Gurudwara Langar Tradition: गुरु नानक देव जी को मिले थे पैसे, फिर क्यों नहीं किया व्यापार? ऐसे शुरू हुई लंगर की परंपरा
गुरुद्वारे का लंगर सिख परंपरा की उन व्यवस्थाओं में शामिल है, जहां सेवा और समानता एक साथ दिखाई देती है। यहां भोजन करने वाले लोगों से उनकी जाति, धर्म, आर्थिक स्थिति या सामाजिक पहचान नहीं पूछी जाती। सभी लोग पंगत में एक साथ बैठते हैं और एक जैसा भोजन ग्रहण करते हैं।
इस व्यवस्था का मकसद सिर्फ जरूरतमंदों को भोजन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि यह संदेश देना भी है कि इंसान की पहचान उसकी हैसियत से नहीं होती। पंगत में हर व्यक्ति बराबर होता है।
गुरु नानक देव जी और ‘सच्चा सौदा’ की साखी
लंगर की परंपरा से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथाओं में ‘सच्चा सौदा’ की साखी का उल्लेख मिलता है। सिख परंपरा के अनुसार, गुरु नानक देव जी के पिता मेहता कालू ने उन्हें व्यापार के लिए कुछ धन दिया था। उनसे उम्मीद थी कि वे उस धन से कोई अच्छा सौदा करके लौटेंगे।
बताया जाता है कि रास्ते में गुरु नानक देव जी की मुलाकात भूखे साधुओं और जरूरतमंद लोगों से हुई। उनकी स्थिति देखकर उन्होंने व्यापार करने के बजाय उस धन से भोजन खरीदा और भूखे लोगों को खिला दिया।
इसी घटना को ‘सच्चा सौदा’ कहा जाता है। इसका भाव यह था कि किसी जरूरतमंद की मदद करना और उसे भोजन कराना ही सबसे सच्चा और सार्थक सौदा है।
‘वंड छको’ से जुड़ी है लंगर की भावना
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं में ‘नाम जपो, कीरत करो और वंड छको’ को विशेष महत्व दिया जाता है।
नाम जपो — ईश्वर का स्मरण करना।
कीरत करो — ईमानदारी से मेहनत करके आजीविका कमाना।
वंड छको — अपनी कमाई और भोजन को दूसरों के साथ बांटकर खाना।
लंगर में इसी ‘वंड छको’ की भावना दिखाई देती है। लोग अपनी क्षमता के अनुसार भोजन, सामान, धन या समय देकर योगदान करते हैं और फिर सभी के साथ भोजन करते हैं।
पंगत में बैठने के पीछे क्या संदेश है?
लंगर में जमीन पर एक साथ बैठकर भोजन करना अपने आप में समानता का संदेश माना जाता है। सामाजिक भेदभाव और ऊंच-नीच की सोच के बीच पंगत की व्यवस्था ने यह विचार सामने रखा कि भोजन के समय सभी लोग बराबर हैं।
यहां कोई व्यक्ति अपने पद, पैसे या सामाजिक स्थिति के कारण अलग जगह नहीं बैठता। भोजन परोसने वाला और भोजन करने वाला दोनों इस सामूहिक व्यवस्था का हिस्सा होते हैं।
लंगर में सेवा क्यों महत्वपूर्ण है?
लंगर की व्यवस्था में सेवा का भी विशेष स्थान है। भोजन तैयार करने, सब्जियां काटने, रोटियां बनाने, खाना परोसने से लेकर बर्तन साफ करने तक श्रद्धालु अपनी इच्छा से योगदान देते हैं।
किसी के लिए सेवा का मतलब रसोई में काम करना हो सकता है, तो कोई सफाई या बर्तन धोने में योगदान देता है। यही सेवाभाव लंगर को सिर्फ सामूहिक भोजन से आगे ले जाकर सामाजिक एकता की मिसाल बनाता है।
लंगर सिर्फ सिख समुदाय तक सीमित नहीं
गुरुद्वारे के लंगर की खासियत यह भी है कि इसे किसी एक वर्ग या समुदाय तक सीमित नहीं माना जाता। अलग-अलग धर्म और पृष्ठभूमि के लोग गुरुद्वारे में आकर लंगर ग्रहण कर सकते हैं।
आज भारत ही नहीं, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद गुरुद्वारों में भी लंगर की परंपरा जारी है। यही वजह है कि इसे सेवा, समानता और मानवता के साझा संदेश के रूप में देखा जाता है।
'डिजिटल दौर में रॉ आवाज लगती है अजीब', सोनू निगम ने किया स्वीकार, रिकॉर्डिंग में ऑटो-ट्यून का करते हैं इस्तेमाल
फेमस प्लेबैक सिंगर सोनू निगम ने म्यूजिक इंडस्ट्री में ऑटो-ट्यून के इस्तेमाल पर खुलकर अपनी राय रखी है. उन्होंने स्वीकार किया कि आज के डिजिटल दौर में वह भी गानों में जरूरत के मुताबिक इसका इस्तेमाल करते हैं. सोनू के अनुसार, आजकल सब कुछ डिजिटलाइज्ड है, इसलिए बिना ट्रीटमेंट के रॉ-आवाज गानों के साथ थोड़ी अजीब लगती है. उन्होंने स्पष्ट किया कि एक गायक अपनी 99 फीसदी परफेक्ट गायकी को 100 फीसदी तक ले जाने के लिए इसका सहारा ले सकता है.
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