर अश्वपति को बधाई दी तथा सत्यवान के गुणों की भूरि−भूरि प्रशंसा की और बताया कि सावित्री के बारह वर्ष की आयु होने पर सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी। नारदजी की बात सुनकर राजा अश्वपति का चेहरा मुरझा गया। उन्होंने सावित्री से किसी अन्य को अपना पति चुनने की सलाह दी परंतु सावित्री ने उत्तर दिया कि आर्य कन्या होने के नाते जब मैं सत्यवान का वरण कर चुकी हूं तो अब वे चाहे अल्पायु हों या दीर्घायु, मैं किसी अन्य को अपने हृदय में स्थान नहीं दे सकती।
सावित्री ने नारदजी से सत्यवान की मृत्यु का समय ज्ञात कर लिया। दोनों का विवाह हो गया। सावित्री अपने श्वसुर परिवार के साथ जंगल में रहने लगी। नारदजी द्वारा बताये हुए दिन से तीन दिन पूर्व से ही सावित्री ने उपवास शुरू कर दिया। नारदजी द्वारा निश्चित तिथि को जब सत्यवान लकड़ी काटने जंगल के लिए चला तो सास−श्वसुर से आज्ञा लेकर वह भी सत्यवान के साथ चल दी। सत्यवान जंगल में पहुंचकर लकड़ी काटने के लिए वृक्ष पर चढ़ा। वृक्ष पर चढ़ने के बाद उसके सिर में भयंकर पीड़ा होने लगी। वह नीचे उतरा। सावित्री ने उसे बड़ के पेड़ के नीचे लिटा कर उसका सिर अपनी जांघ पर रख लिया। देखते ही देखते यमराज ने ब्रह्माजी के विधान की रूपरेखा सावित्री के सामने स्पष्ट की और सत्यवान के प्राणों को लेकर चल दिये। 'कहीं−कहीं ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि वट वृक्ष के नीचे लेटे हुए सत्यवान को सर्प ने डंस लिया था।' सावित्री सत्यवान को वट वृक्ष के नीचे ही लिटाकर यमराज के पीछे−पीछे चल दी। पीछे आती हुई सावित्री को यमराज ने उसे लौट जाने का आदेश दिया। इस पर वह बोली महाराज जहां पति वहीं पत्नी। यही धर्म है, यही मर्यादा है।
सावित्री की धर्म निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज बोले कि पति के प्राणों के अतिरिक्त कुछ भी मांग लो। सावित्री ने यमराज से सास−श्वसुर के आंखों की ज्योति और दीर्घायु मांगी। यमराज तथास्तु कहकर आगे बढ़ गए। सावित्री यमराज का पीछा करती रही। यमराज ने अपने पीछे आती सावित्री से वापस लौट जाने को कहा तो सावित्री बोली कि पति के बिना नारी के जीवन की कोई सार्थकता नहीं। यमराज ने सावित्री के पति व्रत धर्म से खुश होकर पुनः वरदान मांगने के लिए कहा। इस बार उसने अपने श्वसुर का राज्य वापस दिलाने की प्रार्थना की। तथास्तु कहकर यमराज आगे चल दिये। सावित्री अब भी यमराज के पीछे चलती रही। इस बार सावित्री ने यमराज से सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान मांगा। तथास्तु कहकर जब यमराज आगे बढ़े तो सावित्री बोली आपने मुझे सौ पुत्रों का वरदान दिया है, पर पति के बिना मैं मां किस प्रकार बन सकती हूं। अपना यह तीसरा वरदान पूरा कीजिए।
सावित्री की धर्मिनष्ठा, ज्ञान, विवेक तथा पतिव्रत धर्म की बात जानकर यमराज ने सत्यवान के प्राणों को अपने पाश से स्वतंत्र कर दिया। सावित्री सत्यवान के प्राण को लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुंची जहां सत्यवान का मृत शरीर रखा था। सावित्री ने वट वृक्ष की परिक्रमा की तो सत्यवान जीवित हो उठा। प्रसन्नचित सावित्री अपने सास−श्वसुर के पास पहुंची तो उन्हें नेत्र ज्योति प्राप्त हो गई। इसके बाद उनका खोया हुआ राज्य भी उन्हें मिल गया। आगे चलकर सावित्री सौ पुत्रों की मां बनी। इस प्रकार चारों दिशाएं सावित्री के पतिव्रत धर्म के पालन की कीर्ति से गूंज उठीं।
- शुभा दुबे
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