श्रेयस अय्यर बने टीम इंडिया के नए T20 कप्तान, सूर्यकुमार यादव युग का हुआ अंत
Team India New T20 Captain: भारतीय टीम को नया टी20 कप्तान मिल गया है. श्रेयस अय्यर को टीम इंडिया का नया टी20 कप्तान बनाया गया है. वहीं बीसीसीआई के सूत्रों से पता चला है कि तिलक वर्मा को उपकप्तान बनाया जाएगा. यानी अय्यर अब सूर्यकुमार यादव की जगह लेंगे. हालांकि अभी बीसीसीआई की ओर से अधिकारिक ऐलान नहीं किया गया है. BCCI जल्द ही इसका ऐलान कर सकती है.
टीम इंडिया के नए टी20 कप्तान होंगे श्रेयस अय्यर
भारतीय टीम इसी महीने के आखिरी में आयरलैंड दौरे पर जाएगी, जहां 2 टी20 मैचों की सीरीज खेली जानी है. इसके बाद टीम इंडिया जुलाई की शुरुआत में इंग्लैंड का दौरा करेगी, जहां 5 टी20 मैचों की सीरीज खेली जाएगी. ईएसपीएन क्रिकइंफो की खबर के मुताबिक इन दोनों टी20 सीरीज के लिए 6 जून को बीसीसीआई की सेलेक्शन कमेटी टीम इंडिया के स्क्वाड का ऐलान करेगी. इस दौरान श्रेयस अय्यर को टी20 कप्तान बनाने का ऐलान किया जाएगा. रिपोर्ट के मुताबिक अय्यर वहां मौजूद रहेंगे.
वैभव सूर्यवंशी को पहली बार मिलेगी टीम इंडिया में जगह
बीसीसीआई ने साल 2028 में होने वाले ओलंपिक गेम्स और टी20 वर्ल्ड कप 2028 की तैयारियों को ध्यान में रखते हुए उसी दिशा में आगे बढ़ने का फैसला लिया है. इसके अलावा आईपीएल 2026 में राजस्थान रॉयल्स की ओर से खेलते हुए अपनी बल्लेबाजी से खासा प्रभावित करने वाले वैभव सूर्यवंशी को भी आयरलैंड और इंग्लैंड दौरे पर खेली जाने वाली टी20 सीरीज के लिए टीम इंडिया में जगह मिल सकता है. वैभव पहली बार सीनियर टीम इंडिया का हिस्सा होंगे. वैभव को डेब्यू करने का मौका मिलता है तो वो सबसे कम उम्र में इंटरनेशनल क्रिकेट खेलने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बन जाएंगे. यह रिकॉर्ड अभी सचिन तेंदुलकर के नाम दर्ज है. सचिन ने 16 साल 205 दिन की उम्र में अपना इंटरनेशनल मैच खेला था.
Shreyas Iyer is set to replace Suryakumar Yadav as India's T20I captain, and Vaibhav Sooryavanshi is set for his maiden call-up as India's selectors look towards the LA 2028 Olympics and the T20 World Cup in the same year
— ESPNcricinfo (@ESPNcricinfo) June 4, 2026
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Uncovered With Manoj Gairola: दीदी का वो कौन सा गलत कदम था, जिसकी वजह से आई TMC में फूट, क्या थी इस बगावत की वजह
Uncovered with Manoj Gairola: "तुम्हारे पांवों के नीचे, कोई जमीन नहीं. कमाल ये है, कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं." दुष्यंत कुमार की ये लाइनें ममता बनर्जी पर बिलकुल फिट बैठती हैं. ऐसा पहली बार हुआ है कि एक ऐसी पार्टी, जिसने एक राज्य में लगातार 15 साल शासन किया हो वो चुनाव हारने के एक महीने के अंदर ही टूट जाए और वो भी टीएमसी जैसी ऐसी पार्टी, जिसे ममता ने बनाया और वही उसकी पहचान हैं.
15 साल तक ममता के नाम पर ही जीत मिली. जो विधायक ममता के नाम पर ही जीते, वो ही सबसे पहले उन्हें छोड़कर भाग गए. यानी, जो सियासी जमीन ममता ने बड़े संघर्षों के साथ तैयार की थी, वो उनके पांवों के नीचे से खिसक चुकी है और ममता को इसकी भनक तक नहीं लगी.
पार्टी के नेता भी थे नाराज
मतलब साफ है, कि जनता के साथ-साथ, पार्टी के नेता भी उनसे नाराज थे और किसी डर की वजह से ये नाराजगी छुपी हुई थी. लेकिन सत्ता जाते ही, ये खुलकर सामने आ गई और ऐसे सामने आई कि आज TMC उनके हाथ से निकल सकती है. आज हम आपको बताएंगे कि कैसे हार के एक महीने के अंदर ही टीएमसी टूट गई है. लेकिन पहले आपको बताते हैं कि ममता के MLA कैसे उनको चुनौती दे रहे हैं.
कैसे शुरू हुआ पूरा खेला?
सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं. 4 मई को बंगाल चुनाव के नतीजे आए. ममता की सत्ता गई. TMC के सिर्फ 80 विधायक ही जीते. अब सवाल था नेता विपक्ष कौन बनेगा और यहीं से असली खेला शुरू हुआ. टीएमसी ने सोभनदेव चट्टोपाध्याय को इस पद के लिए नॉमिनेट किया.
पार्टी ने स्पीकर को समर्थन पत्र सौंपा. लेकिन CM शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया कि सोभनदेव के समर्थन पत्र पर TMC के दो विधायकों, ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा के साइन फर्जी हैं. उन्होंने इसकी जांच CID को सौंपी. CID ने ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी को पूछताछ के लिए बुलाया. ममता गुस्से से आगबबूला हुईं और इन दोनों विधायकों को सस्पेंड कर दिया.
एक गलत कदम और पार्टी में आई फूट
ममता के इस कदम ने पार्टी में फूट की नींव रख दी. ममता ने अपने घर पर पार्टी के सभी 80 विधायकों की बैठक बुलाई. लेकिन इस बैठक में महज 20 विधायक ही पहुंचे. इसके बाद ममता ने जब कोलकाता में धरना दिया, तो उनके साथ बस 8-9 विधायक ही आए.
वहीं दूसरी तरफ 60 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में अपना नेता चुना लिया. अब ऋतब्रत बंगाल में नेता विपक्ष बन गए हैं. ममता के बागी विधायकों की संख्या दो-तिहाई हो चुकी है. यानी अब ममता के हाथ से उनके विधायकों के साथ-साथ, उनकी पार्टी और उसका सिंबल भी निकल सकते हैं. ये वो पार्टी है, जो ममता ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर बनाई थी.
इतनी बड़ी बगावत की वजह क्या बनी?
अब आते है असली सवाल पर कि आखिर ममता के खिलाफ इतनी बड़ी बगावत की वजह क्या है? ममता बनर्जी 2011 में सत्ता में आई थीं. लोगों ने ममता को लेफ्ट सरकार के करप्ट सिस्टम के खिलाफ वोट दिया था. ये वो सिस्टम था जिसके कारण लेफ्ट सरकार लंबे समय तक सत्ता में थी.
इस सिस्टम के लाभार्थी, लेफ्ट पार्टियों के आम कार्यकर्ता से लेकर पदाधिकारी तक थे. कट मनी इस सिस्टम इसका मुख्य आधार था. लेकिन आम जनता दुखी थी. सत्ता का खौफ ऐसा था कि सिस्टम के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाता था. डर का आलम ये था, कि इलेक्शन के समय भी लोग सरकार के खिलाफ वोट देते हुए डरते थे. ऐसे में जब ममता बनर्जी मजबूत हुईं, तो लोगों का डर खत्म हुआ और ममता को सत्ता भी मिली. लेकिन धीरे-धीरे कट मनी का ये सिस्टम, ममता सरकार में भी कायम हो गया. नतीजा ये हुआ कि ममता जैसी जमीनी नेता जनता से कट गईं. हालांकि उन्हें वोट मिलते रहे, क्योंकि लोगों के मन में शासन का डर था.
शुरुआती 2 कार्यकाल तक रहीं लोकप्रिय नेता
ममता अपने पहले और दूसरे कार्यकाल तक लोकप्रिय नेता थीं. इसी दौरान उन्होंने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी का सियासी कद बढ़ाना भी शुरू कर दिया. इसी वजह से शुभेंदु अधिकारी जैसे मजबूत नेता TMC छोड़ गए. शुभेंदु ने ही नंदीग्राम आंदोलन को मैनेज किया था. ये आंदोलन ममता को पहली बार सत्ता दिलाने में अहम वजह बना था.
बढ़ता गया अभिषेक का दखल
ममता के तीसरे कार्यकाल के दौरान TMC में अभिषेक की पावर लगातार बढ़ती गई. कट मनी की सिस्टम भी इसी कार्यकाल में अपने चरम पर पहुंच गया. पार्टी के ज्यादातर फैसलों में अभिषेक का दखल बढ़ गया और ममता पार्टी के नेताओं से दूर होने लगीं. जब तक सत्ता ममता के हाथ में रही, तब तक अभिषेक का डंडा चलता रहा और बगावत दबी रही. लेकिन जैसे ही सत्ता हाथ से निकली, वैसे ही टीएमसी में विद्रोह सामने आ गया.
भाजपा आते ही कट मनी के सिस्टम पर एक्शन शुरू
बीजेपी की सरकार आते ही सीएम शुभेंदु ने कट मनी के सिस्टम पर एक्शन शुरू कर दिया. एक महीने के अंदर ही सैंकड़ों TMC वर्कर्स और नेताओं को अरेस्ट किया गया. इस कदम से TMC के नेताओं में भी डर बैठ गया. उसके कुछ नेताओं ने तो कट मनी का पैसा वापस लौटाना भी शुरू कर दिया.
बंगाल में ममता पर मुस्लिम तुष्टिकरण के बड़े आरोप लगते रहे. बंगाल के 30% मुसलमान उनकी पार्टी का कोर वोटबैंक रहे. लेकिन हार के बाद, अधिकांश मुस्लिम विधायक ममता को छोड़कर बागी खेमे में शामिल हो गए. यानी अब ममता की राजनीति मुश्किल में फंस गई है.
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