क्या है 'राधा नाम का जप काउंटर रिंग'? जिसे पहनकर Anushka Sharma ने विराट कोहली के लिए की प्रार्थना
Radha Naam Jap Counter Ring: बॉलीवुड अभिनेत्री अनुष्का शर्मा एक बार फिर चर्चा में हैं. इस बार वजह उनकी कोई फिल्म या फैशन लुक नहीं बल्कि उनकी उंगली में नजर आई एक खास रिंग है. सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों में अनुष्का के हाथ में “राधा” नाम वाली जप काउंटर रिंग दिखाई दी. इसके बाद लोगों के मन में सवाल उठने लगे कि आखिर यह रिंग क्या होती है और इसका धार्मिक या आध्यात्मिक महत्व क्या है. कई सोशल मीडिया यूजर्स का मानना है कि अनुष्का ने यह रिंग आईपीएल 2026 के क्वालीफायर मुकाबले के दौरान विराट कोहली की जीत के लिए प्रार्थना करते हुए पहनी थी. इसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रही है. चलिए जानते हैं क्या है जप काउंटर रिंग?
क्या होती है जप काउंटर रिंग?
जप काउंटर रिंग एक खास प्रकार की अंगूठी होती है, जिसका इस्तेमाल मंत्र जाप या नाम स्मरण गिनने के लिए किया जाता है. इसे उंगली में पहनकर व्यक्ति आसानी से अपने मंत्रों की संख्या गिन सकता है. आमतौर पर लोग "राधे-राधे", "हरे कृष्ण", "राम नाम", या अन्य मंत्रों का जाप करते समय इस तरह की रिंग का इस्तेमाल करते हैं. इस रिंग में छोटे-छोटे घूमने वाले हिस्से या डिजिटल काउंटर हो सकते हैं. हर बार मंत्र बोलने पर व्यक्ति काउंट आगे बढ़ा सकता है. इससे जाप की संख्या याद रखने में आसानी होती है.
क्यों बढ़ रही है इसकी लोकप्रियता?
पिछले कुछ सालों में युवाओं के बीच मेडिटेशन का ट्रेंड तेजी से बढ़ा है. लोग तनाव कम करने और मानसिक शांति पाने के लिए मंत्र जाप और ध्यान की ओर आकर्षित हो रहे हैं. इसी वजह से जप काउंटर रिंग भी लोकप्रिय हो रही है. यह पारंपरिक माला की तुलना में छोटी, सुविधाजनक और स्टाइलिश मानी जाती है. कई लोग इसे फैशन के लिए भी पहनते हैं.
राधा नाम का क्या है महत्व?
सनातन परंपरा में "राधा" नाम को बेहद पवित्र माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राधा नाम का स्मरण मन को शांति और भक्ति से भर देता है. भक्तों का मानना है कि राधा नाम लेने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है, मन शांत रहता है, तनाव कम होता है और भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति मजबूत होती है. इसी कारण कई लोग "राधे-राधे" का जाप नियमित रूप से करते हैं.
क्या सच में अनुष्का आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ रही हैं?
यह पहली बार नहीं है जब अनुष्का शर्मा और विराट कोहली आध्यात्मिक गतिविधियों को लेकर चर्चा में आए हों. इससे पहले भी दोनों कई मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर नजर आ चुके हैं. दोनों को वृंदावन, उज्जैन महाकाल मंदिर और आश्रमों और सत्संग कार्यक्रमों में देखा गया है. फैंस का मानना है कि यह कपल अब पहले से ज्यादा आध्यात्मिक जीवनशैली अपना रहा है. हालांकि दोनों अपनी निजी आस्था को लेकर ज्यादा सार्वजनिक बातें नहीं करते.
सोशल मीडिया पर लोगों ने क्या कहा?
राधा नाम वाली रिंग की तस्वीर वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दीं. कुछ लोगों ने इसे भक्ति और सादगी का प्रतीक बताया. वहीं कुछ यूजर्स ने कहा कि बड़े सेलिब्रिटी भी अब मानसिक शांति के लिए अध्यात्म का सहारा ले रहे हैं. कई फैंस ने अनुष्का की तारीफ करते हुए लिखा कि सादगी ही असली खूबसूरती है वहीं एक अन्य यूजन ने लिखा आध्यात्मिकता इंसान को मजबूत बनाती है. सोशल मीडिया पर यह रिंग तेजी से ट्रेंड करने लगी.
क्या है धार्मिक महत्व?
धार्मिक विशेषज्ञों के अनुसार राधा नाम जप काउंटर रिंग (Radha Naam Jap Counter Ring) का मूल धार्मिक महत्व माला की जगह उंगलियों पर नाम के जाप की संख्या को सटीक रूप से गिनना और ध्यान केंद्रित रखना है. वृंदावन के रसिक संतों (जैसे श्री हित प्रेमानंद महाराज जी) की प्रेरणा से राधा नाम की महिमा अपरंपार है. यह नाम जप को सरल, निरंतर और माला के बिना कहीं भी करने में सहायक है.
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Explainer: Karnataka Politics में आखिर सिद्धारमैया और शिवकुमार पर कांग्रेस क्यों नहीं ले पा रही फैसला? जानें कौन सी चुनौतियां बन रहीं बाधा
Karnataka Politics: कर्नाटक में कार्यकाल का आधे से ज्यादा समय पूरा हो चुका है। अब शुरूआती शर्त के अनुसार, डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार को बचे हुए कार्यकाल के लिए कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनाया जाना है। शिवकुमार इसके लिए कई बार हाईकमान से कह चुके हैं। लेकिन कांग्रेस इसको लेकर फैसला क्यों नहीं ले पा रही हैं, आखिर अपनी ही शर्त पूरी करने के लिए पार्टी के सामने क्या क्या चुनौतियां। आइए विस्तार से समझते हैं।
कर्नाटक में सीएम बदलने को लेकर उठापटक चल रही है। सीएम सिद्धारमैया की जगह डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार बचे कार्यकाल के लिए मांग कर रहे हैं। इसको लेकर कांग्रेस हाईकमान ने दोनों नेताओं को दिल्ली बुलाया। कई घंटों के मैराथन के बाद राहुल गांधी के साथ अलग से बैठक हुई। कहा जा रहा है कि फैसला हो चुका है। बस औपचारिक घोषणा बाकी है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि सिद्धारमैया सीएम कुर्सी छोड़ने के लिए तैयार हो गए हैं। 28 मई को वह औपचारिक रूप से इस्तीफा दे देंगे। लेकिन यह पहली बार नहीं है जब सीएम कुर्सी को लेकर विवाद हो रहा हो।
कार्यकाल की शुरूआत में ही तय हुआ था 50-50 का फॉर्मूला
डीके शिवकुमार के समर्थकों का दावा है कि 2023 में कांग्रेस आलाकमान ने मुख्यमंत्री पद के लिए ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला तय किया था। लेकिन अशोक गहलोत और भूपेश बघेल की तरह सिद्धारमैया भी पिछले 6 महीने से इसे नजरअंदाज कर रहे हैं। सिद्धारमैया कांग्रेस नेतृत्व को चेतावनी दे चुके हैं कि उन्हें हटाने पर कर्नाटक में पार्टी टूट सकती है। दलील है कि सिद्धारमैया को 50 से 70 विधायकों का समर्थन हासिल है।
क्यों नहीं सुलझ रहा डीके और सिद्धारमैया विवाद?
कर्नाटक कांग्रेस में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच का मामला इसलिए नहीं सुलझ पा रहा है क्योंकि दोनों ही नेता राज्य में बेहद मजबूत जनाधार और राजनीतिक कद रखते हैं। पार्टी आलाकमान के लिए दोनों में से किसी एक को नाराज करना भारी राजनीतिक जोखिम का कारण बन सकता है।
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कांग्रेस के लिए क्या हैं मुसीबतें?
दोनों नेताओं का बड़ा जनाधार
सिद्धारमैया एक स्थापित जन नेता हैं जिनकी ओबीसी, दलित और मुस्लिम वोट बैंक यानी अहिंदा समीकरण पर मजबूत पकड़ है। वहीं, डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं और पार्टी संगठन तथा चुनावी रणनीति-वित्तपोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
50-50 या 'रोटेशन फॉर्मूला'
शिवकुमार गुट के मुताबिक 2023 में CM पद के लिए ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला तय हुआ था। गुट वादा पूरा करने पर जोर दे रहा है, पर सिद्धारमैया कुर्सी छोड़ने को राजी नहीं हैं।
जाति का गणित गड़बड़ाने और वोट घटने की चिंता:
अगर सिद्धारमैया को हटाकर डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया जाता है, तो पार्टी को आशंका है कि ओबीसी वोटबैंक खिसक सकता है और वोक्कालिगा वोट जेडी(एस) की तरफ जा सकते हैं।
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मजबूत विकल्प का अभाव
आलाकमान यानी मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी इस गतिरोध को खत्म करने के लिए सिद्धारमैया को दिल्ली में बड़ी राष्ट्रीय भूमिका या राज्यसभा की पेशकश कर डीके शिवकुमार को CM की कुर्सी सौंपना चाहता है। लेकिन सिद्धारमैया आसानी से पद छोड़ने को तैयार नहीं हैं, जिससे पार्टी असमंजस में है।
अब क्या होगा?
कल यानी 28 मई को उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार कल सुबह 9 बजे मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के कावेरी स्थित आवास पर आयोजित नाश्ते की बैठक में शामिल होंगे।
सिद्धारमैया पर कांग्रेस का NO-रिस्क!
दिल्ली में मौजूद एक कांग्रेस नेता ने द हिंदू को बताया कि मौजूदा हालात में आलाकमान सिद्धारमैया को तुरंत हटाने का जोखिम नहीं लेना चाहता। AHINDA यानी अल्पसंख्यक, पिछड़ा और दलित वोटबैंक पर सिद्धारमैया की पकड़ और ओबीसी समुदाय में उनका प्रभाव उनकी सबसे बड़ी ताकत है। इसी वजह से कांग्रेस हर कदम सोच-समझकर उठा रही है। नेता के मुताबिक, कर्नाटक में नेतृत्व बदलाव तभी होगा जब सिद्धारमैया खुद राहुल गांधी की सलाह पर CM पद छोड़ने को राजी हों।
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CM रेस में क्यों पीछे हैं डीके शिवकुमार?
डीके शिवकुमार अब भी कांग्रेस की कमजोर कड़ी बने हुए हैं। चुनाव के बाद उनके मुख्यमंत्री नहीं बन पाने की वजह उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप भी रहे। वहीं, सिद्धारमैया अपनी साफ छवि से लेकर कर्नाटक की सामाजिक संरचना में फिट बैठने तक, हर मोर्चे पर भारी पड़े थे।
सिद्धारमैया को क्या मिल सकती है भूमिका?
चर्चा है कि सिद्धारमैया ने साफ कर दिया है कि वो डीके शिवकुमार के नीचे काम नहीं करेंगे। यही वजह है कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे उन्हें दिल्ली में अहम भूमिका देने का ऑफर दे रहे हैं। इसमें राज्यसभा भेजना या पार्टी में अहम भूमिका देना शामिल हो सकता है।
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क्या था पिछले चुनाव का परिणाम
साल 2023 में कर्नाटक में विधान सभा चुनाव हुए थे। इसमें कांग्रेस ने 135 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया। सीटों और वोट शेयर दोनों लिहाज से यह 1989 के बाद कर्नाटक में पार्टी की सबसे बड़ी जीत है। भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (सेक्युलर) ने हार मान ली और क्रमशः दूसरे और तीसरे नंबर पर रहीं।
बिहार एनडीए की तर्ज पर होगा फैसला?
अगर सिद्धारमैया सीएम कुर्सी छोड़ने और राज्य सभा के लिए राजी होते हैं तो बिहार के पूर्व सीएम नीतीश कुमार की तर्ज पर राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन भर सकते हैं। साथ ही इस्तीफे का ऐलान भी कर सकते हैं। चर्चा है कि नीतीश की तरह सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र को भी मंत्री पद का ऑफर मिला है। राज्यसभा में मल्लिकार्जुन खड़गे का कार्यकाल खत्म हो रहा है, और अगर वो दोबारा नहीं जाते तो विपक्ष के नेता का पद सिद्धारमैया को मिल सकता है। फिलहाल सिद्धारमैया ने प्रस्ताव पर विचार के लिए समय मांगा है, और फैसले के लिए सिर्फ एक दिन बचा है। हालांकि अब 28 मई को सिद्धारमैया की प्रेस कॉफ्रेंस के बाद ही सब कुछ तय होगा।
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