किसी ने कॉमेडियन बोला तो किसी ने महिला विरोधी, राहुल गांधी के इस बयान पर BJP नेताओं का हमला
कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के बयान ने एक बार फिर से विवाद खड़ा दिया है. गुरुवार को नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधा. राहुल के साथ कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित भी मंच पर मौजूद थे. इस दौरान, मंच पर ऐसा कुछ हुआ जिसकी काफी चर्चा हो रही है. कांग्रेस के बयान पर भाजपा नेताओं ने आपत्ति जताई है. उन्होंने कांग्रेस पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाया है.
देश के लोकतंत्र का दुर्भाग्य- नड्डा
केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने कहा, "ऐसा विपक्ष का नेता देखना ही बाकी रह गया था, ये देश के लोकतंत्र का दुर्भाग्य है. कांग्रेस के लिए भी इससे दुख का क्या विषय होगा की उन्हें राहुल गांधी को अपना नेता मानना पड़ रहा है."
ऐसा विपक्ष का नेता देखना ही बाक़ी रह गया था, ये देश के लोकतंत्र का दुर्भाग्य है।
— Jagat Prakash Nadda (@JPNadda) August 14, 2026
कांग्रेस के लिए भी इससे दुख का क्या विषय होगा की उन्हें राहुल गांधी को अपना नेता मानना पड़ रहा है।
असम सीएम ने साधा निशाना
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "कांग्रेस के वंशवादी नेतृत्व ने एक बार फिर शालीनता की सारी हदें पार कर दी हैं, एक मित्र देश की महिला राष्ट्राध्यक्ष के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी की गई, जबकि मंच पर और दर्शकों में मौजूद महिलाएं भी उस पर हंसती रहीं. यह केवल राजनीतिक अशिष्टता नहीं है, बल्कि भारत के विदेश संबंधों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश भी है. जब महिलाओं का अपमान मनोरंजन का ज़रिया बन जाए, तो इससे उस संस्कृति के बारे में बहुत कुछ पता चलता है जिसे बढ़ावा दिया जा रहा है. शर्मनाक. घिनौना."
Congress’s dynastic leadership has once again crossed every line of decency - making objectionable remarks about a woman head of state who leads a friendly country, while women on the stage and in the audience laugh along.
— Himanta Biswa Sarma (@himantabiswa) August 13, 2026
This is not merely political indecency, it is also an… pic.twitter.com/VkKK9xdy7A
महिला मोर्चा ने भी खोला मोर्चा
BJP महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष वानति श्रीनिवासन ने कहा कि "आलोचना करना हर राजनीतिक पार्टी का अधिकार है; लेकिन महिलाओं का अपमान करना और सार्वजनिक जीवन को भद्दे मजाक का जरिया बनाना सही नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी का मजाक उड़ाना और उस पर कांग्रेस नेताओं का हंसना, राजनीतिक परिपक्वता की भारी कमी को दर्शाता है. नीतियों पर बहस करें. फैसलों को चुनौती दें. लेकिन लोगों का सम्मान करें. यह सार्वजनिक बातचीत के स्तर में एक नई गिरावट है और इसकी कड़ी निंदा होनी चाहिए."
Criticism is the right of every political party; insulting women and reducing public life to vulgar jokes is not.
— Vanathi Srinivasan (@VanathiBJP) August 13, 2026
Mocking PM Shri @narendramodi ji and Italian PM Giorgia Meloni, while Congress leaders laugh along, reflects a serious lack of political maturity.
Debate policies.… pic.twitter.com/Z6jRW8F8tg
राहुल गांधी को बताया कॉमेडियन
बीजेपी सांसद बांसुरी स्वराज ने भी राहुल गांधी के बयान पर आपत्ति जताई और राहुल गांधी के बयानों को गरिमाहीन और अभद्र बताया. उन्होंने कहा कि वह कॉमेडियन की तरह बर्ताव कर रहे हैं.
राहुल गांधी द्वारा आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के प्रति आज जिस प्रकार की संस्कारहीन, अश्लील और अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया, वह नेता प्रतिपक्ष जैसे संवैधानिक पद की गरिमा के बिल्कुल विपरीत है।
— Bansuri Swaraj (@BansuriSwaraj) August 13, 2026
देश को ऐसे नेता प्रतिपक्ष की आवश्यकता है जो सकारात्मक विपक्ष की भूमिका… pic.twitter.com/q2icLEv1pb
Shiprocket IPO के अलॉटमेंट पर सभी की नजरें, निवेशक पैसा लगाएं या दूर रहें?
Shiprocket IPO: मौजूदा समय में हममें से ज्यादातर लोग ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं. कपड़े, जूते, कॉस्मेटिक्स या इलेक्ट्रॉनिक और होम अप्लायंसेस हों. जब भी कोई ऑर्डर पैक होकर डिलीवरी के लिए तैयार होता है, हमारे फोन पर एक नोटिफिकेशन आता है. ये आमतौर पर किसी लॉजिस्टिक्स पार्टनर की तरफ से होता है, जिसमें लिखा होता है- योर ऑर्डर ईज़ आउट फॉर डिलीवरी. इस प्रक्रिया के पीछे जो प्लेटफॉर्म्स होते हैं, उनमें से एक है Shiprocket. इस कंपनी का IPO 12 अगस्त 2026 को खुल चुका है. इसका साइज करीब 1,617 करोड़ रुपये है. जुटाए गए रकम का इस्तेमाल कंपनी मुख्य रूप से अपने ग्रोथ प्लान्स को फंड करने में करेगी. तो आइए इसी क्रम में शिपरॉकेट के फाइनेंशियल्स और ट्रैक रिकॉर्ड पर करीब से नजर डालते हैं, ताकि आप तय कर सकें कि यह IPO सब्सक्राइब करने लायक है या नहीं.
कंपनी के बारे में
जब कोई इंडिपेंडेंट मर्चेंट अपनी वेबसाइट, सोशल मीडिया या ऐप के जरिए सामान बेचता है, तो डिलीवरी, वेयरहाउसिंग और पेमेंट कलेक्शन को मैनेज करना एक बड़ी चुनौती बन जाती है. यहीं पर शिपरॉकेट काम आता है. यह मर्चेंट्स के शिपमेंट वॉल्यूम को एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इकट्ठा करके इस समस्या को हल करता है. सेलर एक ही डैशबोर्ड से लॉग इन कर सकते हैं, 42 एक्टिव कूरियर पार्टनर के रेट की तुलना कर सकते हैं, शिपिंग लेबल प्रिंट कर सकते हैं, पार्सल ट्रैक कर सकते हैं और कैश-ऑन-डिलीवरी कलेक्शन को मैनेज कर सकते हैं.
कंपनी की कमाई मुख्य रूप से एक कंजप्शन-बेस्ड मॉडल से होती है, जिसमें मर्चेंट हर शिपमेंट या इस्तेमाल की गई सर्विस के लिए फीस देते हैं. रेवेन्यू को 2 हिस्सों में बांटा गया है. कोर बिजनेस जिसमें घरेलू शिपिंग और वैल्यू-ऐडेड शिपिंग ऐप्स शामिल हैं, ने FY26 में कुल ऑपरेटिंग रेवेन्यू का 73% हिस्सा बनाया. बाकी रेवेन्यू उभरते हुए बिजनेस से आया, जिसमें ShiprocketX के जरिए क्रॉस-बॉर्डर लॉजिस्टिक्स, Shiprocket Quick के जरिए क्विक कॉमर्स, मार्केटिंग टूल्स और कैपिटल सॉल्यूशंस शामिल हैं. इस नए सेगमेंट में कार्गो और क्रॉस-बॉर्डर सॉल्यूशंस का सबसे बड़ा योगदान है.
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कंपनी की ताकत क्या है?
1. मर्चेंट जुटाना सस्ता होता जा रहा है
शिपरॉकेट पर हर महीने 23 लाख से ज्यादा यूनिक विजिटर्स आते हैं, जिनमें से लगभग 43% बिना किसी परफॉर्मेंस मार्केटिंग के यानी ऑर्गेनिक तरीके से आते हैं. इसके बाद, लगभग 97% मर्चेंट बिना सपोर्ट स्टाफ की मदद के डिजिटल रूप से अपनी ऑनबोर्डिंग पूरी कर लेते हैं. इस सेल्फ-सर्व मॉडल ने कस्टमर एक्विजिशन कॉस्ट (नए कस्टमर को जोड़ने की लागत) को लगातार कम किया है. FY24 में यह ₹4,101 से ज्यादा थी, जो FY26 में घटकर ₹2,829 हो गई. जितना ज्यादा सेल्स और ऑनबोर्डिंग सॉफ्टवेयर के जरिए होती है, कंपनी के लिए हर मर्चेंट को जोड़ने की लागत उतनी ही कम होती जाती है.
2. कोर बिजनेस में ऑपरेटिंग लीवरेज है
पिछले दो सालों में कोर रेवेन्यू में 36.9% की बढ़ोतरी हुई, जबकि कोर स्टाफ की लागत में सिर्फ 8.3% और दूसर खर्चों में केवल 5.9% की वृद्धि हुई. अतिरिक्त पार्सल संभालने के लिए मुख्य रूप से ज्यादा कूरियर कैपेसिटी की जरूरत होती है, जिसे शिपरॉकेट खरीदकर आगे पास कर देता है. इसके लिए ज्यादा इंजीनियरों, ऑफिस स्पेस या सपोर्ट स्टाफ की जरूरत नहीं पड़ती. चूंकि सॉफ्टवेयर पहले से ही मौजूद है, इसलिए वॉल्यूम बढ़ने पर भी अतिरिक्त ओवरहेड कम ही रहता है. नतीजतन, FY24 के बाद से कोर एडजस्टेड EBITDA ढाई गुना बढ़ गया है.
3. कैश फ्लो पॉजिटिव दिख रहा
नेट लॉस होने के बावजूद, शिपरॉकेट ने कैश जेनरेशन में तेजी से सुधार देखा है. ऑपरेटिंग कैश फ्लो FY24 में ₹216 करोड़ के आउटफ्लो से बदलकर FY26 में पॉजिटिव ₹52.6 करोड़ हो गया है. कंपनी अब ऑपरेटिंग कैश जेनरेट कर रही है, जिससे उसे अपनी ग्रोथ के अगले चरण को फंड करने के लिए एक मजबूत आधार मिल रहा है.
कंपनी की कमजोरियां क्या है?
1. नए दांव मुनाफे वाले कोर को खा रहे हैं
FY26 में शिपरॉकेट के घरेलू शिपिंग बिजनेस में 13% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई, जिससे ₹187 करोड़ का एडजस्टेड EBITDA जेनरेट हुआ. लेकिन मैनेजमेंट क्रॉस-बॉर्डर, हाइपरलोकर और दूसरे नए बिजनेस क्षेत्रों में भी कदम रख रहा है, जिससे मुनाफे पर असर पड़ रहा है. इन नए बिजनेस सेगमेंट में FY26 में ₹169 करोड़ का एडजस्टेड EBITDA नुकसान हुआ. यह ट्रेंड FY24 से ही चला आ रहा है. ज्यादा फिक्स्ड कॉस्ट की वजह से स्थिति और मुश्किल हो जाती है. अकेले कर्मचारियों पर होने वाला खर्च इस सेगमेंट के रेवेन्यू का 32% से ज्यादा है.
2. बीच की कड़ी कमजोर है
शिपरॉकेट पूरी तरह से थर्ड-पार्टी डिलीवरी फ्लीट पर निर्भर है. यह 42 एक्टिव कूरियर पार्टनर के साथ काम करता है. फिर भी इनमें से केवल 5 ने FY26 में 84.5% शिपमेंट वॉल्यूम संभाला. एक्सक्लूसिव कॉन्ट्रैक्ट न होने की वजह से ये पार्टनर रेट बढ़ा सकते हैं या सरचार्ज लगा सकते हैं, जिससे शिपरॉकेट की मोल-भाव करने की ताकत कम हो जाती है. इससे भी बड़ा रिस्क यह है कि इन कूरियर कंपनियों के पास अपना फिजिकल डिलीवरी नेटवर्क है और वे मर्चेंट के लिए अपने खुद के प्लेटफॉर्म बना सकती हैं. अगर वे शिपरॉकेट को बायपास कर देते हैं, तो बीच की कड़ी के तौर पर इसकी अहमियत काफी कम हो जाएगी.
3. सबसे कीमती मर्चेंट्स की ग्रोथ थम गई है
पिछले 3 सालों में पावर मर्चेंट्स (हर महीने 100 से ज्यादा ट्रांजैक्शन करने वाले सेलर) की संख्या 9,020 से बढ़कर 10,005 हो गई और आखिर में 10,090 तक पहुंच गई. इनकी ग्रोथ रेट घटकर केवल 1% रह गई. फिर भी यह छोटा ग्रुप जिसमें कुल मर्चेंट्स का केवल 4.7% हिस्सा है, FY26 के लिए लगभग 89% रेवेन्यू जेनरेट करता है, जो हर मर्चेंट पर औसतन ₹17.8 लाख है. दूसरे शब्दों में, लगभग 90% रेवेन्यू उस ग्रुप पर निर्भर करता है जिसमें पिछलवे साल सिर्फ 85 नए मर्चेंट्स जुड़े थे.
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आंकड़े क्या बताते हैं?
शिपरॉकेट के प्रॉस्पेक्टस को देखने से एक साफ नतीजा निकलता है. कंपनी को पिछले 3 सालों से लगातार नुकसान हो रहा है. FY26 में ₹2,024 करोड़ के रेवेन्यू पर ₹103 करोड़ का ऑपरेटिंग लॉस हुआ है. ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है कि यह एक ऐसा बिजनेस है, जिसे अभी अपनी यूनिट इकोनॉमिक्स समझनी है. लेकिन गहराई से देखने पर तस्वीर बदल जाती है. शिपरॉकेट का मुख्य शिपिंग बिजनेस पहले से ही मुनाफे में है. जैसे-जैसे यह बढ़ रहा है और ज्यादा एफिशिएंट हो रहा है और अब कैश भी कमा रहा है. असली दिक्कत यह है कि इस मुनाफे का इस्तेमाल उन बिजनेस को फंड करने में हो रहा है, जिन्होंने अभी अपना इकोनॉमिक्स साबित नहीं किया है. तो असली सवाल यह नहीं कि शिपरॉक्ट पैसा कमा सकता है या नहीं. असली सवाल यह है कि जो बिजनेस काम कर रहा है, उसका मुनाफा उन बिजनेस को बनाने की लागत को जायज ठहरा सकता है या नहीं, जो अभी तक साबित नहीं हुए.
कीमत असल में आपसे क्या मानने को कह रही है?
प्राइस-टू-अर्निंग्स का यहां कोई खास मतलब नहीं, क्योंकि Shiprocket अभी भी घाटे में है. प्राइस-टू-रेवेन्यू रेशियो एक बेहतर पैमाना है. IPO के बाद के मार्केट कैप के आधार पर शिपरॉकेट का ट्रेड उसके FY26 के रेवेन्यू के लगभग 3.5 गुना पर होगा. यूनिकॉमर्स जो प्रोस्पेक्टस में बताई गई एकमात्र लिस्टेड भारतीय पीयर है, का ट्रेड 4.6 गुना पर होता है. हालांकि यूनिकॉमर्स साइज में काफी छोटी है, लेकिन वह पहले से ही मुनाफे में है. जबकि शिपरॉकेट तेजी से बढ़ रही है और बहुत बड़े पैमाने पर काम करती है. पहली नजर में कम मल्टीपल सही लगता है, लेकिन जब रेवेन्यू की क्वालिटी पर ध्यान दिया जाता है तो तुलना का नजरिया बदल जाता है.
Unicommerce कंपनी क्या करती है?
यूनिकॉमर्स मुख्य रूप से सॉफ्टवेयर बेचती है और अपनी बिल की गी कमाई का ज्यादातर हिस्सा अपने पास रखती है. दूसरी ओर, शिपरॉकेट मर्चेंट से शिपमेंट की पूरी लागत का बिल लेती है और बाद में कूरियर कंपनी को भुगतान करती है. कूरियर का भुगतान करने के बाद, शिपरॉकेट बिल किए गए हर रुपये में से सिर्फ लगभग 26 पैसे अपने पास रखती है. और यह उसके दूसरे खर्चों को घटाने से पहले की बात है. इसकी वैल्यूएशन इस बची हुई कमाई का लगभग 14 गुना है, जबकि यूनिकॉमर्स की वैल्यूएशन 4.7 गुना है.
IPO से कंपनी को क्या फायदा होने वाला है?
यह IPO कर्ज चुकाने के बाद Shiprocket को करीब 675 करोड़ रुपये की फ्रेश पूंजी देगा. सवाल यह है कि यह पैसा वैल्यू बनाएगा या सिर्फ और घाटे को फंड करेगा. कोर बिजनेस ने अपना इकोनॉमिक्स साबित कर दिया है. इस कीमत पर, बाकी हिस्से को अभी अपनी काबिलियत साबित करनी बाकी है.
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डिस्क्लेमर: निवेशकों को निवेश का फैसला लेने से पहले कंपनी के फंडामेंटल्स, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और शेयर के वैल्यूएशन जैसे अहम पहलुओं पर ध्यान से रिसर्च करनी चाहिए.
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