Uncovered With Manoj Gairola: दीदी का वो कौन सा गलत कदम था, जिसकी वजह से आई TMC में फूट, क्या थी इस बगावत की वजह
Uncovered with Manoj Gairola: "तुम्हारे पांवों के नीचे, कोई जमीन नहीं. कमाल ये है, कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं." दुष्यंत कुमार की ये लाइनें ममता बनर्जी पर बिलकुल फिट बैठती हैं. ऐसा पहली बार हुआ है कि एक ऐसी पार्टी, जिसने एक राज्य में लगातार 15 साल शासन किया हो वो चुनाव हारने के एक महीने के अंदर ही टूट जाए और वो भी टीएमसी जैसी ऐसी पार्टी, जिसे ममता ने बनाया और वही उसकी पहचान हैं.
15 साल तक ममता के नाम पर ही जीत मिली. जो विधायक ममता के नाम पर ही जीते, वो ही सबसे पहले उन्हें छोड़कर भाग गए. यानी, जो सियासी जमीन ममता ने बड़े संघर्षों के साथ तैयार की थी, वो उनके पांवों के नीचे से खिसक चुकी है और ममता को इसकी भनक तक नहीं लगी.
पार्टी के नेता भी थे नाराज
मतलब साफ है, कि जनता के साथ-साथ, पार्टी के नेता भी उनसे नाराज थे और किसी डर की वजह से ये नाराजगी छुपी हुई थी. लेकिन सत्ता जाते ही, ये खुलकर सामने आ गई और ऐसे सामने आई कि आज TMC उनके हाथ से निकल सकती है. आज हम आपको बताएंगे कि कैसे हार के एक महीने के अंदर ही टीएमसी टूट गई है. लेकिन पहले आपको बताते हैं कि ममता के MLA कैसे उनको चुनौती दे रहे हैं.
कैसे शुरू हुआ पूरा खेला?
सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं. 4 मई को बंगाल चुनाव के नतीजे आए. ममता की सत्ता गई. TMC के सिर्फ 80 विधायक ही जीते. अब सवाल था नेता विपक्ष कौन बनेगा और यहीं से असली खेला शुरू हुआ. टीएमसी ने सोभनदेव चट्टोपाध्याय को इस पद के लिए नॉमिनेट किया.
पार्टी ने स्पीकर को समर्थन पत्र सौंपा. लेकिन CM शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया कि सोभनदेव के समर्थन पत्र पर TMC के दो विधायकों, ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा के साइन फर्जी हैं. उन्होंने इसकी जांच CID को सौंपी. CID ने ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी को पूछताछ के लिए बुलाया. ममता गुस्से से आगबबूला हुईं और इन दोनों विधायकों को सस्पेंड कर दिया.
एक गलत कदम और पार्टी में आई फूट
ममता के इस कदम ने पार्टी में फूट की नींव रख दी. ममता ने अपने घर पर पार्टी के सभी 80 विधायकों की बैठक बुलाई. लेकिन इस बैठक में महज 20 विधायक ही पहुंचे. इसके बाद ममता ने जब कोलकाता में धरना दिया, तो उनके साथ बस 8-9 विधायक ही आए.
वहीं दूसरी तरफ 60 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में अपना नेता चुना लिया. अब ऋतब्रत बंगाल में नेता विपक्ष बन गए हैं. ममता के बागी विधायकों की संख्या दो-तिहाई हो चुकी है. यानी अब ममता के हाथ से उनके विधायकों के साथ-साथ, उनकी पार्टी और उसका सिंबल भी निकल सकते हैं. ये वो पार्टी है, जो ममता ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर बनाई थी.
इतनी बड़ी बगावत की वजह क्या बनी?
अब आते है असली सवाल पर कि आखिर ममता के खिलाफ इतनी बड़ी बगावत की वजह क्या है? ममता बनर्जी 2011 में सत्ता में आई थीं. लोगों ने ममता को लेफ्ट सरकार के करप्ट सिस्टम के खिलाफ वोट दिया था. ये वो सिस्टम था जिसके कारण लेफ्ट सरकार लंबे समय तक सत्ता में थी.
इस सिस्टम के लाभार्थी, लेफ्ट पार्टियों के आम कार्यकर्ता से लेकर पदाधिकारी तक थे. कट मनी इस सिस्टम इसका मुख्य आधार था. लेकिन आम जनता दुखी थी. सत्ता का खौफ ऐसा था कि सिस्टम के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाता था. डर का आलम ये था, कि इलेक्शन के समय भी लोग सरकार के खिलाफ वोट देते हुए डरते थे. ऐसे में जब ममता बनर्जी मजबूत हुईं, तो लोगों का डर खत्म हुआ और ममता को सत्ता भी मिली. लेकिन धीरे-धीरे कट मनी का ये सिस्टम, ममता सरकार में भी कायम हो गया. नतीजा ये हुआ कि ममता जैसी जमीनी नेता जनता से कट गईं. हालांकि उन्हें वोट मिलते रहे, क्योंकि लोगों के मन में शासन का डर था.
शुरुआती 2 कार्यकाल तक रहीं लोकप्रिय नेता
ममता अपने पहले और दूसरे कार्यकाल तक लोकप्रिय नेता थीं. इसी दौरान उन्होंने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी का सियासी कद बढ़ाना भी शुरू कर दिया. इसी वजह से शुभेंदु अधिकारी जैसे मजबूत नेता TMC छोड़ गए. शुभेंदु ने ही नंदीग्राम आंदोलन को मैनेज किया था. ये आंदोलन ममता को पहली बार सत्ता दिलाने में अहम वजह बना था.
बढ़ता गया अभिषेक का दखल
ममता के तीसरे कार्यकाल के दौरान TMC में अभिषेक की पावर लगातार बढ़ती गई. कट मनी की सिस्टम भी इसी कार्यकाल में अपने चरम पर पहुंच गया. पार्टी के ज्यादातर फैसलों में अभिषेक का दखल बढ़ गया और ममता पार्टी के नेताओं से दूर होने लगीं. जब तक सत्ता ममता के हाथ में रही, तब तक अभिषेक का डंडा चलता रहा और बगावत दबी रही. लेकिन जैसे ही सत्ता हाथ से निकली, वैसे ही टीएमसी में विद्रोह सामने आ गया.
भाजपा आते ही कट मनी के सिस्टम पर एक्शन शुरू
बीजेपी की सरकार आते ही सीएम शुभेंदु ने कट मनी के सिस्टम पर एक्शन शुरू कर दिया. एक महीने के अंदर ही सैंकड़ों TMC वर्कर्स और नेताओं को अरेस्ट किया गया. इस कदम से TMC के नेताओं में भी डर बैठ गया. उसके कुछ नेताओं ने तो कट मनी का पैसा वापस लौटाना भी शुरू कर दिया.
बंगाल में ममता पर मुस्लिम तुष्टिकरण के बड़े आरोप लगते रहे. बंगाल के 30% मुसलमान उनकी पार्टी का कोर वोटबैंक रहे. लेकिन हार के बाद, अधिकांश मुस्लिम विधायक ममता को छोड़कर बागी खेमे में शामिल हो गए. यानी अब ममता की राजनीति मुश्किल में फंस गई है.
बिहार सरकार ने लालू यादव और राबड़ी देवी की Z+ सुरक्षा वापस ली, तेजस्वी यादव की Y+ सुरक्षा रहेगी बरकरार
बिहार के राजनीतिक गलियारों में एक बड़े बदलाव की आहट सुनाई दे रही है, जहां राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को मिली जेड प्लस सुरक्षा पर संकट के बादल छा गए हैं। बिहार सरकार ने गुरुवार, 04 जून, 2026 को एक महत्वपूर्ण पत्र जारी करते हुए उनकी सुरक्षा श्रेणी में कटौती का ऐलान किया है, जिसने राज्य के राजनीतिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राज्य में राजनीतिक गहमागहमी अपने चरम पर है, और इसने विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का एक और मौका दे दिया है।
दरअसल, इस फैसले के बाद अब लालू यादव और राबड़ी देवी को जेड प्लस सुरक्षा का मजबूत कवच नहीं मिलेगा, जो उन्हें अब तक प्राप्त था। इस सुरक्षा श्रेणी को वापस ले लिया गया है। हालांकि, उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री के नाते मिलने वाली सुरक्षा व्यवस्था जारी रहेगी। इस नई व्यवस्था के तहत, बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस (BSAP) से 2 से 8 हाउस गार्ड की प्रतिनियुक्ति की जाएगी, जो उनके आवास की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे। इसके अतिरिक्त, पटना जिला बल से 02 अंगरक्षक चौबीसों घंटे उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा में तैनात रहेंगे। मुख्यालय क्विक रिएक्शन टीम (HQRT) की ओर से उन्हें पायलट और एक बुलेट प्रूफ कार भी उपलब्ध कराई जाएगी, जो उनकी यात्राओं को सुरक्षित बनाएगी। साथ ही, पटना जिला बल से एस्कॉर्ट और पायलट की सुविधा भी उन्हें प्रदान की जाएगी। यह सुरक्षा प्रोटोकॉल राबड़ी देवी पर भी समान रूप से लागू होगा, जिससे उनकी निजी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी और उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री के दर्जे के अनुरूप सुरक्षा कवच मिलता रहेगा।
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को मिलती रहेगी वाई प्लस सुरक्षा
वहीं दूसरी ओर, लालू यादव के छोटे बेटे और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को मिली वाई प्लस कैटेगरी की सुरक्षा व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया गया है। उनकी सुरक्षा पहले की तरह ही बरकरार रहेगी, जो उनके वर्तमान राजनीतिक कद और सुरक्षा आवश्यकताओं को दर्शाती है। तेजस्वी यादव को मिली वाई प्लस सुरक्षा में एक एस्कॉर्ट व्हीकल के साथ बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस (BSAP) से 1 से 4 हाउस गार्ड की सुविधा मिलती रहेगी। इसके अलावा, पटना जिला बल से 06 अंगरक्षक उनकी सुरक्षा में तैनात रहेंगे, जिनमें 03 सादे लिबास में और 03 वर्दीधारी होंगे, जो विभिन्न परिस्थितियों में उनकी सुरक्षा को मजबूत करेंगे। पटना जिला बल से 1 से 4 एस्कॉर्ट पार्टी (वाहन के साथ) की प्रतिनियुक्ति भी की जाएगी। यह व्यापक व्यवस्था उनकी सार्वजनिक गतिविधियों और यात्राओं के दौरान सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करेगी, जिससे उन्हें अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों को निभाने में कोई बाधा न आए।
तेज प्रताप यादव को नहीं मिलेगी अब ए कैटेगरी की सुरक्षा
परिवार के अन्य प्रमुख सदस्यों की सुरक्षा व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण फेरबदल किए गए हैं। लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को, जिन्हें पहले ए कैटेगरी की सुरक्षा मिलती थी, अब सिर्फ एक अंगरक्षक की सुरक्षा प्रदान की जाएगी। यह उनके लिए एक बड़ा बदलाव है और सुरक्षा कमिटी के गहन मूल्यांकन का परिणाम माना जा रहा है। वहीं, राष्ट्रीय जनता दल की सांसद मीसा भारती को तीन सुरक्षाकर्मी मिलेंगे, जो उनके संसदीय दायित्वों के निर्वहन और सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान उनकी सुरक्षा में सहायक होंगे। तेजस्वी यादव की पत्नी राजश्री यादव को भी एक सुरक्षाकर्मी की प्रतिनियुक्ति की जाएगी, जो उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा का ध्यान रखेगा।
वहीं इस सुरक्षा कटौती पर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के प्रवक्ता एजाज एहमद ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और सरकार को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि यह कदम केवल माहौल बनाने की कोशिश है और इसे राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित बताया। एहमद ने आरोप लगाया कि सुरक्षा में की गई यह कटौती दर्शाती है कि सरकार के लोग अपने घर से सुरक्षा मुहैया करने में लगे हुए हैं, जबकि पूर्व मुख्यमंत्रियों की सुरक्षा कम की जा रही है। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव की सुरक्षा में कटौती को नियम संगत नहीं बताया, जिससे इस फैसले पर राजनीतिक घमासान तेज होने के आसार हैं।
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