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Shiprocket IPO के अलॉटमेंट पर सभी की नजरें, निवेशक पैसा लगाएं या दूर रहें?

Shiprocket IPO: मौजूदा समय में हममें से ज्यादातर लोग ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं. कपड़े, जूते, कॉस्मेटिक्स या इलेक्ट्रॉनिक और होम अप्लायंसेस हों. जब भी कोई ऑर्डर पैक होकर डिलीवरी के लिए तैयार होता है, हमारे फोन पर एक नोटिफिकेशन आता है. ये आमतौर पर किसी लॉजिस्टिक्स पार्टनर की तरफ से होता है, जिसमें लिखा होता है- योर ऑर्डर ईज़ आउट फॉर डिलीवरी. इस प्रक्रिया के पीछे जो प्लेटफॉर्म्स होते हैं, उनमें से एक है Shiprocket. इस कंपनी का IPO 12 अगस्त 2026 को खुल चुका है. इसका साइज करीब 1,617 करोड़ रुपये है. जुटाए गए रकम का इस्तेमाल कंपनी मुख्य रूप से अपने ग्रोथ प्लान्स को फंड करने में करेगी. तो आइए इसी क्रम में शिपरॉकेट के फाइनेंशियल्स और ट्रैक रिकॉर्ड पर करीब से नजर डालते हैं, ताकि आप तय कर सकें कि यह IPO सब्सक्राइब करने लायक है या नहीं.

कंपनी के बारे में

जब कोई इंडिपेंडेंट मर्चेंट अपनी वेबसाइट, सोशल मीडिया या ऐप के जरिए सामान बेचता है, तो डिलीवरी, वेयरहाउसिंग और पेमेंट कलेक्शन को मैनेज करना एक बड़ी चुनौती बन जाती है. यहीं पर शिपरॉकेट काम आता है. यह मर्चेंट्स के शिपमेंट वॉल्यूम को एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इकट्ठा करके इस समस्या को हल करता है. सेलर एक ही डैशबोर्ड से लॉग इन कर सकते हैं, 42 एक्टिव कूरियर पार्टनर के रेट की तुलना कर सकते हैं, शिपिंग लेबल प्रिंट कर सकते हैं, पार्सल ट्रैक कर सकते हैं और कैश-ऑन-डिलीवरी कलेक्शन को मैनेज कर सकते हैं. 

कंपनी की कमाई मुख्य रूप से एक कंजप्शन-बेस्ड मॉडल से होती है, जिसमें मर्चेंट हर शिपमेंट या इस्तेमाल की गई सर्विस के लिए फीस देते हैं. रेवेन्यू को 2 हिस्सों में बांटा गया है. कोर बिजनेस जिसमें घरेलू शिपिंग और वैल्यू-ऐडेड शिपिंग ऐप्स शामिल हैं, ने FY26 में कुल ऑपरेटिंग रेवेन्यू का 73% हिस्सा बनाया. बाकी रेवेन्यू उभरते हुए बिजनेस से आया, जिसमें ShiprocketX के जरिए क्रॉस-बॉर्डर लॉजिस्टिक्स, Shiprocket Quick के जरिए क्विक कॉमर्स, मार्केटिंग टूल्स और कैपिटल सॉल्यूशंस शामिल हैं. इस नए सेगमेंट में कार्गो और क्रॉस-बॉर्डर सॉल्यूशंस का सबसे बड़ा योगदान है. 

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कंपनी की ताकत क्या है?

1. मर्चेंट जुटाना सस्ता होता जा रहा है

शिपरॉकेट पर हर महीने 23 लाख से ज्यादा यूनिक विजिटर्स आते हैं, जिनमें से लगभग 43% बिना किसी परफॉर्मेंस मार्केटिंग के यानी ऑर्गेनिक तरीके से आते हैं. इसके बाद, लगभग 97% मर्चेंट बिना सपोर्ट स्टाफ की मदद के डिजिटल रूप से अपनी ऑनबोर्डिंग पूरी कर लेते हैं. इस सेल्फ-सर्व मॉडल ने कस्टमर एक्विजिशन कॉस्ट (नए कस्टमर को जोड़ने की लागत) को लगातार कम किया है. FY24 में यह ₹4,101 से ज्यादा थी, जो FY26 में घटकर ₹2,829 हो गई. जितना ज्यादा सेल्स और ऑनबोर्डिंग सॉफ्टवेयर के जरिए होती है, कंपनी के लिए हर मर्चेंट को जोड़ने की लागत उतनी ही कम होती जाती है. 

2. कोर बिजनेस में ऑपरेटिंग लीवरेज है

पिछले दो सालों में कोर रेवेन्यू में 36.9% की बढ़ोतरी हुई, जबकि कोर स्टाफ की लागत में सिर्फ 8.3% और दूसर खर्चों में केवल 5.9% की वृद्धि हुई. अतिरिक्त पार्सल संभालने के लिए मुख्य रूप से ज्यादा कूरियर कैपेसिटी की जरूरत होती है, जिसे शिपरॉकेट खरीदकर आगे पास कर देता है. इसके लिए ज्यादा इंजीनियरों, ऑफिस स्पेस या सपोर्ट स्टाफ की जरूरत नहीं पड़ती. चूंकि सॉफ्टवेयर पहले से ही मौजूद है, इसलिए वॉल्यूम बढ़ने पर भी अतिरिक्त ओवरहेड कम ही रहता है. नतीजतन, FY24 के बाद से कोर एडजस्टेड EBITDA ढाई गुना बढ़ गया है. 

3. कैश फ्लो पॉजिटिव दिख रहा

नेट लॉस होने के बावजूद, शिपरॉकेट ने कैश जेनरेशन में तेजी से सुधार देखा है. ऑपरेटिंग कैश फ्लो FY24 में ₹216 करोड़ के आउटफ्लो से बदलकर FY26 में पॉजिटिव ₹52.6 करोड़ हो गया है. कंपनी अब ऑपरेटिंग कैश जेनरेट कर रही है, जिससे उसे अपनी ग्रोथ के अगले चरण को फंड करने के लिए एक मजबूत आधार मिल रहा है.

कंपनी की कमजोरियां क्या है?

1. नए दांव मुनाफे वाले कोर को खा रहे हैं

FY26 में शिपरॉकेट के घरेलू शिपिंग बिजनेस में 13% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई, जिससे ₹187 करोड़ का एडजस्टेड EBITDA जेनरेट हुआ. लेकिन मैनेजमेंट क्रॉस-बॉर्डर, हाइपरलोकर और दूसरे नए बिजनेस क्षेत्रों में भी कदम रख रहा है, जिससे मुनाफे पर असर पड़ रहा है. इन नए बिजनेस सेगमेंट में FY26 में ₹169 करोड़ का एडजस्टेड EBITDA नुकसान हुआ. यह ट्रेंड FY24 से ही चला आ रहा है. ज्यादा फिक्स्ड कॉस्ट की वजह से स्थिति और मुश्किल हो जाती है. अकेले कर्मचारियों पर होने वाला खर्च इस सेगमेंट के रेवेन्यू का 32% से ज्यादा है. 

2. बीच की कड़ी कमजोर है

शिपरॉकेट पूरी तरह से थर्ड-पार्टी डिलीवरी फ्लीट पर निर्भर है. यह 42 एक्टिव कूरियर पार्टनर के साथ काम करता है. फिर भी इनमें से केवल 5 ने FY26 में 84.5% शिपमेंट वॉल्यूम संभाला. एक्सक्लूसिव कॉन्ट्रैक्ट न होने की वजह से ये पार्टनर रेट बढ़ा सकते हैं या सरचार्ज लगा सकते हैं, जिससे शिपरॉकेट की मोल-भाव करने की ताकत कम हो जाती है. इससे भी बड़ा रिस्क यह है कि इन कूरियर कंपनियों के पास अपना फिजिकल डिलीवरी नेटवर्क है और वे मर्चेंट के लिए अपने खुद के प्लेटफॉर्म बना सकती हैं. अगर वे शिपरॉकेट को बायपास कर देते हैं, तो बीच की कड़ी के तौर पर इसकी अहमियत काफी कम हो जाएगी. 

3. सबसे कीमती मर्चेंट्स की ग्रोथ थम गई है

पिछले 3 सालों में पावर मर्चेंट्स (हर महीने 100 से ज्यादा ट्रांजैक्शन करने वाले सेलर) की संख्या 9,020 से बढ़कर 10,005 हो गई और आखिर में 10,090 तक पहुंच गई. इनकी ग्रोथ रेट घटकर केवल 1% रह गई. फिर भी यह छोटा ग्रुप जिसमें कुल मर्चेंट्स का केवल 4.7% हिस्सा है, FY26 के लिए लगभग 89% रेवेन्यू जेनरेट करता है, जो हर मर्चेंट पर औसतन ₹17.8 लाख है. दूसरे शब्दों में, लगभग 90% रेवेन्यू उस ग्रुप पर निर्भर करता है जिसमें पिछलवे साल सिर्फ 85 नए मर्चेंट्स जुड़े थे. 

यह भी पढ़ें- Market Capitalization क्या है? जानें कंपनी की मार्केट वैल्यू कैसे होती है तय

आंकड़े क्या बताते हैं?

शिपरॉकेट के प्रॉस्पेक्टस को देखने से एक साफ नतीजा निकलता है. कंपनी को पिछले 3 सालों से लगातार नुकसान हो रहा है. FY26 में ₹2,024 करोड़ के रेवेन्यू पर ₹103 करोड़ का ऑपरेटिंग लॉस हुआ है. ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है कि यह एक ऐसा बिजनेस है, जिसे अभी अपनी यूनिट इकोनॉमिक्स समझनी है. लेकिन गहराई से देखने पर तस्वीर बदल जाती है. शिपरॉकेट का मुख्य शिपिंग बिजनेस पहले से ही मुनाफे में है. जैसे-जैसे यह बढ़ रहा है और ज्यादा एफिशिएंट हो रहा है और अब कैश भी कमा रहा है. असली दिक्कत यह है कि इस मुनाफे का इस्तेमाल उन बिजनेस को फंड करने में हो रहा है, जिन्होंने अभी अपना इकोनॉमिक्स साबित नहीं किया है. तो असली सवाल यह नहीं कि शिपरॉक्ट पैसा कमा सकता है या नहीं. असली सवाल यह है कि जो बिजनेस काम कर रहा है, उसका मुनाफा उन बिजनेस को बनाने की लागत को जायज ठहरा सकता है या नहीं, जो अभी तक साबित नहीं हुए.

कीमत असल में आपसे क्या मानने को कह रही है?

प्राइस-टू-अर्निंग्स का यहां कोई खास मतलब नहीं, क्योंकि Shiprocket अभी भी घाटे में है. प्राइस-टू-रेवेन्यू रेशियो एक बेहतर पैमाना है. IPO के बाद के मार्केट कैप के आधार पर शिपरॉकेट का ट्रेड उसके FY26 के रेवेन्यू के लगभग 3.5 गुना पर होगा. यूनिकॉमर्स जो प्रोस्पेक्टस में बताई गई एकमात्र लिस्टेड भारतीय पीयर है, का ट्रेड 4.6 गुना पर होता है. हालांकि यूनिकॉमर्स साइज में काफी छोटी है, लेकिन वह पहले से ही मुनाफे में है. जबकि शिपरॉकेट तेजी से बढ़ रही है और बहुत बड़े पैमाने पर काम करती है. पहली नजर में कम मल्टीपल सही लगता है, लेकिन जब रेवेन्यू की क्वालिटी पर ध्यान दिया जाता है तो तुलना का नजरिया बदल जाता है. 

Unicommerce कंपनी क्या करती है?

यूनिकॉमर्स मुख्य रूप से सॉफ्टवेयर बेचती है और अपनी बिल की गी कमाई का ज्यादातर हिस्सा अपने पास रखती है. दूसरी ओर, शिपरॉकेट मर्चेंट से शिपमेंट की पूरी लागत का बिल लेती है और बाद में कूरियर कंपनी को भुगतान करती है. कूरियर का भुगतान करने के बाद, शिपरॉकेट बिल किए गए हर रुपये में से सिर्फ लगभग 26 पैसे अपने पास रखती है. और यह उसके दूसरे खर्चों को घटाने से पहले की बात है. इसकी वैल्यूएशन इस बची हुई कमाई का लगभग 14 गुना है, जबकि यूनिकॉमर्स की वैल्यूएशन 4.7 गुना है. 

IPO से कंपनी को क्या फायदा होने वाला है?

यह IPO कर्ज चुकाने के बाद Shiprocket को करीब 675 करोड़ रुपये की फ्रेश पूंजी देगा. सवाल यह है कि यह पैसा वैल्यू बनाएगा या सिर्फ और घाटे को फंड करेगा. कोर बिजनेस ने अपना इकोनॉमिक्स साबित कर दिया है. इस कीमत पर, बाकी हिस्से को अभी अपनी काबिलियत साबित करनी बाकी है.

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डिस्क्लेमर: निवेशकों को निवेश का फैसला लेने से पहले कंपनी के फंडामेंटल्स, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और शेयर के वैल्यूएशन जैसे अहम पहलुओं पर ध्यान से रिसर्च करनी चाहिए.

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बांग्लादेश ने निकाली ऑस्ट्रेलिया की हेकड़ी! गेंद के बाद बल्ले से भी मचाया तहलका, स्कोर पहुंचा 351/6, कितनी बनाई बढ़त

AUS VS BAN DAY-2 Report: ऑस्ट्रेलिया दौरे पर बांग्लादेश की टीम तहलका मचा रही है. डार्विन में खेले जा रहे पहले टेस्ट मैच में बांग्लादेश ने शानदार प्रदर्शन करते हुए दूसरे दिन के खेल का अंत कर दिया है. जहां, ऑस्ट्रेलिया की पहली पारी 198 रनों पर ही सिमट गई, तो वहीं बांग्लादेश की टीम ने दूसरे दिन के अंतर तक 6 विकेट के नुकसान पर 351 रन बना लिए हैं और एक अच्छी बढ़त हासिल कर ली है.

351/6 के स्कोर पर खत्म हुआ दूसरा दिन

डार्विन में ऑस्ट्रेलिया के साथ खेले जा रहे पहले टेस्ट मैच में बांग्लादेश की टीम ओर से अच्छी बल्लेबाजी देखने को मिली. ऑस्ट्रेलिया की बेस्ट बॉलिंग लाइनअप के सामने बांग्लादेशी बल्लेबाजों ने जो जज्बा दिखाया, वह वाकई काबिल-ए-तारीफ है. बांग्लादेश के लिए उनके सलामी बल्लेबाज तंजीद हसन तमीम ने शतक लगाया, नजमुल हुसैन संतो ने 84 रनों की अर्धशतकीय पारी खेली. इसके अलावा सादमान इस्लाम ने 20, मोमिनुल हक ने 49, मुस्तफिजुर रहीम ने 36 रन बनाए. इस तरह बांग्लादेश ने दूसरे दिन का खेल खत्म होने तक 6 विकेट के नुकसान पर 351 रन बोर्ड पर लगा दिए.

198 पर ही सिमट गई थी ऑस्ट्रेलिया की पहली पारी

बांग्लादेश के साथ खेले जा रहे पहले टेस्ट मैच में टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी ऑस्ट्रेलिया की टीम की पहली पारी 198 के स्कोर पर ही सिमट गई. ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाजों के पास मानो बांग्लादेश के गेंदबाजों का कोई तोड़ ही नहीं था. स्टीव स्मिथ एकमात्र खिलाड़ी रहे, जिन्होंने पहले टेस्ट मैच में 71 रनों की अर्धशतकीय पारी खेली. वहीं, कोई भी बल्लेबाज क्रीज पर ज्यादा देर तक टिक ही नहीं सका.

बांग्लादेश ने बनाई 153 रनों की बढ़त

डार्विन के मरारा क्रिकेट ग्राउंड में खेले जा रहे सीरीज के पहले टेस्ट मैच में ऑस्ट्रेलिया की टीम ने टॉस जीतकर बल्लेबाजी करने का फैसला किया. जहां, ऑस्ट्रेलिया की पहली पारी 198 के स्कोर पर ही सिमट गई. वहीं, अब बांग्लादेश की पहली पारी में स्कोर 351/6 हो गया है. ऐसे में बांग्लादेश की टीम ने 153 रनों की बढ़त हासिल कर ली है और अभी उनके हाथ में 4 विकेट भी हैं. ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि 2 दिन का खेल खत्म होने के बाद बांग्लादेश की टीम मैच में आगे चल रही है.

बांग्लादेशी टीम की तरफ से हुई धारदार गेंदबाजी

बांग्लादेश की सधी हुई गेंदबाजी के सामने ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाज पूरी तरह से बेअसर दिखे. बांग्लादेश के तेज गेंदबाज हसन महमूद ने तहलका मचा दिया. उन्होंने 17 ओवर गेंदबाजी की, जिसमें 55 रन देकर 6 विकेट अपने नाम कगिए. तास्किन अहमद ने 2 विकेट लिए और इबादत हुसैन ने भी 2 विकेट चटकाए. इस तरह बांग्लादेश की तेजतर्रार गेंदबाजी के सामने ऑस्ट्रेलियाई टीम घरेलू सरजमीं पर 198 के स्कोर पर ही ऑलआउट हो गई.

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