CBSE में बड़ा बदलाव, जानें अब कौन बना नया चेयरमैन, कहां हुआ राहुल सिंह का तबादला?
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) में बड़ा प्रशासनिक बदलाव करते हुए केंद्र सरकार ने बोर्ड के चेयरमैन राहुल सिंह और सचिव हिमांशु गुप्ता का तबादला कर दिया है. यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षाओं में अपनाई गई डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली को लेकर लगातार सवाल उठ रहे थे. खास बात यह है कि इसके बाद सरकार तुरंत लोखंडे प्रशांत सीताराम को CBSE का नया चेयरमैन नियुक्त किया है, जो अब बोर्ड की जिम्मेदारी संभालेंगे.
कौन है लोखंडे प्रशांत सीताराम?
लोखंडे प्रशांत सीताराम (IAS) भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के एक वरिष्ठ अधिकारी हैं, जिन्हें CBSE (केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड) का नया चेयरमैन नियुक्त किया गया है. वे 2001 बैच के AGMUT (अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मिजोरम और केंद्र शासित प्रदेश) कैडर के IAS अधिकारी हैं.
CBSE चेयरमैन बनने से पहले, वे केंद्रीय गृह मंत्रालय में 'अतिरिक्त सचिव' के पद पर कार्यरत थे. वे गृह मंत्रालय में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख मामलों के विभाग में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं. उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक (B.E.) की डिग्री प्राप्त की है और NITIE, मुंबई से इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग में पोस्टग्रेजुएट डिप्लोमा किया है. लोखंडे को उनकी प्रशासनिक सेवाओं के लिए दो बार 'स्टेट अवार्ड (गोल्ड)' से सम्मानित भी किया जा चुका है.
यह बदलाव केवल प्रशासनिक फेरबदल नहीं माना जा रहा, बल्कि हाल के महीनों में बोर्ड की कार्यप्रणाली को लेकर उठे विवादों के बाद एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है.
उत्तर पुस्तिकाओं को लेकर उठे थे गंभीर सवाल
बता दें कि CBSE उस समय विवादों में घिर गया था जब कई छात्रों ने दावा किया कि पुनर्मूल्यांकन और सत्यापन प्रक्रिया के दौरान उपलब्ध कराई गई उनकी उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन कॉपी उनकी लिखावट से मेल नहीं खा रही थी. छात्रों और अभिभावकों ने आशंका जताई कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली के दौरान उत्तर पुस्तिकाओं के डिजिटलीकरण या मिलान प्रक्रिया में तकनीकी गड़बड़ियां हुई हैं.
इन आरोपों के सामने आने के बाद सोशल मीडिया से लेकर शिक्षा जगत तक व्यापक चर्चा शुरू हो गई. कई छात्रों ने अपनी उत्तर पुस्तिकाओं को लेकर पारदर्शिता की मांग की और पूरे मूल्यांकन सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए.
तकनीकी खामियों पर बढ़ी चिंता
डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली को आधुनिक और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से लागू किया गया था, लेकिन इस बार कई तकनीकी समस्याएं सामने आईं. छात्रों को आवेदन शुल्क जमा करने में दिक्कतें आईं, पोर्टल पर भुगतान विफल होने की शिकायतें मिलीं और सत्यापन तथा पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया भी निर्धारित समय से प्रभावित हुई.
इन समस्याओं के कारण छात्रों और अभिभावकों में असंतोष बढ़ा। शिक्षा विशेषज्ञों का भी मानना था कि इतनी बड़ी परीक्षा प्रणाली में तकनीकी व्यवस्थाओं को और मजबूत किए जाने की आवश्यकता है.
नई टीम के सामने बड़ी चुनौती
लोखंडे प्रशांत सीताराम के सामने अब CBSE की विश्वसनीयता को और मजबूत बनाने की चुनौती होगी. बोर्ड को न केवल डिजिटल मूल्यांकन प्रक्रिया में सुधार करना होगा, बल्कि छात्रों का भरोसा भी दोबारा जीतना होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में CBSE मूल्यांकन प्रणाली की समीक्षा कर सकता है और तकनीकी सुरक्षा, डेटा प्रबंधन तथा उत्तर पुस्तिकाओं के डिजिटलीकरण को लेकर नए प्रोटोकॉल लागू किए जा सकते हैं.
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एक्सप्लेनर: क्या है पीपीआई और थोक महंगाई मापने में डब्ल्यूपीआई से क्यों माना जाता है बेहतर?
नई दिल्ली, 2 जून (आईएएनएस)। लंबी तैयार के बाद केंद्र सरकार की ओर से प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (पीपीआई) को लॉन्च करने का ऐलान मंगलवार को किया। यह आने वाले वर्षों में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) को रिप्लेस करेगा। इसे देश में महंगाई मापने में परिवर्तनकारी कदम माना जा रहा है और इससे सटीक अनुमान लगाने में मदद मिलेगी।
केंद्र सरकार की ओर से 15 जून को डब्ल्यूपीआई और नए पीपीआई को भी जारी किया जाएगा। आइए समझते हैं इन दोनों में अंतर क्या है।
डब्ल्यूपीआई थोक व्यापार के प्रारंभिक चरण में वस्तुओं की कीमतों में होने वाले औसत परिवर्तन को मापता है। पीपीआई घरेलू उत्पादकों द्वारा अपने उत्पादन के लिए कारखाने या खेत के स्तर पर प्राप्त कीमतों में होने वाले औसत परिवर्तन को मापता है।
डब्ल्यूपीआई थोक व्यापारियों और थोक बिक्री के प्रारंभिक बिंदु के दृष्टिकोण से महंगाई का आकलन करता है। पीपीआई उत्पादक के दृष्टिकोण से महंगाई का आकलन करता है।
डब्ल्यूपीआई एक ही उत्पाद की गणना कई बार करता है क्योंकि यह एक थोक बिक्री चरण से दूसरे चरण में जाता है। पीपीआई आपूर्ति और उपयोग तालिकाओं का उपयोग करके एकल उत्पादन चरणों में उत्पादों को ट्रैक करता है, जिससे एकाधिक गणना पूरी तरह से समाप्त हो जाती है।
डब्ल्यूपीआई लेनदेन में अकसर थोक स्तर तक वितरण लागत और अप्रत्यक्ष कर शामिल होते हैं। पीपीआई (विशेष रूप से मूल मूल्य निर्धारण) में कर और व्यापार/परिवहन मार्जिन को शामिल नहीं किया जाता है ताकि उत्पादक को प्राप्त होने वाली सटीक राशि का पता चल सके।
पीपीआई इनपुट इंडेक्स (विनिर्माताओं द्वारा सामग्रियों के लिए भुगतान की गई राशि) और आउटपुट इंडेक्स (वे अपने उत्पादों के लिए जो कीमत वसूलते हैं) दोनों प्रदान करता है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला में मूल्य दबाव किस प्रकार फैलता है, इसका सटीक पता करने में मदद मिलती है।
इसके अतिरिक्त, सरकार की ओर से पीपीआई को लागू करने का उद्देश्य भारतीय डेटा को ग्लोबल स्टैडर्ड के मुताबिक ढालना है।
--आईएएनएस
एबीएस
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