UNCOVERED with Manoj Gairola: El Nino का गहराया खतरा, क्या भारत में आने वाला है भयंकर सूखा? वैज्ञानिकों ने दी बड़ी चेतावनी!
UNCOVERED with Manoj Gairola: दुनिया एक बार फिर सुपर एल नीनो (Super El Nino) के खतरे का सामना कर रही है. वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रशांत महासागर में तेजी से बढ़ रहा तापमान वैश्विक मौसम चक्र को प्रभावित कर सकता है. इसका असर भारत पर भी पड़ने की आशंका है, जहां कमजोर मानसून, कम बारिश, सूखा और जल संकट जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं. खेती-किसानी पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ेगा, जिससे खाद्यान्न उत्पादन घट सकता है और महंगाई बढ़ सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण इस बार एल नीनो का प्रभाव और गंभीर हो सकता है. ऐसे में सरकारों के साथ-साथ आम लोगों को भी जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अधिक जागरूक होने की जरूरत है.
क्या 1877 जैसा महाविनाश फिर लौटेगा?
आपको बता दें कि अपने देश में El Nino की वजह से पहले भी ऐसी भयावह स्थिति आ चुकी है. साल 1877-78 में दक्षिण और पश्चिम भारत में इतना भयंकर सूखा पड़ा था कि एक करोड़ से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी. भारत के साथ-साथ चीन और ब्राजील जैसे देशों में भी इसका असर पड़ा था और पूरी दुनिया में करीब 5 करोड़ लोगों की जानें चली गई थीं. लेकिन इस बार वैज्ञानिकों की चिंता कहीं ज्यादा है. क्योंकि El Nino के साथ-साथ ग्लोबल वार्मिंग का फैक्टर भी जुड़ गया है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण बीते 100 सालों में धरती का तापमान 1.2 डिग्री तक बढ़ चुका है और पिछले 10 साल तो मानव इतिहास के सबसे गर्म साल रहे हैं.
दुनिया के मौसम पर असर डालता है El Nino
वैसे तो El Nino हर 4 से 7 साल में आता है और पूरी दुनिया के मौसम पर असर डालता है. लेकिन जो El Nino इस साल आ रहा है, वो Super El Nino है. ये सुपर एल नीनो भारत से हजारों किलोमीटर दूर, प्रशांत महासागर के एक छोटे से हिस्से में बनता है, जब वहां के पानी का तापमान दो डिग्री से अधिक बढ़ जाता है. तो आइए जानते हैं El Nino क्या है? कैसे ये Super El Nino बनता है? कैसे भारत से हजारों किलोमीटर दूर, पेरू के पास समुद्र का थोड़ा सा पानी गर्म होने से भारत के लिए संकट क्यों खड़ा हो जाता है.
क्या होता है El Nino?
एल नीनो एक लोकल फेनोमेना है, लेकिन इसका असर ग्लोबल क्यों हो जाता है? इसको समझने से पहले, हमें ये जानना होगा कि बारिश कैसे होती है? दरअसल बारिश का फॉर्मूला सीधा-सीधा गर्मी से जुड़ा हुआ है. जब समुद्र का पानी गर्म होता है तो भाप बनकर आसमान की ओर उठता है और ऊपर जाकर बादल बन जाता है. अब ये बादल कहां बरसेंगे, इसका फैसला हवाएं करती हैं. जो इन्हें उड़ा कर ले जाती हैं. हवाएं हमेशा हाई प्रेशर वाली ठंडी जगह से लो प्रेशर वाली गर्म जगह की ओर चलती हैं.
भारत में मॉनसून की एंट्री
भारत में मॉनसून हिंद महासागर से आता है. गर्मियों के मौसम में उत्तर भारत का पूरा मैदानी इलाका समुद्र से कहीं ज्यादा गर्म हो जाता है. जैसा हमने बताया कि हवाएं हाई प्रेशर से लो प्रेशर की ओर चलती हैं, इसलिए ये हवाएं बादलों को उड़ा कर भारत की ओर ले आती हैं और एंट्री होती है केरल में, जहां मॉनसून पहली दस्तक देता है. सामान्य तौर पर भारत में साउथ-वेस्ट मॉनसून 1 जून को आता है लेकिन इस बार 4 जून को आया है.
अब आप सोच रहे होंगे कि भारत का मॉनसून तो हिंद महासागर से जुड़ा हुआ है. तो फिर इसका प्रशांत महासागर में बनने वाले El Nino से क्या कनेक्शन है? मौसम विज्ञान की भाषा में इसे टेलीकनेक्शन कहते हैं. अब आपको समझाते हैं ये कैसे काम करता है. सामान्य स्थिति में समुद्र के इस हिस्से के गर्म पानी को हवाएं, पूर्व से पश्चिम की ओर धकेलती हैं. इन हवाओं को ट्रेड विंड्स कहते हैं. जब ये गर्म पानी ऑस्ट्रेलिया के करीब पहुंचता है तो भाप बनकर ऊपर उठता है. बादल बन जाते हैं और बारिश होती है. लेकिन जब ये ट्रेड विंड्स कमजोर हो जाती हैं, तब ये गर्म पानी पेरू से ऑस्ट्रेलिया तक नहीं पहुंच पाता. इसी स्थिति को El Nino कहते हैं. ये पानी जितना ज्यादा गर्म होता है, उतना ही बड़ा लो प्रेशर जोन बनाता है और फिर ये पूरा सिस्टम एक एक्यूप्रेशर की तरह काम करने लगता है. यानी हिंद महासागर के आसपास की हवाएं भी इस लो प्रेशर जोन की ओर खिंच जाती हैं. बता दें कि हिंद महासागर के ऊपर चलने वाली हवाएं ही भारत में बारिश कराती हैं. और जब ये हवाएं पेरू की ओर चली जाती हैं तो भारत में मानसून कमजोर हो जाता है और सूखा पड़ जाता है.
भारत में इस साल औसत से कम होगी बारिश
रिपोर्ट्स की मानें तो पेरू के पास प्रशांत महासागर के पानी का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ चुका है और ये 3 डिग्री तक पहुंच सकता है. यहां तक आशंका जताई जा रही है कि इस बार का El Nino, 1877 से भी ज्यादा खतरनाक होगा. भारत सरकार के मुताबिक, इस साल बारिश औसत से 8 से 10% तक कम होगी. भारत में औसत बारिश 870 mm होती है, जो इस साल 800 mm रहने की आशंका है.
भारत पर पड़ेगा बुरा असर
भारत में आज भी 60% किसान खेती के लिए मॉनसून पर ही निर्भर हैं. जाहिर है सबसे तगड़ी चोट खेती को लगेगी और अनाज की कमी होगी. दुनिया की 18% आबादी भारत में रहती है, लेकिन संसार का मात्र 4% ताजा पानी ही भारत में है. ऐसे में भयंकर सूखा पड़ने पर, पीने के पानी की भी कमी होगी. बिजली की मांग बढ़ेगी, लेकिन उत्पादन कम होगा. महंगाई आसमान छूने लगेगी, बेरोजगारी बढ़ेगी. सूखे के साथ लंबे समय तक हीटवेव भी चलेंगी और बीमारियां बढ़ेंगी. इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और कमजोर तबके पर पड़ेगा. इस तबके की आय का सबसे बड़ा हिस्सा खाने पर खर्च होता है. सामान्यतः ये लोग गर्मी में खुले आसमान के नीचे काम करते हैं.
सरकार की जिम्मेदारी
El Nino आ रहा है, उसे रोका नहीं जा सकता. लेकिन आम लोगों पर उसके असर को कम जरूर किया जा सकता है. और इसकी जिम्मेदारी सरकार की है. 1877-78 में जब भारत में एक करोड़ लोगों की मौत हुई थी, तब देश में अंग्रेजों की हुकूमत थी. अंग्रेज भारत का अनाज इंग्लैंड भेजते रहे, जबकि भारत में लोग मरते रहे. लेकिन अब हालात अलग हैं. भारत सरकार के पास अनाज के भंडार भरे हुए हैं. लेकिन सरकार के साथ-साथ हम लोगों की भी जिम्मेदारी है कि हम ग्लोबल वार्मिंग को लेकर जागरूक रहें.
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