चीन और उसके झगड़े कभी खत्म नहीं होंगे और यही वजह है कि दक्षिण चीन सागर में लगातार तनाव का नया मोर्चा खुलता चला जा रहा है। चीन और पश्चिमी देशों के बीच समुद्री अधिकारों को लेकर लंबे समय से विवाद है और इस बीच चीन ने आरोप लगाया है कि नीदरलैंड की डच नेवी का युद्धपोत डी रुएटर उसकी समुद्री सीमा में घुस गया और वहां हेलीकॉप्टर ऑपरेशन भी किया। इसके बाद चीनी सेना ने उसे रोकने और वहां से हटाने के लिए कारवाई की। इस बीच हंगामा काफी ज्यादा बढ़ गया। दावा किया जा रहा है कि डच नेवी का युद्धपोत, डच नेवी का हेलीकॉप्टर दक्षिण चीन सागर में ऑपरेशन कर रहा है और इससे चीन को आपत्ति है। चीन की पीपल लिबरेशन आर्मी ने आरोप लगाया है कि नीदरलैंड की नौसेना का यह युद्धपोत डी रूटर चीन के शीशाद्वीप समूह के पास उसकी समुद्री सीमा में अवैध रूप से घुसा। इस घटना के बाद चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए डच जहाज को चेतावनी दी और उसे वहां से हटाने के लिए सैन्य कारवाई की।
चीनी सेना के दक्षिणी थिएटर कमांड के प्रवक्ता झाई शीचेंग ने कहा है कि डच युद्धपोत ने ना केवल चीन के दावे वाले समुद्री क्षेत्र में प्रवेश किया बल्कि वहां हेलीकॉप्टर उड़ाकर चीन के हवाई क्षेत्र का भी उल्लंघन कर दिया। इसके जवाब में चीनी नौसेना और वायुसेना ने संयुक्त कारवाई की। उस जहाज को ट्रैक किया और उसे क्षेत्र छोड़ने को मजबूर किया। चीन का कहना है कि यह उसकी संप्रभुता और सुरक्षा के खिलाफ सीधी चुनौती है। वहीं पश्चिमी देशों का मानना है कि दक्षिण चीन सागर अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र है और वहां सभी देशों को आवाजाही की स्वतंत्रता प्राप्त है। दक्षिण चीन सागर इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बेहद अहम समुद्री मार्गों में से एक है। यहां से हर साल खरबों डॉलर का व्यापार गुजरता है। इसके अलावा यह क्षेत्र तेल, गैस और समुद्री संसाधनों से भी समृद्ध है। चीन इस क्षेत्र के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है। जबकि फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया और ब्रूनेई जैसे देश भी अपने अधिकार जताते रहे हैं।
अमेरिका और यूरोपीय देश अक्सर फ्रीडम ऑफ नेविगेशन यानी कि समुद्री स्वतंत्रता के नाम पर यहां अपने युद्धपोत भेजते रहे हैं जिससे चीन उकसावे की कारवाई मानता है। सूत्र के मुताबिक समुद्र में स्थिति काफी तनावपूर्ण थी जब इस तरह के हालात बन गए थे। चीनी नौसेना के जहाज और लड़ाकू विमान लगातार डच फ्रिगेट की निगरानी कर रहे थे। रेडियो संदेश के जरिए चेतावनी दी जा रही थी और दोनों पक्षों के बीच सैन्य सतर्कता बढ़ गई थी। ऐसे हालात में एक अगर छोटी सी भी कोई चूक होती तो फिर हालात और भी ज्यादा बिगड़ सकते थे। इस घटना ने एक बार फिर से यह सवाल खड़ा किया है कि क्या दक्षिण चीन सागर आने वाले समय में वैश्विक संघर्ष का एक बड़ा केंद्र बनेगा क्योंकि जिस तरह से चीन दक्षिण चीन सागर में गुंडागर्दी करने पर उतारू है उससे पता चलता है चीन के इरादे अच्छे नहीं है।
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28 मई 2026 येरेवान की पहाड़ियों से टकरा कर जब भारतीय हथियारों की गूंज निकली तो यह केवल एक सैन्य प्रदर्शन नहीं था। यह एक नए विश्व व्यवस्था यानी कि न्यू वर्ल्ड ऑर्डर का उदय था। दुनिया ने देखा कि कैसे एक देश जो साल 2020 के युद्ध में अपने अस्तित्व की अंतिम सांसे गिन रहा था आज भारत के अजय अस्त्रों के दम पर शेर की तरह दहाड़ रहा है। दरअसल आर्मेनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा था आसमान से बरसती मौत यानी तुर्की के टीबी2 ड्रोंस और टीबी2 ड्रोंस ने साल 2020 में अर्मेनिया में तबाही मचाई थी। लेकिन भारत ने उन्हें दिया आकाश वन1। यह सिस्टम सिर्फ एक मिसाइल नहीं यह सुपर कंप्यूटर ऑन व्हील्स है। यह एक साथ 10 लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है और 30 कि.मी. की रेंज में आने वाले किसी भी दुश्मन को राख बना सकता है। जब परेड में यह मिसाइलें गुजरी तो अज़रबजान के पायलटो के बीच खौफ का मैसेज चला गया। अब अर्मेनिया का आसमान नो फ्लाइंग ज़ोन बन चुका है। परेड की सबसे बड़ी दहशत का नाम था पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर यानी कि एमबीआरएल। यह वो हथियार है जिसने कारगिल की चोटियों पर पाकिस्तानियों के परखच्चे उड़ा दिए थे। अर्मेनिया को दिया गया गाइडेड पिनाका 75 से 90 कि.मी. तक मार कर सकता है, वार कर सकता है। इसकी एक ही बैटरी महज 44 सेकंड में 12 रॉकेट दाग कर पूरे के पूरे दुश्मन सैन्य एयर बेस को या यूं कह लें बेस को नक्शे से मिटा सकती है।
अजरबैजान की लंबी दूरी की आर्टिलरी का अब भारत ने ऐसा जवाब दिया जिसका कोई तोड़ है ही नहीं। अर्मेनिया का भूगोल पहाड़ों से भरा है। वहां भारी रूसी टैंक अक्सर रणनीतिक भूल साबित होते हैं। भारत ने उन्हें दिया एम एआरजी 155 बीआर। यह दुनिया की पहली ऐसी 155 एमएम की तोप है जो 4 * 4 ट्रक पर तैनात होता है। इसे सूट एंड स्कूट तकनीक के लिए बनाया गया है। यानी गोला दागो और दुश्मन की जवाबी कारवाई से पहले ही गायब हो जाओ। साथ ही 80 एजीएस तोपे जिनकी रेंज 48 कि.मी. तक है। अब अर्मेनिया की रक्षा पंक्ति की यह रीड बन चुकी है। हथियार तब तक बेकार है जब तक आपके पास उसकी सटीक जानकारी ना हो। भारत का स्वाति वेपन लोकेटिंग रडार दुश्मन की तोप के गोले के हवा में होते ही उसकी जन्म कुंडली निकाल लेता है। यह महज 2 से 3 सेकंड में बता देता है कि गोला कहां से दागा गया है ताकि भारतीय तोपे तुरंत जवाबी हमला कर सके। अर्मेनिया के लिए यह रडार एक गेम चेंजर साबित हुआ है जिसने उसकी रक्षा को अभेद्य बना दिया है। तुर्की और पाकिस्तान ने मिलकर एक एक्सिस बनाने की कोशिश की थी जिसका मुख्य एजेंडा था भारत को घेरना और कॉकिशस में अपना दबदबा बनाना। लेकिन भारत ने अर्मेनिया के जरिए उनके सामने ही अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी।
अब जब पाकिस्तानी जनरल तुर्की के ड्रोनों की तारीफ करते थकते नहीं है, तो उन्हें अर्मेनिया में तैनात भारतीय तकनीक की याद जरूर आती होगी। अब यह भारत की स्मार्ट पावर है। दुश्मन को उसके घर में ही ढेर कर लेना। देखा जाए तो आज से 12 साल पहले भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार खरीददाता था। हम अपनी सुरक्षा के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाते थे। लेकिन साल 2014 के बाद नीतियां बदली। साल 2013 से 14 निर्यात मात्र 686 करोड़ था। साल 2025-26 में निर्यात 38,424 करोड़ यानी कि 4.1 बिलियन डॉलर है। यह 34 गुना की बढ़ोतरी कोई इत्तेफाक नहीं है। यह मेक इन इंडिया की उस जिद का नतीजा है जिसने भारत को आज 100 से ज्यादा देशों का रक्षा साझेदार बना दिया है। यानी भारत के हथियार 100 देशों में पहुंच चुके हैं। अब इन हथियारों के पीछे डीआरडीओ के उन हजारों वैज्ञानिकों की मेहनत है जिन्होंने दशकों तक प्रतिबंधों और सीमित संसाधनों के बावजूद हार नहीं मानी। एपीजे अब्दुल कलाम साहब का वह सपना आज सच हो रहा है जहां भारत अपनी रक्षा के लिए आत्मनिर्भर है। आज जब अर्मेनिया का सैनिक भारतीय गन चलाता है तो वह हमारे वैज्ञानिकों के गौरव को पूरी दुनिया में फैलाता है। अर्मेनिया तो सिर्फ एक मोर्चा है।
दक्षिण चीन सागर में भारत की ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल ने चीन के ड्रैगन की नींद उड़ा दी है। फिलीपींस को दी गई इस मिसाइल ने साबित कर दिखाया है कि भारत अब छोटे देशों का सबसे बड़ा और विश्वसनीय सुरक्षा कवच बन चुका है। इतना ही नहीं वियतनाम और इंडोनेशिया भी अब भारत की ओर उम्मीद से देख रहे हैं और खबरें दोस्तों यह आ रही है कि अर्मेनिया अब भारत से प्रलय बैलास्टिक मिसाइल और ब्रह्मोस लेने पर विचार कर रहा है। और अगर दोस्तों ऐसा हो गया तो यह पूरा क्षेत्र भारत की शक्ति के प्रभाव में आ जाएगा। अजरान और उसके समर्थकों के लिए यह एक चेकमेड जैसा होगा जिसका उसके पास कोई तोड़ नहीं होगा। अब सवाल है कि दुनिया भारत की ओर क्यों भाग रही है? क्योंकि भारतीय हथियार पश्चिमी हथियारों के मुकाबले काफी सस्ते हैं। लेकिन उनकी मारक क्षमता रूसी हथियारों से भी घातक है और इसका प्रमाण है अर्मेनिया के यह हथियार। भारत रगड तकनीक देता है जो रेगिस्तान की गर्मी और पहाड़ों की ठंड दोनों में काम करती है और यही भारतीय जादू है जो रक्षा बाजार में हलचल मचाए जा रहा है।
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