एमपी पुलिस भर्ती में बड़ा अपडेट: 7 जून से शुरू होगी फिजिकल टेस्ट, जानें पूरी डिटेल
मध्य प्रदेश पुलिस भर्ती की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के लिए बड़ी खबर सामने आई है। प्रधान आरक्षक (कंप्यूटर) और सहायक उप निरीक्षक (कंप्यूटर) के कुल 89 पदों पर भर्ती प्रक्रिया के अगले चरण का ऐलान कर दिया गया है। चयनित अभ्यर्थियों की शारीरिक दक्षता परीक्षा (Physical Proficiency Test) 7 जून से 9 जून 2026 तक आयोजित की जाएगी।
मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल (MPESB) द्वारा जारी सूचना के अनुसार, उम्मीदवारों की 800 मीटर दौड़ और दस्तावेज परीक्षण भोपाल के लाल परेड ग्राउंड तथा जबलपुर स्थित 6वीं वाहिनी विसबल, रांझी के परेड ग्राउंड में कराया जाएगा। सफल उम्मीदवार अपना सूचना पत्र आधिकारिक वेबसाइट www.esb.mp.gov.in से डाउनलोड कर सकते हैं।
सहायक पुलिस महानिरीक्षक चयन/भर्ती गोपाल सिंह धाकड़ ने बताया कि उम्मीदवारों को जिस तारीख और केंद्र का आवंटन किया गया है, उसमें किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया जाएगा। सभी अभ्यर्थियों को तय तिथि पर ही उपस्थित होना अनिवार्य होगा।
भर्ती प्रक्रिया के दौरान आधार ई-केवाईसी सत्यापन भी किया जाएगा। इसलिए उम्मीदवारों को अपना आधार कार्ड साथ लेकर जाना जरूरी है। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनका आधार नंबर लॉक न हो। दस्तावेज सत्यापन के लिए सभी मूल प्रमाण पत्र और उनकी स्वयं प्रमाणित फोटोकॉपी साथ लानी होगी।
गौरतलब है कि मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल ने इन पदों के लिए मार्च 2026 में ऑनलाइन परीक्षा आयोजित की थी। यह परीक्षा 24 और 25 मार्च को हुई थी, जबकि इसका परिणाम 8 मई 2026 को जारी कर दिया गया था। अब उम्मीदवारों की नजर भर्ती प्रक्रिया के अगले चरण यानी फिजिकल टेस्ट पर टिकी हुई है।
Supreme Court on SIR: वोटर लिस्ट सुधार पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, चुनाव आयोग के 'स्पेशल रिवीजन' अधिकार को ठहराया सही
Supreme Court on SIR: देश की सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग (ECI) की शक्तियों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (27 मई) को चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल) के लिए किए जाने वाले 'विशेष गहन संशोधन' (Special Intensive Revision - SIR) की वैधानिकता को पूरी तरह सही ठहराया है।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इस तरह का विशेष संशोधन कराना पूरी तरह से चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) में आता है। कोर्ट के मुताबिक, यह कदम देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के संवैधानिक संकल्प को आगे बढ़ाता है।
सीजेआई सूर्य कांत की बेंच ने सुनाया फैसला
यह ऐतिहासिक फैसला मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि चुनाव आयोग ने कानून के दायरे से बाहर जाकर या अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करके SIR का आदेश दिया था।
प्रधान न्यायाधीश सूर्य कांत द्वारा पढ़े गए फैसले में कहा गया, "जब कानून खुद चुनाव आयोग को उचित कारणों के आधार पर किसी भी समय विशेष संशोधन (Special Revision) करने का अधिकार देता है, तो इस प्रक्रिया को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि यह सामान्य और नियमित तौर पर होने वाले संशोधन से थोड़ी अलग है।"
संविधान के आर्टिकल 324 को जीवंत करता है यह नियम
सर्वोच्च अदालत ने माना कि यह विशेष संशोधन (SIR) पीपुल्स रिप्रेजेंटेशन एक्ट (जनप्रतिनिधित्व अधिनियम) और इसके नियमों को दबाता नहीं है। इसके विपरीत, यह कानून की धारा 21(3) के तहत मिलने वाले वैधानिक दायरे में रहते हुए संविधान के अनुच्छेद 324 (Article 324) के जनादेश को और मजबूत व जीवंत बनाता है।
कोर्ट ने याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि वोटर लिस्ट को अपडेट और पूरी तरह शुद्ध रखना स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने का एक अभिन्न हिस्सा है। यह चुनाव आयोग का एक संवैधानिक दायित्व भी है, जिसे निभाना उसका कर्तव्य है।
नागरिकता पर सवाल नहीं उठाता यह प्रोसेस, कमियां ढूंढना गलत
सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को कानूनी रूप से पूरी तरह वैध बताया। बेंच ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 के तहत चुनाव आयोग को मतदाता सूची में संशोधन करने और उसे सुधारने का पूरा अधिकार है। यदि मौजूदा दस्तावेजों से किसी व्यक्ति की नागरिकता पर गंभीर संदेह पैदा होता है, तो आयोग उनका नाम वोटर लिस्ट से हटाने की कार्रवाई कर सकता है।
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि यदि इस प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं से उनके दस्तावेज या जानकारी मांगी जाती है, तो इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि उन्हें देश का नागरिक नहीं माना जा रहा है। लोगों को नाम जोड़ने, सुधार करने और आपत्तियां दर्ज कराने के कई मौके दिए गए थे, इसलिए इस प्रक्रिया में कोई खामी नहीं है। नोटिस जारी करना, जानकारी सार्वजनिक करना और अपील का अधिकार देना निष्पक्षता की कसौटी पर बिल्कुल खरा उतरता है।
क्या था पूरा विवाद और याचिकाओं का दावा?
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में दायर कई याचिकाओं में चुनाव आयोग के इस बड़े पैमाने पर किए गए 'विशेष गहन संशोधन' (SIR) को चुनौती दी गई थी। याचिकाओं में दावा किया गया था कि संविधान के अनुच्छेद 326 या जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव आयोग के पास इतने बड़े स्तर पर यह कवायद शुरू करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
शीर्ष अदालत ने पिछले साल 12 अगस्त को इस मामले में अंतिम सुनवाई शुरू की थी। इस विशेष अभियान (SIR) के तहत चुनाव आयोग ने एक डेटा जारी कर बताया था कि ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से करीब 65 लाख नाम हटाए गए थे। इसके नोटिफिकेशन के नियमों के मुताबिक, जिन वोटरों के नाम साल 2002 या 2003 की मतदाता सूची से गायब थे, उन्हें उन सूचियों में शामिल लोगों के साथ अपने पूर्वजों का लिंक (Ancestral Linkage) साबित करना जरूरी था। बिहार में इस पूरी कवायद को पहले चरण में ही लागू किया गया था।
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