नाश्ते की टेबल पर रचा गया लव सॉन्ग, 5 मिनट में लिखा, 24 घंटे में शूटिंग, निकला ब्लॉकबस्टर, सुपरहिट हुई फिल्म
कुछ गाने वक्त के साथ पुराने नहीं होते, बल्कि यादों के साथ और खास बन जाते हैं. 1991 में आई एक सुपरहिट रोमांटिक फिल्म का ऐसा ही गाना आज भी आशिकों के बीच बेहद लोकप्रिय है. दिलचस्प बात है कि यह गाना फिल्म का हिस्सा पहले था ही नहीं. रिलीज से ठीक पहले इसका ख्याल आया और महज 5 मिनट में बोल तैयार हो गए. फिल्म पूरी होने के बाद सलमान खान और माधुरी दीक्षित ने अगले ही दिन इसकी शूटिंग पूरी कर ली. फिल्म के साथ इसका संगीत भी ब्लॉकबस्टर साबित हुआ.
पब्लिक स्कूल की प्री-के बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अहम, 20 साल के अध्ययन में खुलासा
नई दिल्ली, 13 अगस्त (आईएएनएस)। अमेरिका में हुई एक लंबी और बड़े स्तर की रिसर्च ने बच्चों की शुरुआती पढ़ाई को लेकर एक अहम बात सामने रखी है। रिसर्च के मुताबिक, जो बच्चे पब्लिक स्कूल की प्री-के यानी प्री-स्कूल शिक्षा लेते हैं, वे आगे चलकर पढ़ाई में उन बच्चों से बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं, जिन्होंने शुरुआती सालों में फैमिली-बेस्ड चाइल्डकेयर में पढ़ाई की। इस रिसर्च में करीब 4 लाख बच्चों के शैक्षणिक सफर को तीसरी कक्षा से लेकर हाई स्कूल तक देखा गया और करीब 20 साल तक उनके प्रदर्शन पर नजर रखी गई।
यह अध्ययन जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी के नेतृत्व में किया गया और फ्लोरिडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी (एफआईयू) के एसोसिएट प्रोफेसर चार्ल्स ब्लाइकर भी इस रिसर्च टीम का अहम हिस्सा रहे। शोधकर्ताओं ने मियामी-डेड काउंटी के पब्लिक स्कूल के करीब 4 लाख छात्रों के रिकॉर्ड का विश्लेषण किया।
रिसर्च में बच्चों की शुरुआती शिक्षा के तीन तरह के विकल्पों की तुलना की गई। इनमें पब्लिक स्कूल प्री-के, सेंटर-बेस्ड डेकेयर और अर्ली लर्निंग कोएलिशन से जुड़े होम-बेस्ड चाइल्डकेयर शामिल थे। इन सभी केंद्रों को न्यूनतम जरूरी मानकों को पूरा करना था, लेकिन शिक्षकों की योग्यता में बड़ा अंतर सामने आया।
पब्लिक स्कूल प्री-के कार्यक्रमों की एक खास बात यह थी कि वहां शिक्षकों के लिए कॉलेज की डिग्री होना जरूरी था। शोधकर्ताओं के मुताबिक, प्रशिक्षित और ज्यादा शिक्षित शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ उनके व्यवहार और विकास को समझने में भी बेहतर तरीके से मदद कर सकते हैं। रिसर्च में यह भी सामने आया कि पब्लिक स्कूल प्री-के में पढ़ने वाले बच्चों ने आगे चलकर स्टैंडर्डाइज्ड टेस्ट में बेहतर प्रदर्शन किया और उन्हें हाई स्कूल तक अपेक्षाकृत बेहतर ग्रेड मिले।
एफआईयू के चार्ल्स ब्लाइकर के मुताबिक, इस रिसर्च से यह सवाल भी कमजोर पड़ता है कि छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षकों की ज्यादा ट्रेनिंग की जरूरत नहीं होती। उनके अनुसार, शुरुआती उम्र में बच्चों के साथ काम करना केवल उनकी देखभाल करना नहीं है, बल्कि इस दौरान उन्हें सही तरीके से सीखने, सोचने, बातचीत करने और व्यवहार विकसित करने के मौके देना भी जरूरी है।
शुरुआती स्कूल अनुभव का एक और फायदा बच्चों के सामाजिक और भावनात्मक विकास से जुड़ा बताया गया। अगर बच्चा छोटी उम्र से ही स्कूल के माहौल, क्लासरूम की दिनचर्या और दूसरे बच्चों के साथ रहने का आदी हो जाता है, तो उसके लिए आगे चलकर किंडरगार्टन और प्राथमिक स्कूल में ढलना आसान हो सकता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि प्रशिक्षित शिक्षक बच्चों की उम्र और विकास के स्तर को समझकर पढ़ाने के तरीके अपना सकते हैं। वहीं, बिना पर्याप्त प्रशिक्षण वाले शिक्षकों के लिए बच्चों के व्यवहार और सीखने की जरूरतों को संभालना ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है। शुरुआती वर्षों में बच्चे को केवल स्क्रीन के सामने बैठाने या बिना किसी रचनात्मक गतिविधि के समय गुजारने के बजाय उसे बातचीत, खेल, कहानी, संख्या और भाषा से जुड़ी गतिविधियों में शामिल करना ज्यादा उपयोगी हो सकता है।
इस अध्ययन की एक खास बात यह भी है कि इसमें बड़ी संख्या में हिस्पैनिक बच्चे शामिल थे। मियामी की आबादी में हिस्पैनिक समुदाय की बड़ी हिस्सेदारी है, इसलिए शोधकर्ताओं को शुरुआती शिक्षा के प्रभाव को एक विविध आबादी में देखने का मौका मिला।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर बच्चे के लिए केवल पब्लिक स्कूल प्री-के ही सही विकल्प है। रिसर्च से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि माता-पिता को बच्चे के लिए ऐसा माहौल चुनना चाहिए जहां उसे सुरक्षित, स्थिर और सीखने के पर्याप्त अवसर मिलें।
माता-पिता को किसी भी प्री-स्कूल या डेकेयर का चुनाव करने से पहले कुछ बातों पर ध्यान देना चाहिए। सबसे पहले यह देखें कि वहां शिक्षक कितने समय तक टिकते हैं। बार-बार शिक्षक बदलने से छोटे बच्चों के लिए परेशानी हो सकती है, क्योंकि वे अपने देखभाल करने वालों से भावनात्मक जुड़ाव बना लेते हैं। इसके अलावा, स्थानीय अर्ली लर्निंग कोएलिशन से सेंटर की गुणवत्ता और उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी ली जा सकती है।
माता-पिता को बच्चे का दाखिला कराने से पहले सेंटर जाकर वहां का माहौल देखना चाहिए और शिक्षकों से बातचीत करनी चाहिए। दूसरे अभिभावकों से भी पूछना उपयोगी हो सकता है कि उनका अनुभव कैसा रहा है। सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चे के व्यवहार पर नजर रखें। अगर बच्चा लगातार किसी जगह पर असहज या परेशान दिखाई देता है, तो माता-पिता को दूसरे विकल्प पर विचार करने से भी नहीं हिचकना चाहिए।
--आईएएनएस
पीआईएम/पीएम
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