Expaliner: 90's का 15 अगस्त होता था खास, झंडा फहराने के बाद टीवी के सामने क्यों जुटता था पूरा परिवार?
Independence Day Special: आज 15 अगस्त का मतलब सिर्फ स्कूल में झंडारोहण या छुट्टी नहीं रह गया है. मोबाइल, सोशल मीडिया और ओटीटी के दौर में देशभक्ति से जुड़ा कंटेंट हर समय आसानी से मिल जाता है. लेकिन 90 के दशक में ऐसा नहीं था. उस दौर में एंटरटेनमेंट के लिए लिमिटेड ऑप्शन होते थे, जिसमें से एक टीवी था. खासकर 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे मौकों पर दूरदर्शन का माहौल ही अलग ही होता था. सुबह झंडारोहण और देशभक्ति कार्यक्रमों के बाद परिवार की नजर टीवी पर टिक जाती थी.
90's में 15 अगस्त का अलग था माहौल
90 के दशक में में हर घर में इंटरनेट, स्मार्टफोन और ओटीटी प्लेटफॉर्म नहीं होते थे. ज्यादातर परिवारों के लिए टीवी ही मनोरंजन का सबसे बड़ा जरिया होता था. चैनलों की संख्या भी बहुत कम थी। ऐसे में जब कोई खास दिन आता था तो लोगों को टीवी पर दिखाए जाने वाले खास प्रोग्राम का इंतजार रहता था. 15 अगस्त की सुबह स्कूलों और अलग-अलग जगहों पर झंडारोहण होता था. बच्चे तिरंगा लेकर कार्यक्रमों में शामिल होते थे. घर लौटने के बाद नाश्ता और खाना होता था.
इसके बाद फिर टीवी का नंबर आता था. सभी लोग एक साथ बैठकर दूरदर्शन पर देशभक्ति से जुड़े कार्यक्रम, गाने और फिल्में देखते थे. वहीं, कुछ लोगों के घरों में तो टीवी भी नहीं होती थी, ऐसे में लोग एक घर में जमा होते थे. यही वजह है कि उस समय स्वतंत्रता दिवस सिर्फ एक राष्ट्रीय त्योहार नहीं, बल्कि परिवार के साथ समय बिताने का मौका भी होता है.
दूरदर्शन की फिल्मों का रहता था इंतजार
उस दौरा में टीवी पर दूरदर्शन का बोल बाला चलता था, क्योंकि टीवी पर बस यही चैनल आता था. वहीं, उस समय किसी फिल्म को टीवी पर दिखाया जाना भी एक बड़ा इवेंट जैसा लगता था. आज एक फिल्म पसंद नहीं आई तो कुछ ही सेकंड में दूसरी फिल्म या सीरीज लगाई जा सकती है. लेकिन उस दौर में ऐसे ऑप्शन नहीं होते थे. टीवी पर कोई फेमस फिल्म आने वाली होती थी तो लोग उसका इंतजार करते थे. 15 अगस्त पर देशभक्ति फिल्में स्ट्रीम की जाती थी और लोग साथ बैठकर देखते थे.
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देशभक्ति फिल्मों से जुड़ी भावनाएं
बता दें, तब 15 अगस्त पर दिखाई जाने वाली फिल्मों में सिर्फ युद्ध और सैनिकों की कहानी नहीं होती थी. इन फिल्मों में देश के लिए कुर्बानी, परिवार, दोस्ती और मुश्किलों से लड़ने जैसी बातें भी दिखाई जाती थीं. यही वजह है कि ये फिल्में लोगों को पसंद आती थीं. इनमें मनोज कुमार की ‘उपकार’, ‘पूरब और पश्चिम’ और ‘क्रांति’ से लेकर ‘बॉर्डर’ और ‘तिरंगा’ तक कई फिल्मों ने लोगों के दिल में खास जगह बनाई है. फिल्मों में देशभक्ति दिखाई जाती थी, लेकिन टीवी पर बार-बार आने की वजह से ये फिल्में हर घर तक पहुंच गईं.
खासकर ‘बॉर्डर’ लोगों को खूब पसंद आई. 1997 में आई इस फिल्म के गाने, डायलॉग और युद्ध के सीन आज भी याद किए जाते हैं. 15 अगस्त पर ऐसी फिल्में टीवी पर देखना लोगों के लिए पुरानी यादों को फिर से जीने जैसा होता था. आज की बात करे तो टीवी तो लोग देखते ही नहीं है क्योंकि ओटीटी पर इतने ज्यादा ऑप्शन हैं कि जो फिल्में देखने का मन करे लोग वो देखते हैं. इतना ही नहीं, मूवीज के अलावा देशभक्ति सीरीज भी हैं.
देशभक्ति गानों का था क्रेज
फिल्मों के अलावा 90 के दशक में लोगों को देशभक्ति गाने भी काफी पसंद थे. आज भी 15 अगस्त के मौके पर कई पुराने गाने सुनाई देते हैं. ‘संदेसे आते हैं’, ‘ऐ मेरे प्यारे वतन’, ‘मेरे देश की धरती’ और ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ जैसे गाने तो लोगों की यादों का हिस्सा बन चुके हैं. हालांकि उस समय लोगों के पास म्यूजिक सुनना का ऑप्शन नहीं होता था. लोग बस टीवी पर ही गाना सुन पाते थे. वहीं, फिल्मों के बीच आने वाले गाने भी लोगों को पसंद आते थे.
बच्चों के लिए कैसा रहता था स्वतंत्रता दिवस?
90's के बच्चों के लिए 15 अगस्त का मतलब सिर्फ छुट्टी नहीं, बल्कि स्कूल के खास कार्यक्रम भी होते थे. बच्चे देशभक्ति गानों पर डांस करते थे, भाषण देते थे और तिरंगा लेकर कार्यक्रम में हिस्सा लेते थे. घर आने के बाद टीवी पर फिल्मों और गानों के जरिए वो देशभक्ति वाला माहौल फिर देखने को मिलता था. उस समय आज की तरह मोबाइल और इंटरनेट पर हजारों वीडियो देखने का ऑप्शन नहीं था. इसलिए टीवी पर आने वाली फिल्मों की इंपोर्टेंस काफी ज्यादा होती थी.
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कितना बदला गया समय
90’s और आज के समय का स्वतंत्रता दिवस मनाने का तरीका काफी बदल गया है. 90 के दशक में 15 अगस्त का मतलब स्कूल में झंडारोहण, देशभक्ति गीत, परेड और टीवी पर दूरदर्शन के खास कार्यक्रम हुआ करता था. परिवार एक साथ बैठकर देशभक्ति फिल्में और गाने देखते थे. जिन घरों में टीवी नहीं होता था, वहां लोग पड़ोसियों के घर जमा हो जाते थे. आज के दौर में इंटरनेट, सोशल मीडिया और ओटीटी ने इसे काफी बदल दिया है. लोग देशभक्ति पोस्ट शेयर करने के साथ फिल्मों, वेब सीरीज और ऑनलाइन कार्यक्रमों का आनंद लेते हैं। यानी जश्न का तरीका बदला है, लेकिन देश के प्रति जुड़ी भावनाएं आज भी वही हैं.
FAQs
1. 90s में 15 अगस्त कैसे मनाया जाता था?
झंडारोहण, देशभक्ति कार्यक्रमों और टीवी पर फिल्में देखकर लोग जश्न मनाते थे.
2. 90s में 15 अगस्त पर टीवी पर क्या आता था?
दूरदर्शन पर देशभक्ति गाने, कार्यक्रम और फिल्में दिखाई जाती थीं.
3. 90s में कौन सी देशभक्ति फिल्में पसंद थीं?
लोगों को टीवी पर ‘उपकार’, ‘क्रांति’, ‘पूरब और पश्चिम’, ‘बॉर्डर’ जैसी फिल्में देखने को मिलती थी.
4. 90s में देशभक्ति गानों का इतना क्रेज क्यों था?
टीवी और रेडियो ही मनोरंजन के बड़े साधन होते थे, ऐसे में गाने आसानी से लोगों तक पहुंच जाते थे.
5. आज 15 अगस्त मनाने का तरीका कैसे बदला है?
अब इंटरनेट, ओटीटी, सोशल मीडिया और ऑनलाइन कंटेंट ने मनोरंजन के विकल्प बढ़ा दिए हैं.
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भोपाल के सरकारी स्कूलों की बदहाल तस्वीर, जर्जर छत के नीचे बारिश में पढ़ने को मजबूर बच्चे
भोपाल के बैरागढ़ इलाके में बारिश के दौरान सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की परेशानी बढ़ गई है। वार्ड क्रमांक-3 की नई बस्ती शासकीय स्कूल में तेज बारिश के बाद पानी भर जाता है।
कई बार स्थिति ऐसी हो जाती है कि स्कूल आने-जाने वाले बच्चों और शिक्षकों को घुटनों तक पानी से होकर गुजरना पड़ता है। दूसरी ओर एच वार्ड की शासकीय माध्यमिक शाला की इमारत भी लंबे समय से मरम्मत का इंतजार कर रही है। यहां छत के कई हिस्सों में छेद हैं और दीवारों में सीलन व टूट-फूट दिखाई देती है।
नई बस्ती स्कूल में घुटनों तक पानी से बढ़ी परेशानी
वार्ड क्रमांक-3 स्थित नई बस्ती शासकीय स्कूल में बारिश के बाद जलभराव की समस्या सामने आ रही है। तेज बारिश होने पर स्कूल परिसर और आसपास पानी जमा हो जाता है। स्थानीय स्थिति के अनुसार कई बार पानी घुटनों तक पहुंचने की बात सामने आई है।
ऐसे में बच्चों और शिक्षकों के लिए स्कूल तक पहुंचना आसान नहीं रहता। बच्चों को पानी के बीच से होकर निकलना पड़ता है। बारिश के पानी में सड़क और जमीन की स्थिति साफ दिखाई नहीं देती, जिससे फिसलने या चोट लगने का खतरा भी बना रहता है।
एच वार्ड के सरकारी स्कूल की छत और दीवारें बदहाल
बैरागढ़ के एच वार्ड स्थित शासकीय माध्यमिक शाला की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है। इस स्कूल में करीब 234 बच्चे पढ़ाई करते हैं। बच्चों की संख्या को देखते हुए स्कूल भवन का सुरक्षित और मजबूत होना बेहद जरूरी है, लेकिन भवन के कई हिस्सों में लंबे समय से खराबी दिखाई दे रही है।
स्कूल की दीवारों में सीलन और टूट-फूट है। बारिश के दौरान सबसे बड़ी परेशानी छत से जुड़ी है। छत के कुछ हिस्सों में छेद होने के कारण पानी कक्षाओं के अंदर टपकता है। बारिश के समय बच्चों के सामने पढ़ाई करने के लिए बैठने की जगह भी प्रभावित हो सकती है।
234 बच्चों की पढ़ाई पर बारिश का असर
एच वार्ड के स्कूल में करीब 234 बच्चे पढ़ते हैं। इन बच्चों के लिए स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं है, बल्कि दिन का बड़ा हिस्सा यहीं गुजरता है। ऐसे में स्कूल भवन का सुरक्षित होना उनकी शिक्षा के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।
जब कक्षा में छत से पानी गिरता है तो शिक्षक के लिए पढ़ाना भी मुश्किल हो जाता है। बच्चों को भी अपना ध्यान पढ़ाई पर लगाने में परेशानी होती है। बारिश की आवाज, पानी से बचने की कोशिश और गीली जगह के कारण कक्षा का सामान्य माहौल बदल जाता है।
1962 से संचालित है स्कूल
एच वार्ड की शासकीय माध्यमिक शाला लंबे समय से क्षेत्र के बच्चों को शिक्षा दे रही है। बताया गया है कि स्कूल वर्ष 1962 से संचालित हो रहा है। बाद में वर्ष 2007 में नई बिल्डिंग का निर्माण किया गया था।
नई इमारत बने भी कई साल गुजर चुके हैं। समय के साथ किसी भी भवन में मरम्मत की जरूरत पड़ती है। छत, दीवार, फर्श, पानी की निकासी और अन्य हिस्सों की नियमित देखभाल नहीं होने पर भवन धीरे-धीरे खराब होने लगता है।
स्कूल परिसर में घास, फिसलन और कचरे की समस्या
बारिश के बाद स्कूल परिसर में घास तेजी से बढ़ जाती है। पानी और घास के कारण जमीन पर फिसलन बढ़ सकती है। छोटे बच्चे खेलते या चलते समय गिर सकते हैं। इसलिए बारिश के मौसम में स्कूल परिसर की नियमित सफाई और घास की कटाई जरूरी हो जाती है।
इसके साथ ही स्कूल प्रबंधन के सामने कचरे की समस्या भी है। बताया गया है कि आसपास के कुछ लोग स्कूल परिसर में कचरा फेंक देते हैं। इससे स्कूल का वातावरण खराब होता है और बारिश के दौरान परेशानी और बढ़ सकती है।
बारिश में जीव-जंतुओं का खतरा भी बढ़ा
बारिश के मौसम में खाली जगहों, घास और कचरे के आसपास जीव-जंतुओं के आने का खतरा बढ़ जाता है। स्कूल परिसर में अगर घास ज्यादा हो, कचरा जमा हो और पानी रुका रहे तो बच्चों के लिए यह स्थिति और चिंता की वजह बन सकती है।
स्कूल में छोटे बच्चे पढ़ते हैं। वे खेलते समय या परिसर में घूमते हुए ऐसी जगहों तक पहुंच सकते हैं जहां उन्हें खतरे का अंदाजा न हो। इसलिए स्कूल की सफाई केवल सुंदरता के लिए नहीं बल्कि बच्चों की सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।
जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत अब जरूरी
बैरागढ़ के इन स्कूलों की स्थिति से यह साफ होता है कि सरकारी स्कूलों के भवनों की नियमित जांच और मरम्मत पर ध्यान देने की जरूरत है। किसी भी भवन में दरार, सीलन, छत से पानी गिरना या प्लास्टर टूटना जैसी समस्या दिखाई दे तो उसे समय रहते ठीक किया जाना चाहिए।
बारिश का मौसम आने से पहले स्कूल भवनों का निरीक्षण किया जाए तो कई समस्याओं का समाधान पहले ही किया जा सकता है। छत की जांच, पानी की निकासी, दीवारों की स्थिति और बिजली की व्यवस्था को देखना जरूरी है।
जलभराव से बच्चों की रोजमर्रा की पढ़ाई प्रभावित
जलभराव का असर केवल स्कूल आने-जाने तक सीमित नहीं रहता। अगर स्कूल परिसर में लंबे समय तक पानी जमा रहे तो बच्चों के लिए सामान्य गतिविधियां भी मुश्किल हो जाती हैं। प्रार्थना, खेल, आवाजाही और कक्षा बदलने जैसी छोटी गतिविधियां भी प्रभावित हो सकती हैं।
अगर बारिश लगातार होती है तो समस्या और बढ़ जाती है। बच्चे गीले कपड़ों में स्कूल पहुंचते हैं और उन्हें पूरे समय असुविधा हो सकती है। छोटे बच्चों के लिए यह स्थिति खास तौर पर परेशान करने वाली होती है।
स्कूल प्रबंधन ने विभाग को दी जानकारी
स्कूल के प्रभारी प्राचार्य सीएस मरावी के अनुसार भवन की मरम्मत, जल निकासी और परिसर की सफाई की जरूरत है। स्कूल प्रबंधन की ओर से संबंधित विभाग को समस्याओं की जानकारी दी गई है।
स्कूल प्रबंधन का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जरूरी सावधानियां बरती जा रही हैं। हालांकि स्थायी समाधान के लिए भवन की मरम्मत और पानी की निकासी की व्यवस्था को ठीक करना जरूरी होगा।
रवि नाथानी की रिपोर्ट
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