4 जून 1947... दिल्ली के गर्म कमरों में जब लॉर्ड माउंटबेटन ने 15 अगस्त की तारीख का ऐलान किया, तो मुल्क की सांसें थम गईं। दो सौ सालों की गुलामी की जंजीरें टूटने वाली थीं, सियासत के गलियारों में जश्न की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं। लेकिन ठीक उसी वक्त, पूरे हिंदुस्तान के ज्योतिषी पंचांग के पन्नों में सिर झुकाए एक गहरा सन्नाटा महसूस कर रहे थे। लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लापिएर की किताब फ्रीडम एट मिडनाइट के पन्नों को पलटें तो एक चौंकाने वाली हकीकत सामने आती है। जिस दिन भारत अपनी आजादी की सांस लेने वाला था, ज्योतिष की गणनाओं में वो पल किसी नए राष्ट्र की पैदाइश के लिए बेहद मनहूस माना गया था। यह कहानी है सियासत की जिद, कैलेंडर की तारीख और सितारों के उस टकराव की, जिसने 15 अगस्त की उस रात को हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया।
ज्योतिषियों ने 15 अगस्त पर आपत्ति क्यों जताई?
15 अगस्त को शुक्रवार था। फ्रीडम एट मिडनाइट में बताए गए ज्योतिषियों के अनुसार, इतनी महत्वपूर्ण शुरुआत के लिए यह दिन अच्छा नहीं माना गया। जैसे ही तय तारीख की खबर फैली, कलकत्ता, बनारस और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में ज्योतिषियों ने ग्रहों की स्थिति की जांच शुरू कर दी और भारत के जन्म के लिए चार्ट तैयार करने लगे। कहा जाता है कि उनमें से एक, कलकत्ता के स्वामी मदानंद, माउंटबेटन की घोषणा सुनते ही अपने खगोलीय चार्ट देखने के लिए दौड़ पड़े। कहा जाता है कि जो कुछ मदननंद ने देखा, उससे वे घबरा गए। उन्हें लगा कि ग्रहों की स्थिति नए आज़ाद हुए देश के लिए अनिश्चित भविष्य की ओर इशारा कर रही है, इसलिए उन्होंने माउंटबेटन को पत्र लिखकर तारीख पर फिर से विचार करने को कहा। उनकी चेतावनी में कहा गया था कि "अगर बाढ़, सूखा, अकाल और नरसंहार जैसी घटनाएं होती हैं, तो इसकी वजह यह होगी कि आज़ाद भारत का जन्म सितारों के हिसाब से एक अशुभ दिन हुआ था।" इस बात का ज़िक्र लैपियर और कॉलिन्स की किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में किया गया है।
तारीख तो नहीं बदली जा सकती थी, लेकिन समय बदला जा सकता था
हालांकि, तब तक 15 अगस्त की तारीख बदलना व्यावहारिक नहीं था। माउंटबेटन इसकी घोषणा पहले ही कर चुके थे और सत्ता के हस्तांतरण की तैयारियां चल रही थीं। उस दौर की बातों के अनुसार, इसका समाधान उसी तारीख के भीतर एक शुभ मुहूर्त या सही समय ढूंढना था। इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे चर्चा अभिजीत मुहूर्त की ओर बढ़ी, जिसका ज़िक्र ज्योतिषी केएन राव ने अपनी किताब द नेहरू डायनेस्टी: एस्ट्रो-पॉलिटिकल पोर्ट्रेट्स ऑफ़ नेहरू, इंदिरा, संजय एंड राजीव में किया है। राव के बताए कारणों में एक पुष्य नक्षत्र भी था, जिसे पारंपरिक रूप से किसी भी महत्वपूर्ण काम की शुरुआत के लिए शुभ माना जाता है। इसलिए चर्चा इस बात से हटकर कि क्या 15 अगस्त की तारीख छोड़ दी जाए, इस बात पर केंद्रित हो गई कि क्या भारत की आज़ादी का सही समय हिंदू कैलेंडर के अनुसार ज़्यादा शुभ माना जाने वाला समय चुना जा सकता है।
नेहरू को आधी रात का समाधान कैसे मिला
माउंटबेटन के पास 15 अगस्त चुनने की अपनी वजह थी। फ्रीडम एट मिडनाइट में उनके हवाले से बताया गया है कि यह तारीख उन्होंने इसलिए चुनी क्योंकि वे चाहते थे कि सत्ता का हस्तांतरण जल्द हो। उन्होंने आखिरकार 15 अगस्त को चुना क्योंकि यह दूसरे विश्व युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण की दूसरी सालगिरह थी। तारीख पहले ही तय हो चुकी थी, इसलिए भारतीय नेताओं को उसी के हिसाब से काम करना पड़ा, न कि उसे बदलना पड़ा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेहरू एक दिलचस्प समझौते पर पहुँचे। संविधान सभा की बैठक 14 अगस्त की दोपहर को होनी थी और यह आधी रात तक चलनी थी। राव लिखते हैं नेहरू को एक दिलचस्प समझौता सूझा। उन्होंने 14 अगस्त की दोपहर को संविधान सभा की बैठक बुलाई और इसे आधी रात तक जारी रखा, जब पश्चिमी रीति-रिवाजों के अनुसार 15 अगस्त की शुरुआत हुई और ज़ीरो आवर (मध्यरात्रि का समय) हिंदू कैलेंडर के अनुसार शुभ समय के दायरे में आया।
आधी रात को आज़ाद भारत का जन्म
इस व्यवस्था का मतलब था कि 15 अगस्त ही भारत का स्वतंत्रता दिवस बना रहेगा, जबकि सत्ता का वास्तविक हस्तांतरण आधी रात को होगा। 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में बताया गया है कि ज्योतिषियों ने आखिरकार 14 अगस्त को अधिक अनुकूल समय माना और माउंटबेटन ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया।
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एक ओर राहुल गांधी लगातार आरएसएस के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं तो वहीं उनकी पार्टी के तमाम नेताओं में भी आरएसएस के खिलाफ निचले स्तर के बयान देने की होड़ लगी हुई है। इसी होड़ाहोड़ी में अपनी भी मौजूदगी दर्ज कराते हुए कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने ऐसा फैसला किया है जोकि सीधे सीधे आरएसएस पर निशाना साधने की कार्रवाई माना जा रहा है। इस तरह कर्नाटक में RSS की गतिविधियों को लेकर कांग्रेस सरकार और भारतीय जनता पार्टी के बीच टकराव अब सड़क और प्रशासनिक आदेशों से निकलकर विधानसभा तक पहुंचता दिख रहा है। हम आपको बता दें कि राज्य मंत्रिमंडल ने ‘Karnataka Regulation of Use of Government Premises and Public Property Bill, 2026’ को मंजूरी दे दी है। प्रस्तावित कानून के तहत सरकारी जमीन, भवन, सड़क, पार्क, खेल मैदान और सरकारी सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों जैसी सार्वजनिक संपत्तियों पर निजी कार्यक्रम, बैठक, रैली या अन्य आयोजन करने से पहले सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य होगा।
राज्य सरकार का तर्क है कि सार्वजनिक संपत्ति के इस्तेमाल के लिए स्पष्ट नियम, दस्तावेजी प्रक्रिया और प्रशासनिक अनुमति जरूरी है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा है कि यह व्यवस्था किसी एक दल या संगठन को निशाना बनाने के लिए नहीं है। उनका कहना है कि हर संगठन को नियमों का पालन करना होगा और सार्वजनिक स्थानों पर कार्यक्रम अपनी इच्छा से आयोजित नहीं किए जा सकते। यही तर्क सरकार के अन्य नेताओं की ओर से भी दिया गया है।
लेकिन राजनीतिक विवाद की असली वजह विधेयक के प्रावधानों से अधिक उसका संदर्भ है। RSS और BJP इसे संगठन की सार्वजनिक गतिविधियों पर नियंत्रण की कोशिश मान रहे हैं। RSS की शाखाएं, बैठकें और ‘संचलन’ अक्सर सार्वजनिक मैदानों में होते हैं। ऐसे में रोजाना लगने वाली शाखाओं समेत हर आयोजन के लिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था आरएसएस की नियमित गतिविधियों को प्रशासनिक स्वीकृति पर निर्भर कर सकती है। प्रस्तावित कानून में सार्वजनिक सड़कों पर होने वाले जुलूस और कार्यक्रम भी दायरे में आते हैं।
हम आपको याद दिला दें कि विवाद की जड़ अक्टूबर 2025 में दिखाई दी थी, जब राज्य सरकार ने सार्वजनिक संपत्ति पर कार्यक्रमों के लिए पुलिस और राजस्व अधिकारियों से पूर्व अनुमति लेने का आदेश जारी किया था। इसी अवधि में चित्तापुर में RSS के प्रस्तावित रूट मार्च को अनुमति नहीं मिली। उस समय भी यह सवाल उठा था कि क्या प्रशासनिक आदेश के जरिए सार्वजनिक सभाओं और जुलूसों को इस तरह नियंत्रित किया जा सकता है।
मामला कर्नाटक हाई कोर्ट तक पहुंचा और अदालत ने उस सरकारी आदेश पर रोक लगाते हुए संविधान के अनुच्छेद 19 में निहित अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा के अधिकारों से जुड़े सवालों पर गौर किया। अदालत के समक्ष यह दलील भी रखी गई कि मौलिक अधिकारों को केवल प्रशासनिक आदेश के जरिए सीमित नहीं किया जा सकता।
अब राज्य सरकार उसी विवाद को विधायी रास्ते से सुलझाने की कोशिश कर रही है। यही बिंदु RSS और BJP की सबसे बड़ी आपत्ति है। उनका आरोप है कि जिस व्यवस्था को लेकर अदालत में सवाल उठे थे, उसे अब कानून बनाकर लागू करने का प्रयास किया जा रहा है। राज्य सरकार के सामने हालांकि यह तर्क है कि नया कानून केवल RSS के लिए नहीं, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति का इस्तेमाल करने वाले सभी निजी व्यक्तियों, संस्थाओं, क्लबों और संगठनों पर समान रूप से लागू होगा।
वहीं BJP प्रदेश अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने राज्य सरकार पर RSS की गतिविधियों को सीमित करने का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री और राज्य के गृह मंत्री को खुली चुनौती दी है। उनका कहना है कि यदि सरकार को RSS से आपत्ति है तो वह सीधे प्रतिबंध की बात करे, न कि सामान्य नियमों की आड़ में संगठन की गतिविधियों को प्रभावित करे। विजयेंद्र ने RSS को राष्ट्रवाद, सेवा और सामाजिक कार्यों से जुड़ा संगठन बताते हुए सरकार को इतिहास से सबक लेने की सलाह भी दी।
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि मामला केवल एक संगठन के कार्यक्रम की अनुमति का नहीं रह गया है। यह सवाल अब सार्वजनिक संपत्ति के नियमन, प्रशासनिक विवेक, मौलिक अधिकार और राजनीतिक निष्पक्षता, चारों को एक साथ छू रहा है। राज्य की कांग्रेस सरकार के लिए चुनौती यह होगी कि वह साबित करे कि प्रस्तावित कानून वास्तव में समान रूप से लागू होगा और किसी खास संगठन को रोकने का माध्यम नहीं बनेगा।
दूसरी ओर, राजनीतिक रूप से यह टकराव कांग्रेस और RSS-BJP के बीच पहले से मौजूद वैचारिक संघर्ष को और तीखा कर सकता है। यह भी सामने नजर आ रहा है कि इस विवाद का फैसला केवल विधानसभा में नहीं होगा। अदालतों, प्रशासनिक अमल और सबसे बढ़कर जनता की प्रतिक्रिया में भी इसकी गूंज सुनाई देगी। कर्नाटक की राजनीति में RSS को लेकर उठी यह लड़ाई आने वाले समय में कांग्रेस बनाम BJP के व्यापक वैचारिक संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन सकती है।
वहीं भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने इस मुद्दे पर कहा है कि कर्नाटक राज्य कैबिनेट का यह फ़ैसला कि गैर-पंजीकृत सामाजिक संगठनों को सार्वजनिक मैदानों के इस्तेमाल की इजाज़त नहीं दी जाएगी, साफ़ तौर पर RSS को निशाना बनाने की कोशिश है। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान साफ़ तौर पर लोगों को समूह या संगठन बनाने की इजाज़त देता है और यह अधिकार संविधान द्वारा सुरक्षित है। तेजस्वी सूर्या ने कहा कि कई हाई कोर्ट पहले ही इस कानूनी बात को सही ठहरा चुके हैं...मुझे पूरा यकीन है कि राज्य सरकार का यह बिल या कानून भी, जब अदालत में इस पर सवाल उठाया जाएगा, तो संवैधानिक वैधता की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा।
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