Hariyali Teej Kab Hai: आज या कल... कब है हरियाली तीज? जानें सही तिथि और दूर करें कंफ्यूजन
Hariyali Teej Kab Hai: सनातन धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए कई व्रत-उपवासों का प्रावधान है. इन्हीं में से एक हरियाली तीज भी है. हरियाली तीज सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन मनाया जाता है. यह व्रत अखंड सौभाग्यवती के लिए रखा जाता है. इस दिन उनकी लंबी आयु की कामना की जाती है. सभी सुहागिन महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं और माता पार्वती और शिव जी की विधिवत पूजा करती है. यह व्रत भारत के उत्तर और पूर्वी राज्यों जैसे बिहार, यूपी, राजस्थान, दिल्ली में मनाया जाता है. हरियाली तीज खुशियों का पर्व भी होता है. जिस प्रकार महिलाएं करवा चौथ पर खूब सजती संवरती है बिल्कुल उसी प्रकार हरियाली तीज पर भी महिलाएं हरी चुड़ियां, साड़ी और सोलह-श्रृंगार करती है. इस साल हरियाली तीज की तारीख को लेकर कंफ्यूजन है कि ये 14 को है या फिर 15 को. चलिए आपको इस आर्टिकल में सही तारीख बताते हैं.
हरियाली तीज कब की है? (hariyali teej kab ki hai)
द्रिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष हरियाली तीज का व्रत 15 अगस्त, 2026 को शनिवार के दिन रखा जाएगा. इस दिन पर ही श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पड़ रही है. बता दें कि तृतीया तिथि का प्रारंभ आज 14 अगस्त को शाम 6 बजकर 46 मिनट पर हो रहा है. वहीं, इस तिथि का समापन 15 अगस्त 2026 को शाम 5 बजकर 28 मिनट पर होगा. ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, हरियाली तीज कल मनाई जाएगी.
ये भी पढ़ें- Mangal Gochar 2026: राहु के साथ मंगल का संयोग! क्या इस महागोचर से आएगी प्रलय? इन 3 राशियों पर दिखेगा प्रभाव
हरियाली तीज शुभ मुहूर्त
हरियाली तीज पर पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त सुबह 07 बजकर 29 से लेकर सुबह 09:08 बजे तक रहने वाला है.
- ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 04:23 से लेकर 05:08 मिनट तक
- प्रातः सन्ध्या- सुबह 04:45 से लेकर 05:52 तक
- अभिजित मुहूर्त- सुबह 11:52 से दोपहर 12 बजकर 44 मिनट तक
- विजय मुहूर्त- दोपहर 02:27 से दोपहर 03:18 तक
- गोधूलि मुहूर्त- शाम 06:44 से 07:06 तक
- अमृत काल- रात्रि 08:18 से रात्रि 09:53 तक
हरियाली तीज 2026 के शुभ योग
इस वर्ष हरियाली तीज पर 3-3 शुभ योगों का निर्माण हो रहा है. इस दिन शिव, सिद्ध और रवि योग बनेंगे. इन तीनों को ही अत्यंत शुभ माना जाता है. 15 अगस्त की सुबह से लेकर 16 अगस्त को सुबह 5 बजकर 21 मिनट तक इन योगों का प्रभाव रहेगा. रवि योग सुबह 5 बजकर 52 मिनट से लेकर 16 अगस्त की सुबह 3:25 तक रहेगा. इस दिन शिव योग का निर्माण सुबह 7 बजकर 9 मिनट से होगा.
हरियाली तीज महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हरियाली तीज का व्रत माता पार्वती ने रखा था. इस पावन तिथि पर माता पार्वती ने कठोर तपस्या की थी और इसके बाद ही भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया था. सावन के महीने में चारों तरफ हरियाली होती है. इसलिए, इस तीज को हरियाली तीज का नाम दिया जाता है. हरियाली तीज का त्योहार भगवान शिव व माता पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतिक है. इस दिन महिलाएं माता पार्वती की पूजा करती हैं व सुखी वैवाहिक जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं. महिलाएं नए वस्त्र, खासतौर पर हरी साड़ी में सजधज कर अपने मायके जाती हैं और तीज के गीत गाते हुए हर्षोल्लास के साथ झूला झूलने का आनंद लेती हैं.
ये भी पढ़ें- Sawan 2026: कालसर्प दोष से छुटकारा पाने के लिए क्यों जाते हैं श्रद्धालु त्र्यंबकेश्वर मंदिर? जानें पौराणिक कथा
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए प्रदान की गई है. News Nation इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
Explainer: पाकिस्तान के साथ 4 बड़े युद्ध में कौन बना भारत का साथी? इन देशों ने दिया हमारे दुश्मन का साथ
भारत और पाकिस्तान, जो कभी एक अभिन्न अंग थे लेकिन आज दो अलग-अलग राष्ट्र हैं. एक ऐसे राष्ट्र जिन्होंने आजादी से अब तक कुल 4 बड़े युद्ध लड़ लिए, जिनमें 1947-48 का पहला कश्मीर युद्ध, 1965 का भारत-पाक युद्ध, 1971 का युद्ध और 1999 का कारगिल युद्ध. चारों युद्धों में भारत और पाकिस्तान की सेनाएं आमने-सामने थीं. हालांकि, लड़ाई का असर सिर्फ दोनों देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं था. चारों युद्धों में इंटरनेशनल पॉलिटिक्स, हथियारों की सप्लाई, सैन्य सहयोग और संयुक्त राष्ट्र में कूटनीतिक समर्थन ने भी बड़ी भूमिका निभाई.
आखिर इन चार युद्धों में भारत के साथ कौन खड़ा था? और पाकिस्तान को किसका साथ मिला? 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आइए युद्ध-दर-युद्ध देश के दुश्मनों और दोस्तों के बारे समझते हैं…
1947-48: पहली जंग में पाकिस्तान को मिला अप्रत्यक्ष सैन्य सहयोग
भारत-पाकिस्तान के बीच पहला युद्ध जम्मू-कश्मीर को लेकर 1947 में शुरू हुआ था. पाकिस्तान की तरफ से कबायली लड़ाके कश्मीर में दाखिल हुए थे. उनके साथ पाकिस्तानी सेना का भी समर्थन था. उस वक्त के जम्मू-कश्मीर के महाराज हरि सिंह ने भारत से सैन्य मदद मांगी और 26 अक्टूबर 1947 को भारत में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए. इसके बाद भारतीय सेना कश्मीर पहुंची.
उस युद्ध में पाकिस्तान को वैसी खुली विदेशी सैन्य मदद नहीं मिली, जैसी बाद के दशकों में अमेरिका या चीन से मिली. हालांकि पाकिस्तान की ओर से आए कबायली लड़ाकों को हथियार और रसद उपलब्ध कराने में पाकिस्तानी तंत्र की भूमिका रही. 1948 में पाकिस्तानी सेना भी सीधे संघर्ष में उतर आई.
वहीं, दूसरी ओर भारत को सबसे अहम मदद अपनी सैन्य क्षमता और ब्रिटिश भारतीय सेना से विरासत में मिले संसाधनों से मिली. भारत ने अमेरिकी सैन्य उपकरण खरीदने की कोशिश तो की लेकिन अमेरिका ने उस वक्त भारत और पाकिस्तान दोनों को युद्ध सामग्री देने पर रोक लगा दी थी, क्योंकि कश्मीर का विवाद संयुक्त राष्ट्र में पहुंच चुका था.
नतीजा: 1 जनवरी 1949 को युद्धविराम हुआ. कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के नियंत्रण में तथा कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा भारत के नियंत्रण में रहा.
1965: पाकिस्तान के पीछे चीन, ईरान और तुर्की; अमेरिका ने हथियार रोक दिए
1965 के युद्ध में जियोपोलिटिक्स पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो चुकी थी. पाकिस्तान उस वक्त अमेरिका के नेतृत्व वाले SEATO और CENTO सैन्य गठबंधनों का सदस्य था. उसके पास अमेरिकी हथियारों का बहुत बड़ा भंडार था. दूसरी ओर चीन और पाकिस्तान के रिश्ते भी तेजी से मजबूत हो रहे थे. युद्ध शुरू होने के बाद चीन ने पाकिस्तान को खुला समर्थन दिया. चीन ने भारत को अल्टीमेटम दिया और भारत पर आक्रामकता का आरोप लगाया. हालांकि चीन सीधे युद्ध में नहीं उतरा.
पाकिस्तान को ईरान और तुर्की का भी समर्थन मिला. दोनों देशों ने भारत को संघर्ष के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए संयुक्त बयान जारी किया. उन्होंने पाकिस्तान का समर्थन जताया. इंडोनेशिया और सऊदी अरब ने भी पाकिस्तान को अलग-अलग तरह की सहायता दी, जिसमें ईंधन, हथियार, गोला-बारूद और आर्थिक सहायता शामिल थी. हालांकि, अहम बात ये है कि पाकिस्तान को अमेरिका से सीधे वह मदद नहीं मिल पाई, जिसकी उसको उम्मीद दी. अमेरिका और ब्रिटेन ने भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए हथियारों की सप्लाई रोक दी.
अब बात भारत को मिले समर्थन की. भारत को 1965 की जंग में सोवियत संघ से खुला समर्थन नहीं मिल पाया था. वहीं, सोवियत ने इस युद्ध में मध्यस्थ की भूमिका निभाई.
नतीजा: युद्धविराम के बाद दोनों देशों की सेनाएं युद्ध-पूर्व स्थिति के करीब लौटीं. हालांकि, इस युद्ध ने पाकिस्तान और चीन के बीच सैन्य रिश्तों को और मजबूत कर दिया.
1971: भारत के साथ सोवियत संघ, पाकिस्तान के साथ अमेरिका और चीन
1971 का युद्ध सबसे अलग था. इस बार मुद्दा सिर्फ कश्मीर नहीं बल्कि पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक संकट और बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन था. पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई की वजह से बड़ी संख्या में शरणार्थी पूर्वी पाकिस्तान से भारत में दाखिल हो रहे थे, जिससे भारत को खुलकर युद्ध में उतरना पड़ गया.
खास बात है कि युद्ध से ठीक पहले भारत और सोवियत संघ ने शांति, मित्रता और सहयोग का वादा करते हुए समझौता किया था. ये समझौता भारत के बहुत काम आया. सोवियत संघ ने संयुक्त राष्ट्र में भारत के हितों का समर्थन किया और रूस की मौजूदगी की वजह से चीन के संभावित हस्तक्षेप को रोका जा सका.
पाकिस्तान इस युद्ध में अमेरिका और चीन का समर्थन लिए बैठा था. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के लिए पाकिस्तान रणनीतिक रूप से काफी ज्यादा अहम था. अमेरिका ने पाकिस्तान का साथ देते हुए भारत के खिलाफ सातवें बेड़े का एक हिस्सा बंगाल की खाड़ी में भेज दिया. पाकिस्तान के समर्थन में चीन भी था, हालांकि वह खुलकर भारत के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में नहीं उतरा. कहा जाता है कि चीन ने पाकिस्तान को सैन्य हार्डवेयर भी उपलब्ध करवाया था. रूस ने अमेरिका को रोकने के लिए अपने युद्धपोतों और परमाणु पनडुब्बियों का बेड़ा हिंद महासागर में उतार दिया था. सोवियत का समर्थन ही भारत के लिए इस युद्ध में सबसे अहम इंटरनेशनल पावर बना.
नतीजा: 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने ढाका में आत्मसमर्पण किया और बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश के रूप में अस्तित्व में आया.
1999 कारगिल: पाकिस्तान लगभग अलग-थलग
1999 का कारगिल युद्ध इंटरनेशनल समर्थन के मामले में भारत के लिए सबसे मजबूत युद्ध माना जाता है. पाकिस्तान की सेना और घुसपैठियों ने एक साथ भारतीय हिस्से की ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया. भारतीय सेना ने पाकिस्तान को खदेड़ने के लिए ऑपरेशन विजय शुरू किया. पाकिस्तान को उम्मीद थी कि इंटरनेशनल प्रेशर भारत पर पड़ेगा और वह कश्मीर मुद्दे को फिर से इंटरनेशनल मंचों पर उठाएगा. हालांकि, चीजें पाकिस्तान के पक्ष में नहीं गईं.
अमेरिका ने पाकिस्तान से नियंत्रण रेखा का सम्मान करने और अपने सैनिकों को पीछे हटाने का दबाव बनाया. 4 जुलाई 1999 को अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात की और सैनिकों की वापसी तथा LoC बहाल करने पर जोर दिया. पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध काफी मजबूत थे लेकिन 1999 के युद्ध में अमेरिका ने ही पाकिस्तान को पीछे हटने के लिए मजबूर किया.
नतीजा: अंतरराष्ट्रीय दबाव और सैन्य कार्रवाई के बाद पाकिस्तान की सेनाएं पीछे हट गईं. 26 जुलाई 1999 को भारत के विजय के साथ कारगिल का युद्ध समाप्त हो गया.
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
News Nation










