उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें राज्य के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और मंत्री पी. नारायण के खिलाफ राजधानी अमरावती में ‘लैंड पूलिंग’ योजना में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले को रद्द कर दिया गया था। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि वह उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने के पक्ष में नहीं है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि इस याचिका का फैसला अन्य मामलों को प्रभावित नहीं करेगा और उन मामलों का फैसला उनके अपने तथ्यों और गुण-दोष के आधार पर किया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता ए. रामकृष्ण रेड्डी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने कहा कि इस मामले में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुई थीं। उन्होंने बताया कि इसमें 25,000 से अधिक किसानों की करीब 30,000 एकड़ जमीन शामिल थी। पीठ ने कुमार से कहा, ‘‘किसानों से जुड़े बड़े मुद्दे पर हम आपके साथ हैं।
उन्हें जो भी मिलना चाहिए, हम उसकी रक्षा करेंगे।’’
हालांकि, प्रधान न्यायाधीश ने बताया कि मौजूदा आपराधिक कार्यवाही एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के कहने पर शुरू की गई थी और कोई भी किसान सामने नहीं आया था। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कुमार से कहा, ‘‘राजनीतिक लड़ाइयां अदालत में नहीं लड़ी जानी चाहिए।’’ इसके साथ ही उन्होंने उच्च न्यायालय के 15 जुलाई के आदेश को चुनौती देने वाली रेड्डी की याचिका का निपटारा कर दिया। वर्ष 2016 के सरकारी आदेश के तहत घोषित ‘लैंड पूलिंग’ योजना को लेकर तत्कालीन विधायक ए. रामकृष्ण रेड्डी की शिकायत पर 12 मार्च, 2021 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
इस मामले की जांच अपराध जांच विभाग (सीआईडी) ने की थी, जिसने नायडू, नारायण और अन्य लोगों को आरोपी बनाया था और उन पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम तथा आंध्र प्रदेश आवंटित भूमि (हस्तांतरण पर प्रतिबंध) अधिनियम, 1977 की अलग-अलग धाराओं के तहत आरोप लगाए थे। इससे पहले, नायडू और नारायण की ओर से मामला रद्द करने की याचिकाएं दाखिल किए जाने के बाद उच्च न्यायालय ने मामले में आगे की सभी कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। ‘लैंड पूलिंग’ योजना के तहत, आंध्र प्रदेश सरकार ने राजधानी अमरावती के विकास के लिए किसानों से खेती की ज़मीन ली थी और बदले में उन्हें विकसित रिहायशी और कमर्शियल प्लॉट दिए थे।
इस योजना के तहत, राजधानी परियोजना के लिए दी गई हर एक एकड़ कृषि भूमि के बदले किसानों को 1,000 वर्ग गज आवासीय भूमि और 250 वर्ग गज व्यावसायिक भूमि मिलनी थी।
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4 जून 1947... दिल्ली के गर्म कमरों में जब लॉर्ड माउंटबेटन ने 15 अगस्त की तारीख का ऐलान किया, तो मुल्क की सांसें थम गईं। दो सौ सालों की गुलामी की जंजीरें टूटने वाली थीं, सियासत के गलियारों में जश्न की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं। लेकिन ठीक उसी वक्त, पूरे हिंदुस्तान के ज्योतिषी पंचांग के पन्नों में सिर झुकाए एक गहरा सन्नाटा महसूस कर रहे थे। लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लापिएर की किताब फ्रीडम एट मिडनाइट के पन्नों को पलटें तो एक चौंकाने वाली हकीकत सामने आती है। जिस दिन भारत अपनी आजादी की सांस लेने वाला था, ज्योतिष की गणनाओं में वो पल किसी नए राष्ट्र की पैदाइश के लिए बेहद मनहूस माना गया था। यह कहानी है सियासत की जिद, कैलेंडर की तारीख और सितारों के उस टकराव की, जिसने 15 अगस्त की उस रात को हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया।
ज्योतिषियों ने 15 अगस्त पर आपत्ति क्यों जताई?
15 अगस्त को शुक्रवार था। फ्रीडम एट मिडनाइट में बताए गए ज्योतिषियों के अनुसार, इतनी महत्वपूर्ण शुरुआत के लिए यह दिन अच्छा नहीं माना गया। जैसे ही तय तारीख की खबर फैली, कलकत्ता, बनारस और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में ज्योतिषियों ने ग्रहों की स्थिति की जांच शुरू कर दी और भारत के जन्म के लिए चार्ट तैयार करने लगे। कहा जाता है कि उनमें से एक, कलकत्ता के स्वामी मदानंद, माउंटबेटन की घोषणा सुनते ही अपने खगोलीय चार्ट देखने के लिए दौड़ पड़े। कहा जाता है कि जो कुछ मदननंद ने देखा, उससे वे घबरा गए। उन्हें लगा कि ग्रहों की स्थिति नए आज़ाद हुए देश के लिए अनिश्चित भविष्य की ओर इशारा कर रही है, इसलिए उन्होंने माउंटबेटन को पत्र लिखकर तारीख पर फिर से विचार करने को कहा। उनकी चेतावनी में कहा गया था कि "अगर बाढ़, सूखा, अकाल और नरसंहार जैसी घटनाएं होती हैं, तो इसकी वजह यह होगी कि आज़ाद भारत का जन्म सितारों के हिसाब से एक अशुभ दिन हुआ था।" इस बात का ज़िक्र लैपियर और कॉलिन्स की किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में किया गया है।
तारीख तो नहीं बदली जा सकती थी, लेकिन समय बदला जा सकता था
हालांकि, तब तक 15 अगस्त की तारीख बदलना व्यावहारिक नहीं था। माउंटबेटन इसकी घोषणा पहले ही कर चुके थे और सत्ता के हस्तांतरण की तैयारियां चल रही थीं। उस दौर की बातों के अनुसार, इसका समाधान उसी तारीख के भीतर एक शुभ मुहूर्त या सही समय ढूंढना था। इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे चर्चा अभिजीत मुहूर्त की ओर बढ़ी, जिसका ज़िक्र ज्योतिषी केएन राव ने अपनी किताब द नेहरू डायनेस्टी: एस्ट्रो-पॉलिटिकल पोर्ट्रेट्स ऑफ़ नेहरू, इंदिरा, संजय एंड राजीव में किया है। राव के बताए कारणों में एक पुष्य नक्षत्र भी था, जिसे पारंपरिक रूप से किसी भी महत्वपूर्ण काम की शुरुआत के लिए शुभ माना जाता है। इसलिए चर्चा इस बात से हटकर कि क्या 15 अगस्त की तारीख छोड़ दी जाए, इस बात पर केंद्रित हो गई कि क्या भारत की आज़ादी का सही समय हिंदू कैलेंडर के अनुसार ज़्यादा शुभ माना जाने वाला समय चुना जा सकता है।
नेहरू को आधी रात का समाधान कैसे मिला
माउंटबेटन के पास 15 अगस्त चुनने की अपनी वजह थी। फ्रीडम एट मिडनाइट में उनके हवाले से बताया गया है कि यह तारीख उन्होंने इसलिए चुनी क्योंकि वे चाहते थे कि सत्ता का हस्तांतरण जल्द हो। उन्होंने आखिरकार 15 अगस्त को चुना क्योंकि यह दूसरे विश्व युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण की दूसरी सालगिरह थी। तारीख पहले ही तय हो चुकी थी, इसलिए भारतीय नेताओं को उसी के हिसाब से काम करना पड़ा, न कि उसे बदलना पड़ा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेहरू एक दिलचस्प समझौते पर पहुँचे। संविधान सभा की बैठक 14 अगस्त की दोपहर को होनी थी और यह आधी रात तक चलनी थी। राव लिखते हैं नेहरू को एक दिलचस्प समझौता सूझा। उन्होंने 14 अगस्त की दोपहर को संविधान सभा की बैठक बुलाई और इसे आधी रात तक जारी रखा, जब पश्चिमी रीति-रिवाजों के अनुसार 15 अगस्त की शुरुआत हुई और ज़ीरो आवर (मध्यरात्रि का समय) हिंदू कैलेंडर के अनुसार शुभ समय के दायरे में आया।
आधी रात को आज़ाद भारत का जन्म
इस व्यवस्था का मतलब था कि 15 अगस्त ही भारत का स्वतंत्रता दिवस बना रहेगा, जबकि सत्ता का वास्तविक हस्तांतरण आधी रात को होगा। 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में बताया गया है कि ज्योतिषियों ने आखिरकार 14 अगस्त को अधिक अनुकूल समय माना और माउंटबेटन ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया।
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