देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक खबर सामने आई है। केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए निर्धारित वित्तीय घाटे के लक्ष्य को हासिल कर लिया है। महालेखा नियंत्रक द्वारा जारी अस्थायी आंकड़ों के अनुसार सरकार का वित्तीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 4.4 प्रतिशत पर रहा है, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में बेहतर स्थिति को दिखाता है।
बता दें कि वित्तीय घाटा किसी भी सरकार की कुल आय और कुल खर्च के बीच का अंतर होता है, जिसमें उधारी को शामिल नहीं किया जाता। यह किसी देश की वित्तीय सेहत का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा सकल घरेलू उत्पाद के 4.8 प्रतिशत पर था। ऐसे में 4.4 प्रतिशत तक की कमी को सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
मौजूद जानकारी के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्रीय बजट में वित्तीय घाटे का अनुमान 15 लाख 68 हजार 936 करोड़ रुपये रखा गया था। बाद में फरवरी में संसद में पेश संशोधित अनुमानों में इसे घटाकर 15 लाख 58 हजार 492 करोड़ रुपये कर दिया गया था। महालेखा नियंत्रक के ताजा आंकड़ों के अनुसार सरकार इस लक्ष्य को हासिल करने में सफल रही है।
आंकड़ों के मुताबिक केंद्र सरकार ने पूरे वित्त वर्ष के दौरान 33.42 लाख करोड़ रुपये का राजस्व संग्रह किया, जो संशोधित अनुमान का लगभग 98.8 प्रतिशत है। वहीं सरकार का कुल खर्च 49.64 लाख करोड़ रुपये रहा, जो संशोधित लक्ष्य के करीब 98.8 प्रतिशत के बराबर है। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार ने आय और व्यय दोनों के मोर्चे पर संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है।
गौरतलब है कि वित्तीय घाटे को कम करने का लक्ष्य ऐसे समय में हासिल किया गया है जब सरकार ने कर प्रणाली में कई सुधार किए हैं। व्यक्तिगत आयकर और वस्तु एवं सेवा कर से जुड़े बदलावों के बावजूद सरकार राजस्व संग्रह को स्थिर बनाए रखने में सफल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वित्तीय प्रबंधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
अर्थव्यवस्था विशेषज्ञ और एक प्रमुख परामर्श संस्था के मुख्य नीति सलाहकार डी. के. श्रीवास्तव ने कहा है कि सरकार की यह सफलता इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि वित्तीय घाटा केवल जीडीपी के अनुपात में ही नहीं बल्कि वास्तविक राशि के रूप में भी कम हुआ है। उनके अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में वित्तीय घाटा लगभग 15.8 लाख करोड़ रुपये था, जो 2025-26 में घटकर करीब 15.2 लाख करोड़ रुपये रह गया है।
हालांकि विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अगले वित्त वर्ष 2026-27 के लिए निर्धारित 4.3 प्रतिशत के लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं होगा। इसके लिए कर संग्रह में तेजी लानी होगी और पूंजीगत व्यय की गति को भी बढ़ाना होगा। साथ ही वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों पर भी सरकार की नजर बनी रहेगी क्योंकि इसका असर राजस्व और कर संग्रह दोनों पर पड़ सकता है।
कुल मिलाकर वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि सरकार वित्तीय अनुशासन बनाए रखने और विकास कार्यों के लिए संसाधनों का संतुलित उपयोग करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इससे निवेशकों का भरोसा मजबूत होगा और देश की आर्थिक स्थिरता को भी बल मिलेगा।
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सप्ताह के पहले कारोबारी दिन टाटा समूह से जुड़ी एक बड़ी खबर ने बाजार का ध्यान अपनी ओर खींचा। टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा द्वारा टाटा संस की संभावित सूचीबद्धता को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक के समक्ष चिंता जताने की खबर सामने आने के बाद समूह की कुछ प्रमुख कंपनियों के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई।
कारोबार के दौरान टाटा केमिकल्स के शेयरों में तीन प्रतिशत से अधिक की गिरावट देखने को मिली और यह 734 रुपये के आसपास बंद हुए। वहीं टाटा इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन के शेयर भी करीब तीन प्रतिशत टूटकर 671.75 रुपये के स्तर पर बंद हुए हैं। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि टाटा संस की भविष्य की संरचना को लेकर बढ़ती अनिश्चितता का असर निवेशकों की विचार पर पड़ा है।
मौजूद जानकारी के अनुसार एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि नोएल टाटा ने भारतीय रिजर्व बैंक को पत्र लिखकर टाटा संस की संभावित सूचीबद्धता को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। हालांकि इस रिपोर्ट की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। बताया जा रहा है कि टाटा ट्रस्ट्स का मानना है कि टाटा संस लंबे समय से समूह की विभिन्न कंपनियों और रणनीतिक क्षेत्रों में धैर्यपूर्ण तथा दीर्घकालिक निवेश करने वाली संस्था के रूप में काम करती रही है।
बता दें कि टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जिसके कारण समूह की दिशा और रणनीति तय करने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। रिपोर्ट के अनुसार नोएल टाटा का मानना है कि यदि टाटा संस सूचीबद्ध होती है तो कंपनी पर तिमाही नतीजों, शेयर बाजार की अपेक्षाओं और सार्वजनिक निवेशकों के दबाव का प्रभाव बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में अल्पकालिक लाभ कमाने की सोच हावी हो सकती है, जो टाटा ट्रस्ट्स के सामाजिक और परोपकारी उद्देश्यों के अनुरूप नहीं होगी।
गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से टाटा ट्रस्ट्स के भीतर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं। एक पक्ष का मानना है कि बदलते नियामकीय माहौल और शेयरधारकों के हितों को देखते हुए सूचीबद्धता भविष्य में अपरिहार्य हो सकती है। वहीं दूसरा पक्ष अब भी टाटा संस को एक निजी और गैर-सूचीबद्ध इकाई के रूप में बनाए रखने के पक्ष में है।
इस पूरे घटनाक्रम में शापूरजी पालोनजी समूह की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। शापूरजी पालोनजी समूह लंबे समय से टाटा संस की सूचीबद्धता की मांग करता रहा है। समूह का तर्क है कि सूचीबद्धता से पारदर्शिता बढ़ेगी और सभी शेयरधारकों के लिए मूल्य सृजन का अवसर मिलेगा।
रिपोर्टों के मुताबिक हाल ही में हुई एक बैठक के बाद नोएल टाटा ने टाटा संस के निदेशक मंडल के समक्ष भी कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। इनमें अगले पांच वर्षों की रणनीतिक योजना, शापूरजी पालोनजी समूह को निकास का विकल्प देने की रूपरेखा और टाटा संस की संभावित सूचीबद्धता पर समूह की स्पष्ट स्थिति जैसे मुद्दे शामिल बताए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि टाटा संस की सूचीबद्धता का विषय केवल एक कारोबारी निर्णय नहीं है, बल्कि यह टाटा समूह की भविष्य की संरचना, नियंत्रण व्यवस्था और सामाजिक विरासत से भी जुड़ा हुआ मामला है। ऐसे में आने वाले समय में इस मुद्दे पर होने वाले फैसलों पर उद्योग जगत और निवेशकों की नजर बनी रहने की संभावना है।
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