राघव चड्ढा के दलबदल मॉडल से TMC में डर का माहौल? 19 सांसदों का आंकड़ा बना पहेली, दिल्ली तक पहुंचा बंगाल संकट
टीएमसी के बागी सांसद लोकसभा स्पीकर से संपर्क कर सकते हैं. वह संसदीय लीडरशिप बदलने की मांग रख सकते हैं. लेकिन स्पीकर इस मामले में कोई फैसला नहीं लेंगे. लीडर की नियुक्ति पार्टी प्रेसिडेंट करती हैं. सिर्फ ममता बनर्जी इस पोस्ट में बदलाव कर सकती हैं. टीएमसी ने कहा कि यह इंडिया गठबंधन की मीटिंग से ध्यान भटकाने का खेला है.
“मर जाऊंगा लेकिन..” TMC सांसद कीर्ति आजाद ने ममता बनर्जी को लेकर दिया बड़ा बयान, बोले- एक घायल शेरनी और ज्यादा खतरनाक
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सिर्फ सत्ता का समीकरण ही नहीं पलटा, बल्कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को इतिहास के सबसे भीषण राजनीतिक संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है। सूबे की सियासत पूरी तरह करवट ले चुकी है, जहां पार्टी अपने सबसे बड़े आंतरिक विद्रोह से जूझ रही है। इस सियासी घमासान के बीच, टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद दिल्ली पहुंचे हैं और उन्होंने बगावत पर सीधा हमला बोला है। आजाद ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो गद्दार है, उसको गद्दारी करने दो, इससे टीएमसी को कुछ नहीं होने वाला। उन्होंने अपनी निष्ठा दोहराते हुए कहा, “मैं दीदी के साथ खड़ा था, खड़ा हूं और हमेशा खड़ा रहूंगा। मर जाऊंगा लेकिन उनका साथ नहीं छोड़ूंगा।” कीर्ति आजाद ने एक घायल शेरनी का जिक्र करते हुए ममता बनर्जी की वापसी का भरोसा जताया, जो उनके मुताबिक और ज्यादा खतरनाक हो जाती है।
एक तरफ जहां पार्टी के भीतर विद्रोह का सबसे बड़ा तूफान उमड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर ममता बनर्जी अपनी पार्टी के अस्तित्व को बचाने और ‘इंडिया ब्लॉक’ की बैठक में शामिल होने के लिए देश की राजधानी दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। दिल्ली में ही कीर्ति आजाद ने ममता बनर्जी से मुलाकात कर वफादारों की लामबंदी शुरू कर दी है, जिससे बागियों पर सीधा दबाव बन सके।
चुनाव में मिली हार के बाद TMC में आंतरिक विद्रोह
यह पूरा सियासी घमासान पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से शुरू हुआ है, जिसने तृणमूल कांग्रेस को राज्य की सत्ता से बेदखल कर महज 80 सीटों पर समेट दिया। इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी ने 207 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया है, जो टीएमसी के लिए एक करारी शिकस्त साबित हुई। इस चुनावी हार के तुरंत बाद ही पार्टी के भीतर एक बहुत बड़ा आंतरिक विद्रोह खड़ा हो गया है, जिसकी आंच अब कोलकाता से दिल्ली तक महसूस की जा रही है।
टूट की कगार पर TMC, दो-तिहाई विधायक हुए बागी
टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से लगभग 58-59 विधायक ममता बनर्जी के नेतृत्व और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली के खिलाफ खुलकर सामने आ गए हैं। बागियों की यह संख्या दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए आवश्यक दो-तिहाई के आंकड़े को आसानी से पूरा करती है। विधानसभा में इस बगावत को तब बड़ी सफलता मिली, जब पार्टी से निष्कासित टीएमसी नेता रितव्रत बनर्जी को इन 58 बागी विधायकों का खुला समर्थन प्राप्त हो गया। पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष रथिन्द्र बोस ने भी इस बागी गुट को तुरंत मंजूरी देते हुए ऋतब्रत बनर्जी को आधिकारिक रूप से विधानसभा में ‘नेता प्रतिपक्ष’ घोषित कर दिया है, जो ममता बनर्जी के लिए एक और बड़ा झटका माना जा रहा है। इसी बीच, संकट को गहराते देख ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाने वाले फिरहाद हकीम ने भी कोलकाता के मेयर पद से इस्तीफा दे दिया है, जिससे पार्टी की अंदरूनी कलह और उजागर हो गई है।
दिल्ली पहुंचे TMC के 20 बागी सांसद
कोलकाता का यह सियासी ड्रामा अब पूरी तरह दिल्ली स्थानांतरित हो चुका है। खबरों के मुताबिक, टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 बागी सांसद भी राजधानी पहुंच चुके हैं। ये सांसद जल्द ही लोकसभा अध्यक्ष को एक पत्र सौंपकर संसद में एक अलग गुट बनाने की मांग कर सकते हैं, जिससे टीएमसी की राष्ट्रीय स्तर पर भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। बागी विधायकों और सांसदों का मुख्य विरोध पार्टी में केंद्रीकृत फैसले लेने की प्रवृत्ति और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को लेकर है। बागी गुट साफ तौर पर मांग कर रहा है कि अभिषेक बनर्जी को पार्टी में मुख्य भूमिका से हटाया जाए। वे चाहते हैं कि ममता बनर्जी केवल एक मुख्य सलाहकार के रूप में काम करें और संगठन लोकतांत्रिक तरीके से संचालित हो। यह स्थिति टीएमसी के लिए एक गंभीर चुनौती पेश कर रही है, जहां उसे न केवल सत्ता गंवानी पड़ी है, बल्कि अब अपने ही अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
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