एनएचआरसी ने ‘एनालॉग पनीर’ पर मांगे जवाब, एफएसएसएआई और राज्यों को दो हफ्ते में देनी होगी रिपोर्ट
नई दिल्ली, 14 अगस्त (आईएएनएस)। दूध से बने पारंपरिक पनीर के विकल्प के तौर पर बाजार में बिक रहे “एनालॉग पनीर” को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने चिंता जताई है। आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो के नेतृत्व वाली बेंच ने इसके निर्माण, लाइसेंसिंग, बिक्री और उपभोग से जुड़े नियामकीय, पोषण और खाद्य सुरक्षा पहलुओं पर विस्तृत जानकारी मांगी है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के साथ सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
एनएचआरसी ने एफएसएसएआई से पूछा है कि एनालॉग पनीर की मौजूदा नियामकीय स्थिति क्या है और इसकी संरचना के लिए कौन से मानक लागू हैं। आयोग ने इसके पोषण मूल्य, संभावित स्वास्थ्य प्रभाव, खाद्य सुरक्षा मानकों और परीक्षण पद्धतियों पर भी स्पष्टीकरण मांगा है।
बेंच ने विशेष रूप से यह मूल सवाल उठाया है कि जब किसी उत्पाद की संरचना पारंपरिक दूध से बने पनीर से पर्याप्त रूप से अलग है, तो उसे पनीर के विकल्प के रूप में बनाने और बाजार में बेचने की अनुमति देने का नियामकीय और पोषण संबंधी आधार क्या है। आयोग ने दूध से बने पनीर और वनस्पति तेल या वसा तथा अन्य गैर-दुग्ध घटकों से तैयार उत्पादों के बीच अंतर करने वाली वैज्ञानिक परीक्षण पद्धतियों की जानकारी भी मांगी है। इसमें बीटा-सिटोस्टेरोल की भूमिका और प्रासंगिकता भी शामिल है।
आयोग ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों से एनालॉग पनीर के निर्माण, आपूर्ति, बिक्री और खाद्य प्रतिष्ठानों में इसके परोसे जाने की स्थिति बताने को कहा है। उनसे निरीक्षण, सैंपलिंग, सामने आए उल्लंघनों और की गई प्रवर्तन कार्रवाई का ब्यौरा भी मांगा गया है।
एनएचआरसी ने उपभोक्ताओं के सूचना के अधिकार को भी महत्वपूर्ण मुद्दा माना है। बेंच जानना चाहती है कि क्या उपभोक्ताओं को ऐसे उत्पादों की पहचान, वास्तविक संरचना और पोषण संबंधी विशेषताओं के बारे में स्पष्ट और पर्याप्त जानकारी दी जा रही है, ताकि वे खरीद और सेवन को लेकर सूचित निर्णय ले सकें।
यह मामला एडवांस्ड स्टडी इंस्टीट्यूट ऑफ एशिया (एएसआईए), स्वास्थ्य समता केंद्र की शिकायत के आधार पर आयोग के समक्ष आया। शिकायत के साथ ‘एनालॉग पनीर इन इंडिया: ए फूड-सिस्टम्स थ्रेट टू हेल्थ इक्विटी’ नामक रिपोर्ट भी प्रस्तुत की गई थी। एनएचआरसी ने संज्ञान लेते हुए रिपोर्ट और शिकायत में उठाए गए मुद्दों पर विस्तृत जांच की जरूरत महसूस की है।
--आईएएनएस
एसएके/एएस
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JSSC-CGL Exam Row: 14वीं JPSC रद्द पर CGL से इनकार! जानिए परीक्षा रद्द करने पर सरकार के 3 बड़े कानूनी पेंच
रांची की सड़कों पर लाठियां खाने और हफ्तों से धरने पर बैठे लाखों युवाओं के बीच यह सवाल सबसे तेज है कि जब सरकार 14वीं जेपीएससी रद्द कर सकती है, तो जेएसएससी-सीजीएल को रद्द करने में उसके हाथ क्यों कांप रहे हैं?
हाल ही में हेमंत सोरेन सरकार के प्रतिनिधि और मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने छात्र प्रतिनिधिमंडलों के साथ करीब 6 घंटे तक लंबी वार्ता की। सरकार का दावा है कि उन्होंने छात्रों की 98 प्रतिशत मांगें स्वीकार कर ली हैं, लेकिन जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा को लेकर पेच पूरी तरह से फंसा हुआ है।
जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा रद्द न करने के पीछे सरकार के 3 बड़े पेंच
1. हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी का कानूनी कवच
सरकार की ओर से सबसे बड़ा तर्क अदालती प्रक्रियाओं का दिया जा रहा है। मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के अनुसार, जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा का आयोजन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और उनकी सीधी निगरानी में कराया गया था।
सरकार का कहना है कि जब कोई मामला शीर्ष अदालतों की निगरानी में हुआ हो, तो राज्य सरकार के पास इसे एकतरफा रद्द करने का अधिकार नहीं होता। बिना किसी ठोस कानूनी आधार के इसे रद्द करने पर फैसला सीधे जुडिशियल रिव्यू में फंस जाएगा।
2. रिजल्ट आ चुका है और चयनितों की हो चुकी है जॉइनिंग
सरकार का दूसरा प्रमुख तर्क प्रशासनिक स्थिति से जुड़ा है। अधिकारियों के मुताबिक, सीजीएल परीक्षा की भर्ती प्रक्रिया काफी आगे बढ़ चुकी है। परिणाम घोषित किए जा चुके हैं और बड़ी संख्या में सफल उम्मीदवार अपनी-अपनी पोस्टिंग पर जॉइन भी कर चुके हैं।
सरकार का मानना है कि ऐसे में पूरी परीक्षा रद्द होने पर चयनित अभ्यर्थी अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे, जिससे पूरी भर्ती प्रक्रिया सालों-साल के लिए लटक जाएगी।
3. सीबीआई जांच से इनकार, सीआईडी और ईडी का विकल्प
छात्रों की स्पष्ट मांग है कि पूरी परीक्षा रद्द की जाए और एजेंसी की भूमिका की सीबीआई (CBI) जांच कराई जाए। हालांकि, सरकार ने सीबीआई जांच की मांग ठुकराते हुए सीआईडी (CID) जांच जारी रखने और रिटायर्ड जज की निगरानी का प्रस्ताव दिया है।
सरकार ने कहा है कि यदि सीआईडी जांच में बड़े वित्तीय लेन-देन के पुख्ता सबूत मिलते हैं, तो मामले में प्रवर्तन निदेशालय से भी जांच का आग्रह किया जाएगा, लेकिन परीक्षा रद्द नहीं की जाएगी।
छात्रों का पलटवार: 'सरकार 98% का झूठ बोल रही है'
दूसरी तरफ, आंदोलनकारी छात्र सरकार के दावों को सिरे से खारिज कर रहे हैं। छात्र नेताओं का कहना है कि सरकार 98% मांगें मानने का झूठा भ्रम फैला रही है। हकीकत यह है कि 13 विवादित परीक्षाओं में से सिर्फ 3 परीक्षाओं (14वीं JPSC प्रीलिम्स और JPSC बैकलॉग 2023, 2025) को ही रद्द किया गया है।
छात्रों का आरोप है कि जब पेपर लीक और परीक्षा संचालन एजेंसी टीडीपीएल के फर्जीवाड़े के साफ सबूत मौजूद हैं, तो अदालती प्रक्रिया का बहाना बनाकर केवल सिंडिकेट को बचाने की कोशिश की जा रही है।
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