दमोह: संविदा स्वास्थ्य कर्मचारियों की हड़ताल का दिखा असर, अस्पतालों में स्टाफ की भारी कमी, स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित, मरीज बेहाल
मध्य प्रदेश में संविदा स्वास्थ्य कर्मचारियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल ने पहले ही दिन से स्वास्थ्य सेवाओं पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया है। प्रदेश के विभिन्न जिलों की तरह दमोह में भी आज सुबह से स्वास्थ्यकर्मी हड़ताल पर हैं, जिसका सीधा खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। चंद घंटों के भीतर ही अस्पतालों की व्यवस्थाएं चरमराने लगी हैं, और आम जनमानस की परेशानी बढ़ गई है।
दमोह जिले में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत कार्यरत डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और यहां तक कि पोषण आहार केंद्रों के कर्मचारी भी इस हड़ताल में शामिल हैं। रोजाना मरीजों को मिलने वाली आवश्यक सेवाओं को प्रदान करने वाले इन कर्मचारियों की कमी अब अस्पतालों में स्पष्ट रूप से अखरने लगी है। जिला अस्पताल दमोह के साथ-साथ विभिन्न विकासखंडों में संचालित सिविल अस्पतालों और संजीवनी क्लीनिक्स में भी डॉक्टरों व स्टाफ का भारी टोटा देखा जा रहा है। जिसके कारण मरीजों को इलाज के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है।
अस्पताल में स्टाफ की संख्या में कमी
स्थिति यह है कि ग्रामीण अंचलों में बने संजीवनी क्लीनिक्स तो पूरी तरह से स्टाफ विहीन हो गए हैं। यहां कोई भी कर्मचारी मौजूद नहीं होने के कारण मरीजों को मजबूरन जिला अस्पताल की ओर रुख करना पड़ रहा है। लेकिन जिला अस्पताल में भी संविदा स्वास्थ्य कर्मियों की हड़ताल की वजह से स्टाफ की संख्या कम हो गई है। नतीजतन, दिनभर मरीज अपनी बीमारियों का इलाज कराने के लिए यहां-वहां भटकते नजर आए, उन्हें पर्याप्त और समय पर चिकित्सा सेवा नहीं मिल पाई। ओपीडी से लेकर इमरजेंसी तक में मरीजों की भीड़ और अव्यवस्था का आलम देखा गया।
हालांकि, इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए अस्पताल प्रबंधन ने कुछ कदम उठाए हैं। जिला अस्पताल के सिविल सर्जन की मानें तो मरीजों की परेशानी कम करने के उद्देश्य से नियमित स्टाफ की ड्यूटी का समय बढ़ा दिया गया है। डॉक्टरों के साथ-साथ अन्य नियमित स्टाफ भी अतिरिक्त ड्यूटी कर रहा है, ताकि मरीजों को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। लेकिन यह एक अस्थायी समाधान ही प्रतीत होता है।
हड़ताल के पहले दिन ही अस्पतालों पर बढ़ा काम का दबाव
जिला अस्पताल के आरएमओ का कहना है कि आज हड़ताल का पहला दिन है, और पहले ही दिन से कार्यभार काफी बढ़ गया है। यदि यह हड़ताल लंबी खिंचती है, तो मौजूदा व्यवस्थाओं के दम पर स्थिति को बनाए रख पाना बेहद मुश्किल होगा। उन्होंने भविष्य में और अधिक गंभीर चुनौतियों की आशंका व्यक्त की है।
दूसरी ओर, हड़ताल पर बैठे संविदा कर्मियों का अपना दर्द है। उनका कहना है कि वे स्वेच्छा से काम बंद नहीं करना चाहते हैं। बल्कि, अपने भविष्य को सुरक्षित करने और अपनी मांगों को मनवाने के लिए उन्हें मजबूरन यह रास्ता अपनाना पड़ रहा है। उनकी यह हड़ताल कब तक चलेगी और इसका अंत कैसे होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसका असर आने वाले दिनों में और गहराने की आशंका है। स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ने वाला यह प्रतिकूल प्रभाव आम जनता के लिए चिंता का विषय बन गया है।
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