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Prabhasakshi NewsRoom: Red Fort Car Blast पर UNSC रिपोर्ट ने किया बड़ा खुलासा, धमाके के तार Al Qaeda in the Indian Subcontinent से जोड़े

पाकिस्तान में पाले-पोसे जा रहे आतंकी नेटवर्क का बदलता और खतरनाक चेहरा अब पूरी दुनिया के सामने है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ताजा रिपोर्ट ने दिल्ली के लाल किले के पास नवंबर 2025 में हुए भीषण धमाके को अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) से जोड़कर इस खतरे की गंभीरता उजागर कर दी है। 10 नवंबर को हुए इस हमले में 11 लोगों की जान गयी थी और दो दर्जन से ज्यादा लोग घायल हुए थे। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट दर्शाती है कि पाकिस्तान से संचालित और पोषित आतंकी ढांचा अब सिर्फ पारंपरिक संगठनों तक सीमित नहीं रह कर छोटे-छोटे विकेंद्रीकृत सेल, वित्तीय और लॉजिस्टिक नेटवर्क के जरिए अपना स्वरूप बदल रहा है और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तबाही का नया तंत्र खड़ा कर रहा है।

UNSC की 10 अगस्त को प्रकाशित Analytical Support and Sanctions Monitoring Team की 38वीं रिपोर्ट साफ कहती है कि AQIS अब किसी बिखरे हुए आतंकी संगठन की तरह नहीं रह गया है, बल्कि एक क्षेत्रीय आतंकवादी इकाई के रूप में विकसित हो चुका है। रिपोर्ट के अनुसार संगठन ने अपने लॉजिस्टिक और वित्तीय नेटवर्क मजबूत किए हैं तथा बड़े आतंकी दस्तों की बजाय छोटे, विकेंद्रीकृत और अलग-अलग सेल के जरिए काम करने की रणनीति अपनाई है। इसी क्रम में रिपोर्ट ने नवंबर 2025 के दिल्ली लाल किला हमले को आधिकारिक रूप से AQIS से संबद्ध किया है।

देखा जाये तो यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले UNSC की 37वीं रिपोर्ट में एक सदस्य देश के हवाले से कहा गया था कि जैश-ए-मोहम्मद ने हमलों की एक श्रृंखला की जिम्मेदारी ली थी और उसे दिल्ली के लाल किला विस्फोट से भी जोड़ा गया था। यानी जांच और अंतरराष्ट्रीय आकलन के स्तर पर हमले की आतंकी पहचान को लेकर तस्वीर पहले अलग थी। ताजा रिपोर्ट ने अब AQIS को हमले का आधिकारिक जिम्मेदार ठहराकर उस तस्वीर को बदल दिया है।

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हम आपको याद दिला दें कि 10 नवंबर की शाम करीब सात बजे दिल्ली में लाल किले के नजदीक एक चलती Hyundai i20 अचानक आग के गोले में बदल गयी थी। जांच एजेंसियों ने उमर-उन-नबी की पहचान वाहन चालक के रूप में की और उसे संदिग्ध आत्मघाती हमलावर माना। विस्फोट में उसकी भी मौत हो गयी। घटना ने राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था को झकझोर दिया था और इसके पीछे मौजूद नेटवर्क की तह तक जाने के लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने व्यापक जांच शुरू की।

अब इस मामले की जांच अदालत की अगली अहम तारीख तक पहुंच चुकी है। NIA ने मामले में करीब 7500 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है, जिसमें 11 आरोपियों को संदिग्ध भूमिका में नामजद किया गया है। अभियोजन की शिकायत में 580 से अधिक गवाहों का हवाला दिया गया है। राउज एवेन्यू कोर्ट ने इस चार्जशीट पर संज्ञान लेने के लिए 27 अगस्त की तारीख तय की है। इससे साफ है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकी संगठन की पहचान और घरेलू जांच, दोनों मोर्चों पर मामला अब निर्णायक चरण में प्रवेश कर रहा है।

हम आपको बता दें कि AQIS कोई नया संगठन नहीं है। 2014 में गठित यह अल-कायदा का क्षेत्रीय सहयोगी संगठन है, जिसका उद्देश्य दक्षिण एशिया में अल-कायदा की गतिविधियों का विस्तार करना रहा है। इसका दायरा भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों तक फैला है। हम आपको यह भी बता दें कि UNSC ने खास तौर पर इस बात पर चिंता जतायी है कि संगठन बांग्लादेश को अपनी सेल स्थापित करने के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है। यह संकेत बताता है कि खतरा किसी एक शहर या देश तक सीमित नहीं, बल्कि सीमा-पार आतंकी नेटवर्क के रूप में विकसित हो रहा है।

साथ ही खतरा केवल पारंपरिक बम धमाकों तक सीमित नहीं है। UNSC की रिपोर्ट ने अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट (ISIL/Daesh) से जुड़े संगठनों की रासायनिक और जैविक हथियारों में बढ़ती दिलचस्पी पर भी गंभीर चिंता जतायी है। रिपोर्ट के अनुसार दोनों संगठन वर्षों से ऐसे हथियार विकसित करने में रुचि दिखाते रहे हैं, हालांकि तकनीकी चुनौतियों के कारण वह अब तक इन्हें बड़े पैमाने पर विकसित करने में सफल नहीं हुए हैं। लेकिन आतंकी समूहों में ऑनलाइन तरीके से ऐसे हथियार बनाने के निर्देश व्यापक रूप से प्रसारित किए जा रहे हैं।

साथ ही रिपोर्ट ने विशेष रूप से ISIL की अंग्रेजी पत्रिका Invade में फरवरी में प्रकाशित सामग्री का उल्लेख किया है, जिसमें बोटुलिनम टॉक्सिन और साइनाइड से संबंधित निर्देश शामिल थे। वहीं ISIL-K ने पिछले एक वर्ष में रिसिन विष तैयार करने के तरीकों में विशेष रुचि दिखाई और इससे संबंधित निर्देश प्रसारित किए।

बहरहाल, यह साफ दिख रहा है कि लाल किले के सामने कार बम धमाका सिर्फ एक आतंकी घटना नहीं था। संयुक्त राष्ट्र का नवीनतम आकलन इसे दक्षिण एशिया में बदलते आतंकी नेटवर्क, छोटे और विकेंद्रीकृत सेल, सीमा-पार वित्तीय-लॉजिस्टिक तंत्र और भविष्य के रासायनिक-जैविक खतरे से जोड़ रहा है। दिल्ली पर हुआ हमला भले एक कार से शुरू हुआ हो, लेकिन उसके पीछे का नेटवर्क अब अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के उस बदलते चेहरे की तस्वीर पेश कर रहा है, जिसे नजरअंदाज करना भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए भारी पड़ सकता है।

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कावेरी विवाद पर Karnataka बंद, कोप्पल में तमिल ड्राइवरों को गुलाब देकर किया अनोखा विरोध

कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच तनाव एक बार फिर सड़कों तक पहुंच गया है। कावेरी जल छोड़ने के मुद्दे पर गुरुवार को कर्नाटक में राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया गया। इस दौरान अलग-अलग इलाकों में प्रदर्शन हुए, लेकिन कोप्पल में विरोध का तरीका थोड़ा अलग रहा। यहां प्रदर्शनकारियों ने तमिलनाडु नंबर वाले ट्रकों को रोका, लेकिन ट्रक चालकों से बहस या झड़प करने के बजाय उन्हें गुलाब के फूल थमा दिए। प्रदर्शनकारियों ने फूल देते हुए ट्रक चालकों से कहा कि वे कावेरी पानी के मुद्दे पर कर्नाटक को 'उकसाने' की कोशिश न करें। इस पूरे घटनाक्रम का संदेश साफ था—विरोध जरूर है, लेकिन इसे टकराव में बदलने से बचने की कोशिश भी की जा रही है।

ट्रक रोके, ड्राइवरों को गुलाब दिए

कोप्पल तालुक के हिटलनाल टोल गेट पर यह प्रदर्शन हुआ। यह इलाका राष्ट्रीय राजमार्ग पर पड़ता है और बंद के दौरान यहां कर्नाटक के अलग-अलग संगठनों से जुड़े कार्यकर्ता जुटे थे। केरावे युवा सेना के नेता विजयकुमार के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने तमिलनाडु नंबर वाले ट्रकों को रोका। आमतौर पर ऐसे विवादों के बीच वाहनों को रोकना तनाव का कारण बन सकता है, लेकिन यहां प्रदर्शनकारियों ने अलग तरीका अपनाया। उन्होंने ट्रक चालकों को गुलाब दिए और उनसे शांति बनाए रखने की अपील की।

विजयकुमार ने चालकों से कहा कि कर्नाटक के लोग शांतिप्रिय हैं और उन्हें किसी तरह से भड़काने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। प्रदर्शनकारियों ने इस दौरान तमिलनाडु सरकार के खिलाफ नारे भी लगाए। उनका एक नारा खास तौर पर चर्चा में रहा—'फूल ले लो, पानी मत मांगो।' हालांकि प्रदर्शन कुछ देर बाद तब बदल गया जब पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस ने प्रदर्शन के आयोजकों को हिरासत में ले लिया और उन्हें अपने साथ ले गई।

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12 हजार क्यूसेक पानी छोड़ने के निर्देश का विरोध

कर्नाटक में बंद का मुख्य कारण कावेरी जल विनियमन समिति यानी सीडब्ल्यूआरसी के उस निर्देश का विरोध है, जिसमें कर्नाटक को 15 दिनों तक तमिलनाडु के लिए 12 हजार क्यूसेक पानी छोड़ने को कहा गया है। कर्नाटक के प्रदर्शनकारी संगठनों का कहना है कि राज्य खुद पानी की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने का फैसला कर्नाटक के किसानों और आम लोगों की जरूरतों को प्रभावित कर सकता है। इसी मुद्दे को लेकर कर्नाटक ओक्कुटा ने 13 अगस्त को राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया। कोप्पल जिला इकाई की ओर से जारी पत्र के अनुसार, बंद का नेतृत्व संगठन के प्रदेश अध्यक्ष वाटाल नागराज कर रहे थे। वहीं, कर्नाटक रक्षणा वेदिके युवा शाखा के प्रदेश अध्यक्ष बीजन्ना राजन्ना और सुवर्ण कर्नाटक युवा सेना के प्रदेश अध्यक्ष टीके नायक को प्रदर्शन के समन्वय की जिम्मेदारी दी गई थी।संगठनों ने सुबह 6 बजे से राज्य के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन करने की अपील की थी। टोल गेट, राष्ट्रीय राजमार्ग और दूसरे प्रमुख रास्तों को प्रदर्शन के लिए चुना गया था।

'कर्नाटक की अपनी पानी की जरूरतें भी हैं'

बंद बुलाने वाले संगठनों का तर्क है कि कावेरी के पानी पर फैसला लेते समय कर्नाटक की स्थिति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। खासकर उन इलाकों में जहां पीने के पानी और सिंचाई की जरूरत पहले से ही चुनौती बनी हुई है। यही वजह है कि कन्नड़ संगठनों ने राज्य सरकार पर दबाव बनाने के लिए बंद का रास्ता अपनाया। उनका कहना है कि किसानों और राज्य की जल जरूरतों को नजरअंदाज करके तमिलनाडु के लिए लगातार पानी छोड़ना उचित नहीं है।

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बेंगलुरु में सुरक्षा बढ़ाई गई, बसों की आवाजाही जारी

राज्यव्यापी बंद को देखते हुए बेंगलुरु समेत कई शहरों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई। पुलिस की कोशिश रही कि प्रदर्शन के दौरान किसी तरह की हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान न पहुंचे। इस बीच तमिलनाडु से कर्नाटक आने वाली सरकारी बसों की आवाजाही भी पूरी तरह थमी नहीं। मेकेदातु बांध के मुद्दे और कावेरी विवाद को लेकर कन्नड़ संगठनों के बंद के बावजूद तमिलनाडु की सरकारी बसें होसुर के रास्ते कर्नाटक में प्रवेश करती रहीं। इससे साफ है कि बंद और विरोध के बीच दोनों राज्यों के बीच सामान्य परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह रोकना आसान नहीं है।

आखिर क्यों बार-बार गरमाता है कावेरी का मुद्दा?

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कावेरी नदी कर्नाटक से निकलती है, तमिलनाडु से होकर गुजरती है और आखिर में बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। नदी के पानी पर दोनों राज्यों की निर्भरता काफी ज्यादा है। यही वजह है कि पानी के बंटवारे को लेकर दशकों से विवाद चला आ रहा है। इस विवाद को सुलझाने के लिए कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया गया था। बाद में कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण और उससे जुड़े तंत्र के जरिए दोनों राज्यों के बीच पानी के बंटवारे और जलाशयों की स्थिति के आधार पर निर्देश दिए जाने लगे। लेकिन समस्या तब फिर सामने आती है जब बारिश उम्मीद से कम होती है या कर्नाटक के जलाशयों में पानी का स्तर नीचे चला जाता है। ऐसी स्थिति में कर्नाटक अपनी जरूरतों को प्राथमिकता देने की मांग करता है, जबकि तमिलनाडु अपने हिस्से का पानी मिलने पर जोर देता है। यही खींचतान इस बार भी सड़क से लेकर राजनीति और अदालत तक पहुंचती दिखाई दे रही है। तमिलनाडु के सुप्रीम कोर्ट जाने के फैसले के बाद अब मामले का अगला रुख कानूनी प्रक्रिया और दोनों राज्यों के रवैये पर निर्भर करेगा। डीके शिवकुमार ने भी की थी संगठनों से बंद न करने की अपील

कावेरी विवाद पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पहले ही सर्वदलीय बैठक कर चुके हैं। बैठक में उन्होंने कहा था कि सरकार राज्य के किसानों और आम लोगों के हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। शिवकुमार के मुताबिक, कर्नाटक अभी भी कम बारिश जैसी स्थिति से जूझ रहा है। राज्य में अनुमानित बारिश की तुलना में करीब 30 से 35 फीसदी ही बारिश होने की बात उन्होंने कही थी। ऐसे में पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता स्वाभाविक है। उन्होंने किसानों से अपील की थी कि सरकार की ओर से दिशा-निर्देश जारी होने तक धैर्य बनाए रखें। मुख्यमंत्री ने यह भी बताया था कि सीडब्ल्यूआरसी और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से कर्नाटक को 3,500 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश दिया गया है। उन्होंने जलाशयों की स्थिति की जानकारी देते हुए कहा था कि कबिनी में करीब 24 हजार क्यूसेक और कृष्णा राजा सागर यानी केआरएस में करीब 22 हजार क्यूसेक पानी की आवक हो रही थी। उनके मुताबिक, बांध की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी पानी छोड़ा गया था।

शिवकुमार ने दावा किया था कि सर्वदलीय बैठक में सरकार के फैसले को सभी दलों का समर्थन मिला। भाजपा नेताओं के केआरएस बांध का दौरा करने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा था कि उन्होंने भी मौके की स्थिति को समझा। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा था कि वह कन्नड़ संगठनों से बातचीत करेंगे और उनसे बंद का आयोजन नहीं करने की अपील की थी। फिलहाल कावेरी का पानी एक बार फिर कर्नाटक और तमिलनाडु की राजनीति के बीच बड़ा मुद्दा बन गया है। कोप्पल में गुलाब देकर किया गया विरोध भले ही अपने तरीके में शांत दिखा हो, लेकिन उसके पीछे राज्य में पानी को लेकर बढ़ती बेचैनी और किसानों की चिंता साफ दिखाई देती है।

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  Sports

Gautam Gambhir को भज्जी की सलाह: Rohit-Virat के Experience पर जताएं भरोसा, उम्र नहीं Performance है पैमाना

भारत के महान स्पिनर हरभजन सिंह ने हैरानी व्यक्त करते हुए कहा कि अगर लियोनेल मेस्सी खेल सकते हैं, तो विराट कोहली और रोहित शर्मा क्यों नहीं? उन्होंने इन दोनों दिग्गज खिलाड़ियों का समर्थन करते हुए कहा कि अगर उनमें खेलने की प्रतिबद्धता है तो वे अगले साल होने वाले वनडे विश्व कप में खेल सकते हैं। पीटीआई के मुख्यालय में एक पॉडकास्ट साक्षात्कार में 46 वर्षीय पूर्व ऑफ स्पिनर ने रोहित और कोहली के भविष्य को लेकर चल रही अंतहीन बहस पर अपने विचार व्यक्त किए।

यह दोनों खिलाड़ी 35 वर्ष से अधिक उम्र के हैं और अब केवल एक ही प्रारूप में खेलते हैं। हरभजन ने साक्षात्कार के दौरान यह भी खुलासा किया कि उनकी आत्मकथा तैयार है और उसके इस वर्ष के आखिर में प्रकाशित होने की उम्मीद है। हरभजन ने कहा, ‘‘खिलाड़ी कोई भी हो, मेरा मानना ​​है कि मापदंड प्रदर्शन होना चाहिए, उम्र नहीं।’’ उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विश्व कप में वैभव सूर्यवंशी जैसे होनहार लेकिन अपेक्षाकृत अनुभवहीन युवा खिलाड़ी की तुलना में कोहली और रोहित पर उम्मीदों का कहीं अधिक बोझ होगा। रोहित और कोहली ने अब तक जो प्रतिबद्धता दिखाई है, उसे देखते हुए हरभजन ने कहा कि वे वही कर सकते हैं जो 39 वर्षीय मेस्सी ने हाल ही में हुए फुटबॉल विश्व कप में दिखाया था।

मेस्सी ने अपने व्यक्तिगत कौशल के दम पर अर्जेंटीना को फाइनल तक पहुंचाया था। जब भी वह गेंद लेकर आगे बढ़ते तो विरोधी टीम की रक्षापंक्ति को भेद देते थे। जब अगले साल दक्षिण अफ्रीका, जिम्बाब्वे और नामीबिया में वनडे विश्व कप होगा, तब रोहित 40 साल और कोहली 39 साल केहो जाएंगे। हरभजन ने कहा, ‘‘विराट भले ही 39 साल के हों, लेकिन अगर वह अभी भी मैदान पर 20 साल के खिलाड़ियों को पीछे छोड़ रहे हैं, तो उनकी उम्र मायने नहीं रखती। लियोनेल मेस्सी को ही देख लीजिए। 40 (39) साल की उम्र में भी पांच खिलाड़ी उन्हें रोक नहीं पाते। अगर किसी खिलाड़ी के पास ऐसी फिटनेस और कौशल हो कि पांच विरोधी भी उसे रोक न सकें, तो हम जानते हैं कि कौशल ही सर्वोपरि है।’’

हरभजन ने कोहली को श्रेय देते हुए कहा कि उन्होंने खिलाड़ियों को लगातार यह कहकर जीत का आत्मविश्वास जगाया कि कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि फिटनेस के मामले में कोहली ने ही उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और उन्हें यह अहसास दिलाया कि उनकी क्षमता उनकी सोच से कहीं अधिक है। उन्होंने कहा, ‘‘यह बदलाव सबसे पहले विराट कोहली 2014-15 में कप्तान बनने के बाद लाए थे। उससे पहले हम यह नहीं सोचते थे कि हम आखिरी दिन 400 रन का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं।

विराट ने अपने साथियों से कहा, ‘चलो कम से कम कोशिश तो करते हैं। हम हार सकते हैं, लेकिन अगर हम कोशिश करते रहेंगे तो एक दिन हम आखिरी पारी में 400 से अधिक रन जरूर बना लेंगे।’’ हरभजन ने कहा, ‘‘अगर हमें आखिरी दिन 10 विकेट लेने हों, तो हम इसके लिए पूरी कोशिश करेंगे। जीतने की मानसिकता और ड्रॉ से संतुष्ट न होने का जज़्बा विराट कोहली में है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान फिटनेस संस्कृति को बढ़ावा देना था। फिटनेस क्रांति लाने का 90 प्रतिशत श्रेय कोहली को जाता है।

फिटनेस के बारे में मेरी धारणा सहनशक्ति थी, लेकिन विराट ने इस टीम को यह विश्वास दिलाया कि अगर आप फिट हैं, तो आप हवा में उड़ सकते हैं।’’ इसलिए हरभजन की मुख्य कोच गौतम गंभीर को सलाह है कि वे इन दोनों खिलाड़ियों के अनुभव पर भरोसा करें। उन्होंने कहा, ‘‘अगर मैं कोच होता तो मेरा काम उन्हें मंच प्रदान करना होता, क्योंकि रोहित और विराट से मेरी अपेक्षाएं वैभव सूर्यवंशी से कहीं अधिक होतीं। इन दोनों के पास अनुभव है। इनके पास 300 मैचों का अनुभव है जो सूर्यवंशी के पास नहीं है। यह जरूर है सूर्यवंशी आकर गेंदबाजों की जमकर धुनाई कर सकते हैं, लेकिन विराट और रोहित के पास वो अनुभव है।’’

हरभजन ने कहा, ‘‘फिटनेस हमारी प्राथमिकता है और प्रदर्शन मायने रखता है। प्रदर्शन ही अंतिम मापदंड है। इसलिए यदि ये दोनों खिलाड़ी रन बना सकते हैं और श्रेयस (अय्यर) या यशस्वी (जायसवाल) जैसी फिटनेस रखते हैं तो बाकी कुछ भी मायने नहीं रखता।’’ जालंधर के रहने वाले हरभजन ने अपने शानदार करियर में टेस्ट क्रिकेट में 416 और वनडे क्रिकेट में 269 विकेट लिए। उन्होंने कहा कि खिलाड़ी आमतौर पर जानते हैं कि उन्हें अपने करियर को कब समाप्त करना है। उन्होंने याद किया कि कैसे उनके शरीर ने उन्हें संन्यास लेने की औपचारिक घोषणा करने से पूरे छह साल पहले ही रुकने का संकेत दे दिया था।

उन्होंने कहा, ‘‘रोहित और विराट को इसका जवाब अपने भीतर से ही मिलेगा। आपको तब अहसास होता है जब आप उस मुकाम पर पहुंच जाते हैं जहां आपको संन्यास लेना पड़ता है।’’ हरभजन ने आधिकारिक तौर पर दिसंबर 2021 में संन्यास लिया, लेकिन उन्होंने अपना आखिरी टेस्ट मैच 2015 में गॉल में श्रीलंका के खिलाफ खेला था, जहां दिनेश चांदीमल ने उनकी गेंद की जमकर धुनाई की थी जिससे उन्हें अहसास हुआ कि शायद लाल गेंद के क्रिकेट को अलविदा कहने का समय आ गया है।

उन्होंने कहा, ‘‘आपको तब अहसास होता है जब आप उस मुकाम पर पहुंच जाते हैं जहां अगर आपको खेलना जारी रखना है, तो आपको पहले से ज्यादा मेहनत करनी होगी। आप 35 साल से अधिक उम्र के हैं और आपसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि आप वही करें जो आप 18 या 20 साल की उम्र में करते थे।’’ उन्होंने कहा, ‘‘उस समय आपके नाम पर 400 विकेट दर्ज होते हैं और आपसे उसी स्तर का प्रदर्शन करने की अपेक्षा की जाती है। कई खिलाड़ी प्रदर्शन में आई गिरावट से उबर सकते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी होंगे जिन्हें लगेगा, ‘बस अब बहुत हो गया।’ अगर आप में हिम्मत है तो खेलना जारी रखने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो अपने शरीर की बात सुननी चाहिए।’’ हरभजन ने स्वीकार किया कि रविचंद्रन अश्विन का अच्छा प्रदर्शन करने वाले ऑफ-स्पिनर के रूप में उभरना भी उस समय उनके लिए चुनौतीपूर्ण साबित हुआ था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘‘अश्विन पहले से ही अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे। आपको यह वास्तविकता स्वीकार करनी होगी कि यह खिलाड़ी (अश्विन) अच्छा खेल रहा है। अगर मुझे अश्विन को पीछे छोड़ना होता तो मुझे बिल्कुल नए सिरे से शुरुआत करनी पड़ती और उतनी ही मेहनत करनी पड़ती जितनी मैंने अपने पहले 400 विकेट के लिए की थी।

क्या मैं ऐसा कर पाता? मेरी अंतरात्मा ने इसका जवाब दिया कि मैं ऐसा नहीं कर सकता।’’ हरभजन ने 2027 में होने वाले विश्व कप के लिए भारत की वनडे टीम के बारे में बात करते हुए कहा कि अभी एक साल बाकी है, इसलिए वह फिलहाल उसके संयोजन को लेकर ज्यादा चिंतित नहीं हैं। उन्होंने कहा, ‘‘जब आपके पास बहुत सारे विकल्प होते हैं, तो यह भी एक समस्या हो सकती है, हालांकि विकल्प होना अच्छी बात है। अब जब वनडे विश्व कप की बात आती है, तो मेरा मानना ​​है कि टूर्नामेंट के शुरू होने से छह महीने पहले ही टीम प्रबंधन को मुख्य टीम को लेकर स्पष्ट हो जाना चाहिए और खिलाड़ियों को पता होना चाहिए कि उनकी भूमिका क्या है।

Thu, 13 Aug 2026 13:42:46 +0530

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