डकैत: एक प्रेम कथा:अदिवि शेष ने कहा- दर्शक अब सिर्फ एक्शन नहीं, रोल्स को भी महसूस करना चाहता है
अदिवि शेष इन दिनों अपनी एक्शन-ड्रामा फिल्म ‘डकैत: एक प्रेम कथा’ को लेकर चर्चा में हैं। ‘क्षणम’, ‘गूढ़ाचारी’ और ‘मेजर’ जैसी फिल्मों के जरिए अपनी अलग पहचान बना चुके शेष ने इस फिल्म के माध्यम से एक बार फिर दर्शकों के सामने नई कहानी पेश करने की तैयारी की है। दैनिक भास्कर के साथ इस विशेष बातचीत में अदिवि शेष ने अपनी आगामी से अपने जुड़ाव और इसके अन्य पहलुओं पर चर्चा की। मेरे लिए ‘डकैत’ का उद्देश्य केवल एक्शन दिखाना नहीं था ‘डकैत’ मूल रूप से सबसे पहले एक प्रेम कहानी है। मैं हमेशा इसे इसी तरह देखता हूं कि यह प्यार की कहानी में बुना गया एक्शन है, न कि एक्शन की कहानी में जोड़ा गया प्यार। अगर आपने फिल्म का गाना ‘रूबरू’ सुना है, जिसे फहीम अब्दुल्ला ने आवाज दी है, तो उसमें एक बेहद सादगी भरा, रूहानी और पुराने दौर के प्रेम का एहसास मिलता है। यह वैसी ही भावनाओं को दर्शाता है, जैसा कभी पुराने उपन्यासों या पिछली पीढ़ियों की प्रेम कहानियों में देखने को मिलता था। फिल्म का मूल विचार यही था कि जब इतने सरल, पवित्र और भावनात्मक प्रेम के बीच अचानक हिंसा और तीव्र एक्शन प्रवेश करता है, तो पूरा परिवेश किस तरह बदलता है। यही विरोधाभास इस कहानी की सबसे बड़ी ताकत है। मेरे लिए ‘डकैत’ का उद्देश्य केवल एक्शन दिखाना नहीं था, बल्कि यह दिखाना था कि भावनात्मक रूप से गहरे रिश्तों के बीच संघर्ष और हिंसा किस तरह असर डालते हैं। यही तत्व फिल्म को अलग, बड़े कैनवास वाली और विश्वसनीय बनाते हैं। मुझे अच्छी स्क्रिप्ट मिले, तो मैं जर्मन भाषा में भी फिल्म कर लूंगा मेरा नजरिया हमेशा से स्पष्ट रहा है। मैंने तब भी कहा था कि अगर मुझे अच्छी स्क्रिप्ट मिले, तो मैं जर्मन भाषा में भी फिल्म करने के लिए तैयार हूं। मेरे लिए भाषा नहीं, बल्कि कहानी महत्वपूर्ण है। ‘मेजर’ के बाद मुझे हिंदी और साउथ फिल्म इंडस्ट्री से 4-5 बड़ी वॉर फिल्में और बायोपिक्स ऑफर हुई थीं, लेकिन मेरे भीतर का लेखक मुझे बार-बार रोक रहा था। मुझे लगा कि मेजर संदीप उन्नीकृष्णन का किरदार निभाने के तुरंत बाद किसी दूसरी सैनिक-आधारित कहानी का हिस्सा बनना सही नहीं होगा। मैं उनके माता-पिता की भावनाओं और उनकी यादों के प्रति ईमानदार रहना चाहता था। मेरे लिए हमेशा वही कहानी मायने रखती है, जो भीतर तक प्रभावित करे। इंसानियत की शुरुआत ही माता-पिता से होती है मेरा मानना है कि प्यार कभी सामाजिक विषय नहीं रहा, बल्कि यह हमेशा एक बेहद व्यक्तिगत भावना रही है। इंसानियत की शुरुआत से ही माता-पिता, भाई-बहन और प्रेमियों के बीच भावनात्मक रिश्ते मौजूद रहे हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि इन रिश्तों पर अब नई कहानियां नहीं कही जा सकतीं।
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