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Expaliner: 37 साल बाद फिर ‘बंटवारा’, धर्मेंद्र की फिल्म के बाद अब सनी देओल की ‘बंटवारा 1947’ क्या दोहरा पाएगी पुराना जादू?

Batwara vs Batwara 1947: बॉलीवुड के दमदार एक्टर सनी देओल इन दिनों अपनी मच अवेटेड फिल्म ‘बंटवारा 1947’ को लेकर सुर्खियों में हैं. लंबे इंतजार के बाद ये फिल्म आज यानी 14 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है. फिल्म की रिलीज से पहले ही इसे लेकर दर्शकों के बीच काफी एक्साइटमेंट देखने को मिल रही थी. अब फिल्म के शुरुआती रिव्यू और दर्शकों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं, जिनमें फिल्म को लेकर पॉजिटिव बातें सुनने को मिल रही हैं.

लेकिन सनी देओल की इस फिल्म के साथ सिर्फ कहानी, परफॉर्मेंस और बॉक्स ऑफिस का सवाल नहीं जुड़ा है. इसके साथ देओल परिवार की एक पुरानी सिनेमाई याद भी जुड़ी हुई है. दरअसल, साल 1989 में सनी देओल के पिता और दिग्गज एक्टर धर्मेंद्र की फिल्म ‘बंटवारा’ रिलीज हुई थी. ऐसे में अब करीब 37 साल बाद उसी नाम से जुड़ी फिल्म के साथ सनी देओल दर्शकों के बीच पहुंचे हैं. हालांकि दोनों फिल्मों की कहानियां और समय-काल अलग हैं, लेकिन एक जैसा नाम होने की वजह से इनकी तुलना होना हो रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सनी देओल की ‘बंटवारा 1947’ अपने पिता की फिल्म की तरह दर्शकों के दिलों में जगह बना पाएगी?

धर्मेंद्र की ‘बंटवारा’ ने बनाई थी खास पहचान

साल 1989 में रिलीज हुई धर्मेंद्र स्टारर ‘बंटवारा’ उस दौर की पॉपुलर फिल्मों में शामिल थी. फिल्म में धर्मेंद्र के साथ बॉलीवुड के कई बड़े कलाकार नजर आए थे. इसकी स्टारकास्ट अपने आप में काफी मजबूत थी. फिल्म में विनोद खन्ना, डिंपल कपाड़िया, पूनम ढिल्लन, मोहसिन खान, शम्मी कपूर, आशा पारेख, कुलभूषण खरबंदा, अमरीश पुरी और अमृता सिंह जैसे कलाकार महत्वपूर्ण भूमिकाओं में दिखाई दिए थे.

फिल्म की कहानी में रिश्तों, परिवार, संघर्ष और सामाजिक परिस्थितियों के बीच पैदा होने वाले तनाव को दिखाया गया था. उस दौर में फैमिली ड्रामा और बड़े सितारों वाली फिल्मों को दर्शकों का खूब प्यार मिलता था. ‘बंटवारा’ भी इसी वजह से दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब रही. सबसे बड़ी बात ये थी कि उस समय धर्मेंद्र का स्टारडम अपने चरम पर था. उनकी दमदार स्क्रीन प्रेजेंस और एक्शन से लेकर इमोशनल सीन्स तक को दर्शक काफी पसंद करते थे. यही वजह रही कि फिल्म को लेकर दर्शकों में खास क्रेज देखने को मिला.

अब 37 साल बाद सनी देओल की बारी

अब कहानी 37 साल आगे बढ़ चुकी है. सनी देओल की ‘बंटवारा 1947’ आज सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है. फिल्म का बैकग्राउंड भारत के इतिहास के बेहद महत्वपूर्ण और दर्दनाक दौर यानी 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन से जुड़ा है. भारत का विभाजन सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं था, बल्कि इसने लाखों लोगों की जिंदगी बदल दी थी. परिवार बिछड़ गए लोगों को अपना घर और जमीन छोड़कर पलायन करना पड़ा और इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने हिंसा और मुश्किल परिस्थितियों का सामना किया. इसी ऐतिहासिक बैकग्राउंड को फिल्म में कहानी के सेंटर में रखा गया है. ऐसे टॉपिक को पर्दे पर पेश करना आसान नहीं होता क्योंकि इसमें इतिहास, इमोशंस और मानवीय त्रासदी को संतुलित तरीके से दिखाने की चुनौती होती है.

सनी देओल के लिए भी खास है फिल्म

सनी देओल को बॉलीवुड में उनकी दमदार आवाज, इंटेंस स्क्रीन प्रेजेंस और देशभक्ति से जुड़े किरदारों के लिए खास तौर पर जाना जाता है. ‘गदर’ जैसी फिल्मों में उन्होंने जिस तरह के किरदार निभाए हैं, उन्होंने दर्शकों के बीच उनकी एक अलग पहचान बनाई है. ऐसे में ‘बंटवारा 1947’ जैसी ऐतिहासिक बैकग्राउंड वाली फिल्म से दर्शकों की उम्मीदें स्वाभाविक तौर पर ज्यादा हैं. सनी देओल की पॉपुलेरिटी फिल्म के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट मानी जा रही है. फिल्म के जरिए एक बार फिर सनी देओल ऐसे टॉपिक के साथ दर्शकों के सामने आए हैं, जिसमें देश, इतिहास, परिवार और भावनाओं का मेल देखने को मिलता है.

क्या पिता की फिल्म का जादू दोहरा पाएंगे सनी?

यही सवाल फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा में है. 37 साल पहले धर्मेंद्र की ‘बंटवारा’ और अब सनी देओल की ‘बंटवारा 1947’ के बीच एक लंबा अंतर है. इस दौरान हिंदी सिनेमा पूरी तरह बदल चुका है. 1989 के समय फिल्मों की रिलीज, प्रमोशन, दर्शकों तक पहुंच और बॉक्स ऑफिस का तरीका आज से बिल्कुल अलग था. उस दौर में किसी फिल्म की सफलता का सबसे बड़ा आधार सिनेमाघरों में दर्शकों की भीड़ और लंबे समय तक चलने वाला प्रदर्शन हुआ करता था.

आज के दौर में फिल्म की सफलता सिर्फ बॉक्स ऑफिस कलेक्शन से तय नहीं होती. सोशल मीडिया पर चर्चा, ऑनलाइन रिव्यू, ऑडियंस रिएक्शन और पहले वीकेंड का प्रदर्शन भी काफी मायने रखता है. इसलिए दोनों फिल्मों की सीधी तुलना करना आसान नहीं होगा. फिर भी एक ही परिवार और एक जैसे नाम की वजह से दर्शकों के बीच यह तुलना होना आम बात है.

सिर्फ नाम है एक जैसा

वहीं ये भी समझना जरूरी है कि ‘बंटवारा’ और ‘बंटवारा 1947’ को एक ही कहानी की फिल्म नहीं माना जा सकता. दोनों के बीच कई दशकों का अंतर है और दोनों की कहानी का फोकस भी अलग है. 1989 की फिल्म में जहां पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक संघर्षों को प्रमुखता दी गई थी, वहीं ‘बंटवारा 1947’ का आधार विभाजन के दौर की घटनाएं और उससे जुड़े मानवीय पहलू हैं. इस लिहाज से सनी देओल की फिल्म अपने आप में एक अलग कहानी लेकर आई है. ऐसे में फिल्म को सिर्फ धर्मेंद्र की पुरानी फिल्म के आधार पर जज करना सही नहीं होगा.

FAQ

1. ‘बंटवारा 1947’ कब रिलीज हुई है?
सनी देओल की फिल्म ‘बंटवारा 1947’ 14 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई है.

2. क्या ‘बंटवारा 1947’ धर्मेंद्र की फिल्म ‘बंटवारा’ का सीक्वल है?
नहीं, दोनों फिल्मों की कहानियां अलग हैं. दोनों के नाम एक जैसे होने की वजह से इनकी तुलना की जा रही है.

3. धर्मेंद्र की ‘बंटवारा’ कब रिलीज हुई थी?
धर्मेंद्र स्टारर ‘बंटवारा’ साल 1989 में रिलीज हुई थी. फिल्म में उनके साथ विनोद खन्ना, डिंपल कपाड़िया और अमरीश पुरी जैसे कलाकार नजर आए थे.

4. ‘बंटवारा 1947’ की कहानी किस दौर पर आधारित है?
फिल्म की कहानी 1947 में हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन की बैकग्राउंड पर आधारित है और उस दौर के मानवीय संघर्षों को दिखाती है.

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Explainer: क्या होता है पिंसर अटैक? सऊदी अबर को क्यों सता रहा है डर, दुनिया पर क्या होगा असर

Explainer: पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है.  हालिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ईरान समर्थित हूती विद्रोही और इराकी सशस्त्र गुट सऊदी अरब के खिलाफ समन्वित हमले की तैयारी कर सकते हैं. हालांकि, इस तरह के संभावित हमले की पूरी योजना और समय को लेकर सार्वजनिक रूप से स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. इतना जरूर है कि पिछले दिनों सऊदी तेल प्रतिष्ठानों और अन्य ठिकानों पर हमलों के दावों ने खतरे को गंभीर बना दिया है.

क्या है ‘पिंसर अटैक’?

‘पिंसर अटैक’ यानी कैंची जैसी सैन्य रणनीति. इसमें किसी लक्ष्य पर एक दिशा से हमला करने के बजाय अलग-अलग दिशाओं से दबाव बनाया जाता है. इसका मकसद सामने वाले की रक्षा व्यवस्था को कई मोर्चों पर उलझाना होता है.

सऊदी अरब के मामले में चर्चा दक्षिण में यमन की दिशा और उत्तर की ओर इराक से जुड़े संभावित हमलों को लेकर है. इसे व्यापक अर्थ में ‘मल्टीपल कोऑर्डिनेटेड अटैक’ कहा जा रहा है.

खतरा सिर्फ हूतियों तक सीमित नहीं

सऊदी अरब के लिए चुनौती इसलिए ज्यादा गंभीर मानी जा रही है क्योंकि हालिया तनाव में हूतियों के साथ इराक के ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों का नाम भी सामने आया है. एक वरिष्ठ सऊदी अधिकारी ने बताया था कि रियाद को कई खुफिया रिपोर्ट मिली हैं, जिनमें हूतियों और इराकी गुटों के बीच संभावित समन्वय की बात कही गई थी.

हालांकि इन दावों को स्वतंत्र रूप से पूरी तरह सत्यापित करना मुश्किल है. इराकी सरकार ने दूसरी ओर कहा है कि उसकी जमीन का इस्तेमाल दूसरे देशों पर हमले के लिए नहीं होना चाहिए.

ईरान और ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ का कनेक्शन

इस पूरे घटनाक्रम में ईरान समर्थित क्षेत्रीय नेटवर्क की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं. हूती आंदोलन को लंबे समय से ईरान का समर्थन हासिल रहा है, जबकि इराक में कई सशस्त्र गुट भी तेहरान के करीब माने जाते हैं.

हालिया घटनाओं में इन गुटों के बीच सहयोग की संभावना पर चर्चा तेज हुई है. इससे सऊदी अरब को एक साथ कई दिशाओं से सुरक्षा चुनौती का सामना करना पड़ सकता है.

सऊदी के तेल ठिकाने क्यों बन सकते हैं निशाना?

सऊदी अरब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल उत्पादक देशों में है. उसकी ऊर्जा अवसंरचना पर हमला सिर्फ स्थानीय सुरक्षा समस्या नहीं होगा, बल्कि इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार तक पहुंच सकता है.

13 अगस्त को हूतियों ने जिजान स्थित सऊदी अरामको रिफाइनरी को दो ड्रोन से निशाना बनाने का दावा किया. हूती मीडिया के मुताबिक यह हमला यमन में सऊदी कार्रवाई के जवाब में किया गया. सऊदी अरब ने उस समय इस दावे पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी थी.

तेल के बाद एयरपोर्ट और बंदरगाह भी अहम लक्ष्य

संभावित हमलों को लेकर चिंता केवल तेल प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं है. सऊदी अरब के एयरपोर्ट, बंदरगाह और महत्वपूर्ण परिवहन ढांचा भी रणनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता है.

अगर किसी देश के ऊर्जा और परिवहन नेटवर्क पर एक साथ दबाव बनाया जाए तो सैन्य नुकसान के साथ आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित हो सकती हैं.

एयर डिफेंस के सामने सबसे बड़ी चुनौती

सऊदी अरब के पास आधुनिक एयर डिफेंस क्षमताएं हैं, लेकिन ड्रोन और मिसाइलों से एक साथ कई दिशाओं में हमला होने की स्थिति में किसी भी देश के लिए चुनौती बढ़ सकती है.

रक्षा प्रणाली को एक साथ अलग-अलग दिशाओं से आने वाले लक्ष्यों की पहचान, ट्रैकिंग और इंटरसेप्शन करना पड़ता है. यही कारण है कि बड़े पैमाने पर समन्वित हमले की आशंका को गंभीरता से लिया जाता है.

हूतियों ने फिर बढ़ाई सऊदी की चिंता

हाल के घटनाक्रमों ने पुराने सऊदी-हूती तनाव को फिर से उभार दिया है. हूतियों ने सऊदी तेल प्रतिष्ठानों पर हमलों के दावे किए हैं और क्षेत्रीय शिपिंग को भी निशाना बनाया है. 11 अगस्त को बाब अल-मंदेब क्षेत्र में एक जहाज पर हूती हमले में कई लोगों की मौत की रिपोर्ट सामने आई.

विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर समुद्री मार्गों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर दबाव लगातार बढ़ता है तो इसका प्रभाव क्षेत्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है.

सऊदी ने भी बदली अपनी सुरक्षा रणनीति

बढ़ते खतरे के बीच सऊदी अरब केवल सैन्य जवाब पर निर्भर रहने के बजाय क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग मजबूत कर रहा है. 7 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने एक पारस्परिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसके तहत किसी सदस्य पर हमला होने की स्थिति में सामूहिक सुरक्षा प्रतिक्रिया का प्रावधान है.

इसके अलावा रियाद क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है.

क्या सच में दो तरफ से हमला होगा?

यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है. फिलहाल उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी से यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि सऊदी अरब के खिलाफ किसी पूर्ण ‘पिंसर अटैक’ की योजना अंतिम रूप ले चुकी है.

हालांकि, खुफिया चेतावनियों, हालिया ड्रोन और मिसाइल हमलों तथा हूती और इराकी गुटों से जुड़े बढ़ते तनाव ने बहु-दिशात्मक हमले की आशंका जरूर बढ़ाई है.

इसका दुनिया पर क्या पड़ेगा असर?

अगर सऊदी अरब की महत्वपूर्ण तेल और परिवहन अवसंरचना पर बड़े पैमाने पर हमला होता है तो इसका असर केवल खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा. तेल की आपूर्ति, शिपिंग बीमा, समुद्री व्यापार और वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है.

सऊदी अरब पहले ही क्षेत्रीय तनाव के बीच कूटनीति और सुरक्षा गठबंधनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है.

पश्चिम एशिया में बढ़ सकता है बड़ा टकराव

सबसे बड़ा खतरा यह है कि किसी बड़े हमले के बाद जवाबी कार्रवाई शुरू हो जाए. इससे यमन, इराक, ईरान और खाड़ी क्षेत्र के बीच तनाव और बढ़ सकता है.

ऐसे में ‘पिंसर अटैक’ की चर्चा केवल एक सैन्य रणनीति नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया में संभावित बड़े क्षेत्रीय संघर्ष की चेतावनी के रूप में देखी जा रही है. आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि खुफिया चेतावनियां वास्तविक हमले में बदलती हैं या कूटनीतिक प्रयास तनाव को और बढ़ने से रोक लेते हैं.

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