गले में दर्द रहता है? इन घरेलू नुस्खे से घर पर ऐसे करें ठीक
Gale Mein Dard Ka Ilaj: गर्मी में अक्सर लोगों को कई तरह की परेशानियां होने लगती है. गला खराब होने के साथ-साथ सांस लेने में दिक्कत और आवाज बदलने लगती है. ऐसे में आपको घबराने की जरूरत नहीं है.
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क्या है अब्राहम समझौता, क्यों ट्रंप मुस्लिम देशों को इसमें शामिल करना चाहते हैं, पाकिस्तान को किस बात की दिक्कत?
मध्य पूर्व की राजनीति में एक बार फिर डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दांव चर्चा में बना हुआ है. अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और संभावित शांति समझौते के बीच ट्रंप अब मुस्लिम देशों पर 'अब्राहम अकॉर्ड्स' या यूं कहें अब्राहम समझौता इन दिनों सुर्खियां बंटोर रहा है. दरअसल ट्रंप इस समझौते में मुस्लिम देशों पर शामिल होने का दबाव बना रहे हैं.
यही नहीं ईरान के साथ समझौते में मध्यस्तता कर वाहवाही बंटोरने की कोशिश कर रहा पाकिस्तान भी इस अकॉर्ड में फंसता नजर आ रहा है. हालांकि पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव को मानने से इनकार कर दिया है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर यह अब्राहम अकॉर्ड्स क्या है और इसे लेकर इतना विवाद क्यों हो रहा है?
क्या है अब्राहम अकॉर्ड्स?
अब्राहम अकॉर्ड्स वर्ष 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में हुआ एक ऐतिहासिक समझौता था. इसका मकसद इजरायल और अरब देशों के बीच संबंध सामान्य बनाना था. इस समझौते के तहत कई मुस्लिम देशों ने पहली बार औपचारिक रूप से इजरायल के साथ राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध स्थापित किए. सबसे पहले UAE और बेहरीन इस समझौते में शामिल हुए. बाद में मोरक्को और सूडान ने भी इसका समर्थन किया.
नाम के पीछे क्या है कहानी?
इस समझौते का नाम पैगंबर अब्राहम के नाम पर रखा गया, जिन्हें यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्मों में सम्मानित माना जाता है. इसका उद्देश्य मध्य पूर्व में शांति और सहयोग बढ़ाना बताया गया.
ट्रंप अब क्यों बढ़ा रहे दबाव?
हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप चाहते हैं कि सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र और जॉर्डन जैसे देश भी अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होकर इजरायल को औपचारिक मान्यता दें. ट्रंप का मानना है कि यदि ये देश इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करते हैं, तो ईरान के साथ संभावित शांति समझौता ज्यादा मजबूत और स्थायी बन सकता है. वह इसे पूरे मध्य पूर्व में नए शक्ति संतुलन के रूप में देख रहे हैं.
जानकारों की मानें तो ट्रंप की रणनीति सिर्फ शांति तक सीमित नहीं है. इसके जरिए वह क्षेत्र में ईरान के प्रभाव को कमजोर करना चाहते हैं और इजरायल को व्यापक स्वीकार्यता दिलाने की कोशिश कर रहे हैं.
पाकिस्तान ने क्यों किया इनकार?
पाकिस्तान ने साफ कहा है कि वह अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल नहीं होगा. पाकिस्तानी नेताओं का कहना है कि इस समझौते का मतलब इजरायल को मान्यता देना होगा, जो पाकिस्तान की पारंपरिक नीति के खिलाफ है.
पाकिस्तान लंबे समय से 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' और स्वतंत्र फिलिस्तीन का समर्थक रहा है. वहां की सरकार और बड़ी आबादी मानती है कि जब तक फिलिस्तीन मुद्दे का समाधान नहीं होता, तब तक इजरायल को मान्यता देना संभव नहीं है. मामलों के जानकारों की मानें तो पाकिस्तान के लिए यह सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि घरेलू राजनीतिक और धार्मिक मुद्दा भी है. इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने पर वहां भारी विरोध हो सकता है.
सऊदी अरब की भूमिका क्यों अहम?
इस पूरे मामले में सऊदी अरेबिया की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है. अगर सऊदी अरब इजरायल को मान्यता देता है, तो यह पूरे मुस्लिम विश्व में बड़ा बदलाव माना जाएगा. लेकिन फिलहाल सऊदी नेतृत्व फिलिस्तीन मुद्दे पर स्पष्ट समाधान के बिना आगे बढ़ने के पक्ष में नहीं दिख रहा.
क्या बदल सकता है मध्य पूर्व का समीकरण?
अब्राहम अकॉर्ड्स को समर्थक मध्य पूर्व में आर्थिक सहयोग, निवेश, व्यापार और सुरक्षा साझेदारी का नया मॉडल मानते हैं. वहीं आलोचकों का कहना है कि यह समझौता फिलिस्तीन मुद्दे को दरकिनार कर क्षेत्रीय राजनीति को नया रूप देने की कोशिश है.
फिलहाल ट्रंप की पहल ने मध्य पूर्व की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है. आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि क्या और मुस्लिम देश इस समझौते में शामिल होते हैं या फिर फिलिस्तीन मुद्दा इस राह की सबसे बड़ी बाधा बना रहेगा.
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