गर्मी में त्वचा की समस्याएं हो सकती हैं खतरनाक, समय रहते पहचानें लक्षण, ऐसे करें बचाव
नई दिल्ली, 1 जून (आईएएनएस)। देश के कई हिस्सों में इस समय भीषण गर्मी का असर देखने को मिल रहा है। लगातार बढ़ते तापमान और गर्म हवाओं के कारण लोगों को कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। चिलचिलाती धूप के साथ उमस भरी हवा लोगों को परेशान कर रही है। ऐसे मौसम में त्वचा संबंधी समस्याएं बहुत आम हो जाती हैं। हेल्थ एक्सपर्ट आगाह करते हैं कि गर्मी में त्वचा की समस्याओं को नजरअंदाज न करें।
नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) के अनुसार, ज्यादा गर्मी और पसीने के कारण त्वचा पर छोटी-छोटी परेशानियां शुरू हो जाती हैं, जिस पर अगर समय पर ध्यान न दिया जाए तो यह बड़ी समस्या बन सकती है। गर्मी के मौसम में पसीना ज्यादा आता है। जब पसीना त्वचा की सिलवटों या बंद रोमछिद्रों में फंस जाता है तो त्वचा में सूजन और जलन पैदा हो जाती है। इसे आम भाषा में घमौरियां या प्रिकली हीट कहा जाता है। यह समस्या खासकर बच्चों, मोटापे से ग्रस्त लोगों और ज्यादा पसीना आने वाले व्यक्तियों को होती है।
घमौरियों के मुख्य लक्षणों पर नजर डालें तो त्वचा पर छोटे-छोटे लाल दाने या फुंसियां निकलना, तेज खुजली और चुभन जैसा महसूस होना, गर्दन, छाती, कमर, कांख और त्वचा की सिलवटों वाले हिस्सों में ज्यादा समस्याएं और कभी-कभी हल्का बुखार या जलन भी हो सकती है।
एनएचएम ने गर्मी में त्वचा की देखभाल के लिए कुछ आसान उपाय बताए हैं। सबसे जरूरी है ठंडी और कम नमी वाली जगह पर रहना, जहां पंखा या कूलर चल रहा हो, वहां ज्यादा समय बिताएं। प्रभावित त्वचा को हमेशा साफ और सूखा रखें। नहाने के बाद शरीर को अच्छी तरह पोंछ लें। आराम के लिए सादा टैल्कम पाउडर का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन इसमें कोई तेज खुशबू या केमिकल न हो। प्रभावित जगह पर कोई क्रीम या मलहम खुद से न लगाएं, क्योंकि इससे समस्या बढ़ सकती है। इसके साथ ही ढीले और सूती कपड़े पहनें जो हवा आने-जाने दें। बाहर निकलते समय छाता या स्कार्फ का इस्तेमाल करें।
एक्सपर्ट्स कुछ सावधानियां बरतने की सलाह देते हैं। जैसे ज्यादा देर धूप में न रहें, दिन में कम से कम 8-10 गिलास पानी पिएं। ज्यादा तेल-मसाला वाले या भारी भोजन से बचें और बच्चों की त्वचा पर खास नजर रखें।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि गर्मी का यह मौसम त्वचा के लिए चुनौती भरा है, लेकिन थोड़ी सी सावधानी और सही देखभाल से इन समस्याओं से बचा जा सकता है। शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करें। अगर दाने बढ़ जाएं, तेज बुखार आए या संक्रमण के लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
--आईएएनएस
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Explainer: क्या है भारत-नेपाल सीमा विवाद? 1816 की संधि आज भी बन रही बाधा, बालेन शाह के बयान से फिर आया शुरू हुई चर्चा
India-Nepal Border Dispute: भारत के पड़ोसी देश नेपाल के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री बालेन शाह ने सीमा को लेकर एक बयान दिया। इस बयान के बाद से नेपाल और भारत सीमा विवाद फिर चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि यह कोई नया विवाद नहीं है। यह विवाद साल 1816 से चला आ रहा है। उस समय नेपाल सुगौली की संधि में भारत और नेपाल की सीमा का निर्धारण किया गया था। आइए जानते हैं पूरा विवाद।
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने विवादित बयान दावा करते हुए कहा है कि केवल भारत ने ही नेपाली क्षेत्रों पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी भारतीय क्षेत्रों पर अतिक्रमण किया है। बस इस बयान के बाद भारत-नेपाल सीमा का विवाद शुरू हो गया।
गत रविवार को नेपाली संसद में बोलते हुए बालेन शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें पता चला कि केवल भारत ने ही नेपाल की जमीन पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की जमीन पर अतिक्रमण किया है। उनके इस बयान के बाद भारत-नेपाल सीमा विवाद पर फिर से बहस शुरू हो गई है।
दरअसल, पूरा विवाद भारत और नेपाल के बीच मुख्य सीमा विवाद उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा (372 वर्ग किमी क्षेत्र) को लेकर है। इसके अलावा बिहार के चंपारण के पास सुस्ता क्षेत्र भी विवाद का एक प्रमुख केंद्र है।
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लिम्पियाधुरा विवाद
नेपाल सुगौली की संधि (1816) को आधार मानता है, जिसके अनुसार महाकाली (काली) नदी को दोनों देशों के बीच की सीमा माना गया है। नेपाल का तर्क है कि इस नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से होता है, इसलिए ये तीनों क्षेत्र नेपाल का हिस्सा हैं। वहीं भारत भारत इन क्षेत्रों को अपना अभिन्न अंग मानता है। भारत के अनुसार, महाकाली नदी का उद्गम कालापानी के पास के झरनों से होता है, और ऐतिहासिक रूप से 1830 के दशक से ही इन क्षेत्रों पर भारत का प्रशासनिक नियंत्रण रहा है।
विवाद की शुरुआत
तनाव तब बढ़ा जब 2020 में भारत ने मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख दर्रे तक एक नई सड़क का उद्घाटन किया। इसके जवाब में, नेपाल ने नया राजनीतिक मानचित्र जारी कर इन क्षेत्रों को अपने हिस्से में दिखा दिया।
सुस्ता क्षेत्र का विवाद- सुस्ता क्षेत्र पश्चिम चंपारण (बिहार) और नेपाल के नवलपरासी जिले के पास स्थित है। यहां विवाद का कारण गंडक नदी (नारायणी नदी) का मार्ग बदलना है। नदी के मार्ग परिवर्तन से सुस्ता का भौगोलिक स्थान बदल गया, जिस पर नेपाल अपना ऐतिहासिक दावा करता है, जबकि वर्तमान में यह क्षेत्र भारतीय प्रशासन के नियंत्रण में है।
मुख्य कारण (महाकाली नदी)
यह विवाद महाकाली (काली) नदी के उद्गम स्थल को लेकर है। सुगौली की संधि (1816) के अनुसार, इस नदी को भारत और नेपाल के बीच की सीमा माना गया था। भारत का मानना है कि नदी का उद्गम कालापानी से होता है, जबकि नेपाल का दावा है कि मुख्य नदी लिम्पियाधुरा से निकलती है।
लिपुलेख दर्रा विवाद
भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख दर्रा विवाद मुख्य रूप से सीमांकन में अस्पष्टता और महाकाली (काली) नदी के उद्गम स्थल की अलग-अलग व्याख्या से जुड़ा हुआ है। यह क्षेत्र भारत, नेपाल और चीन के त्रि-जंक्शन पर रणनीतिक रूप से स्थित है। इस विवाद के मुख्य कारण हैं। इसमें लिपुलेख दर्रा, कालापानी और लिम्पियाधुरा, ये तीनों क्षेत्र विवाद के केंद्र में हैं। नेपाल इस मुद्दे को सुलझाने के लिए औपचारिक कूटनीतिक वार्ता की मांग करता है। भारत सरकार का रुख स्पष्ट है कि लिपुलेख दर्रा भारत का अभिन्न अंग है और नेपाल द्वारा किए जा रहे एकतरफा दावों को भारत ने खारिज कर दिया है।
2020 में नक्शा अब 100 नेपाली नोट का विवाद
वर्ष 2020 में नेपाल ने एक नया राजनीतिक नक्शा जारी कर इन विवादित क्षेत्रों (लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी) को अपने क्षेत्र में शामिल दिखाया था। 2020 में भारत ने मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख दर्रे तक एक नई सड़क का उद्घाटन किया था। इसके बाद नेपाल ने यह कदम उठाया था। नक्शे में भारत के तीन रणनीतिक क्षेत्रों- लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल के हिस्से के रूप में दिखाया गया था।
इस नक्शे को नेपाली संसद ने संवैधानिक संशोधन के जरिए मंजूरी दी थी। हालांकि अभी की बात करें तो दोनों देशों के बीच कूटनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। हाल ही में नेपाल द्वारा जारी किए गए 100 रुपये के नए नोटों पर इसी विवादित नक्शे को छापे जाने को लेकर भी दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति देखी गई थी।
द्विपक्षीय वार्ता ही समाधान?
सीमा विवाद पर भारत और नेपाल दोनों देश मानते हैं कि सभी लंबित सीमा मुद्दों का समाधान ऐतिहासिक दस्तावेजों, तथ्यों और रचनात्मक संवाद के माध्यम से किया जाना चाहिए। भारत का आधिकारिक रुख लगातार यह रहा है कि वह नेपाल के साथ सभी मुद्दों पर रचनात्मक बातचीत के लिए प्रतिबद्ध है। कूटनीतिक नोटों और बैठकों के माध्यम से दोनों पक्षों के बीच राजनयिक संवाद जारी रहता है। भारत का रुख स्पष्ट है कि इन जटिल मुद्दों को बातचीत और राजनयिक माध्यमों से सुलझाया जाना चाहिए।
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