पश्चिम बंगाल में लागू होगी आयुष्मान भारत योजना, देश का 36वां राज्य/केंद्रशासित प्रदेश बनेगा
नई दिल्ली, 7 जून (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल जल्द ही आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी पीएम-जे एवाई) लागू करने वाला देश का 36वां राज्य/केंद्रशासित प्रदेश बनने जा रहा है। इसके साथ ही देश में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज और सभी नागरिकों तक सस्ती व गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, सोमवार को राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) और पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए जाएंगे, जिसके साथ राज्य आधिकारिक रूप से इस प्रमुख स्वास्थ्य बीमा योजना से जुड़ जाएगा।
एमओयू हस्ताक्षर समारोह की अध्यक्षता केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा करेंगे। इस अवसर पर केंद्र और राज्य सरकार के कई वरिष्ठ नेता एवं अधिकारी मौजूद रहेंगे। कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी, केंद्रीय राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव और अनुप्रिया पटेल, केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव तथा पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव मनोज कुमार अग्रवाल के शामिल होने की संभावना है।
पश्चिम बंगाल के इस योजना से जुड़ने के बाद राज्य के पात्र परिवारों को प्रति वर्ष 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा कवर मिलेगा। यह सुविधा सेकेंडरी और टर्शियरी स्तर के अस्पतालों में भर्ती और इलाज के लिए उपलब्ध होगी।
सरकार का मानना है कि इस योजना से गरीब और कमजोर वर्ग के परिवारों पर इलाज का आर्थिक बोझ कम होगा तथा उन्हें सरकारी और सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंगी।
आयुष्मान भारत पीएम-जेएवाई योजना देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में से एक है, जिसका उद्देश्य गंभीर बीमारियों के इलाज पर होने वाले भारी खर्च से लोगों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना है।
पश्चिम बंगाल के योजना में शामिल होने के बाद राज्य के पात्र लाभार्थियों को पोर्टेबिलिटी सुविधा भी मिलेगी, जिसके तहत वे देशभर के सूचीबद्ध अस्पतालों में कैशलेस इलाज का लाभ उठा सकेंगे। अधिकारियों का कहना है कि इससे राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता दोनों में सुधार होगा तथा सभी नागरिकों को किफायती स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के लक्ष्य को मजबूती मिलेगी।
--आईएएनएस
डीएससी
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Pakistan: सिंध में गहराया जल संकट, पंजाब पर तय हिस्से से अधिक पानी लेने का लगाया आरोप
पाकिस्तान के दो प्रांत पानी बंटवारे को लेकर आपस में भिड़े हुए हैं. हालात बेकाबू होते जा रहे हैं, लेकिन हुक्मरान बेफिक्र हैं. स्थानीय मीडिया का दावा है कि सिंध प्रांत में खरीफ सीजन के दौरान गंभीर जल संकट पैदा हो गया है. यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान पहले ही जलवायु परिवर्तन, घटते जल संसाधनों और कृषि चुनौतियों से जूझ रहा है.
कृषि क्षेत्र प्रभावित हो रहे
प्रमुख अंग्रेजी दैनिक डॉन ने विभिन्न नहरों की गिरती तस्वीर पेश की है. उनके अनुसार, इलाके के बड़े बैराज सुक्कुर की राइट बैंक नहर प्रणाली में पानी की भारी कमी दर्ज की गई है, जिससे लरकाना, कंबर-शहदादकोट, दादू, शिकारपुर और बलूचिस्तान के कई कृषि क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं.
सिंध सिंचाई विभाग के आंकड़ों के अनुसार, नॉर्थ वेस्ट कैनाल (एनडब्ल्यूसी) में 64.1 प्रतिशत, राइस कैनाल में 38 प्रतिशत और दादू कैनाल में 82 प्रतिशत पानी की कमी है. इस कारण धान की खेती और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो रही है.
44,000 क्यूसेक पानी आवंटित
अधिकारियों और किसानों का आरोप है कि संकट की एक बड़ी वजह पंजाब प्रांत का अपने निर्धारित हिस्से से अधिक पानी का उपयोग करना है. रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब को 44,000 क्यूसेक पानी आवंटित है, लेकिन वह 53,394 क्यूसेक पानी ले रहा है, जो तय हिस्से से लगभग 21 प्रतिशत अधिक है. इसी तरह तौंसा बैराज पर भी निर्धारित मात्रा से ज्यादा पानी निकाले जाने का दावा किया गया है.
1,00,000 क्यूसेक पानी उपलब्ध
दूसरी ओर, चश्मा बैराज में जलस्तर लगातार बढ़ रहा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि ऊपरी क्षेत्रों में पानी जमा हो रहा है जबकि निचले इलाकों में कमी लगातार बढ़ती जा रही है. सिंध सरकार ने 1,30,000 क्यूसेक पानी की मांग की थी, लेकिन उसे केवल 1,00,000 क्यूसेक पानी उपलब्ध कराया जा रहा है.
लगभग 1.4 अरब डॉलर का निर्यात
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के सिंध अध्यक्ष निसार अहमद खुखरो ने चेतावनी दी है कि खरीफ सीजन में सिंध के हिस्से का पानी कम करना प्रांत की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर डालेगा. उन्होंने कहा कि सिंध हर साल 55 लाख टन चावल का उत्पादन करता है और लगभग 1.4 अरब डॉलर का निर्यात करता है.
आजीविका को अपूरणीय नुकसान
किसानों का कहना है कि कई क्षेत्रों में अभी तक धान की नर्सरी तैयार नहीं हो सकी है क्योंकि नहरों के अंतिम छोर तक पानी नहीं पहुंचा है. चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो कृषि उत्पादन और ग्रामीण आजीविका को अपूरणीय नुकसान हो सकता है.
यह विवाद पाकिस्तान के 1991 जल बंटवारा समझौते के प्रारूप को लेकर भी सवाल खड़े करता है. जल संसाधनों के असमान वितरण से न केवल प्रांतों के बीच राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और निर्यात आय पर भी असर पड़ सकता है.
रेगिस्तान में सिंचाई के लिए छह नहरें
अप्रैल 2025 में दस दिनों तक जल बंटवारे के मुद्दे पर पाकिस्तान लगभग ठप हो गया था. देश के एकमात्र बंदरगाह शहर कराची से उत्तर की ओर स्थित आबादी वाले क्षेत्रों तक कोई भी माल ढुलाई नहीं हुई थी. इसकी वजह सरकार द्वारा पूर्वी पाकिस्तान के चोलिस्तान रेगिस्तान में सिंचाई के लिए छह नहरें बनाने की परियोजना का ऐलान था. पानी की आपूर्ति में कमी की आशंका से दक्षिणी सिंध प्रांत में प्रदर्शन शुरू हुए थे. प्रदर्शनकारियों ने इस परियोजना को तुरंत रद्द करने की मांग की और उत्तर की ओर जाने वाले सभी राजमार्गों को अवरुद्ध कर दिया था, जिसके बाद आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा था. स्रोत: आईएएनएस
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