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MP में अब पनीर के नाम पर नहीं बिकेगा ‘एनालॉग’, सरकार ने लगाया बैन, मावा-क्रीम-मक्खन जैसे नकली डेयरी विकल्प भी दायरे में

भोपाल। होटल या रेस्टोरेंट में आपने पनीर की सब्जी मंगाई, लेकिन प्लेट में आया पनीर वास्तव में दूध से बना ही न हो। देखने, स्वाद और बनावट में पनीर जैसा लगने वाला ऐसा ‘एनालॉग पनीर’ मध्य प्रदेश में अब नहीं बेचा जा सकेगा। प्रदेश में एनालॉग पनीर के साथ पनीर, मावा, क्रीम, मक्खन जैसे डेयरी प्रोडक्ट की नकल करने वाले कई गैर-दुग्ध उत्पादों पर रोक लगा दी गई है। खाद्य सुरक्षा प्रशासन ने 12 अगस्त को आदेश जारी कर इनके निर्माण से लेकर भंडारण, परिवहन, वितरण और बिक्री तक पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाया है।

921 पनीर के सैंपल जांचे, 123 मानकों पर फेल

इस फैसले के पीछे प्रदेश में हुई जांच के नतीजे भी चौंकाने वाले हैं। वर्ष 2025-26 में पनीर के 921 रेग्यूलेटरी सैंपल जांच के लिए लैब पहुंचे। इनमें 123 सैंपल तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। 98 में BR Reading और 25 में Fat प्रतिशत मानक के मुताबिक नहीं था। विभाग ने अपने आदेश में माना है कि इससे पनीर के मानकों का पूरी तरह पालन नहीं होने और पनीर की जगह एनालॉग पनीर के इस्तेमाल की संभावना सामने आती है।

पनीर दिखता है, लेकिन दूध की जगह हो सकती है वनस्पति वसा

आखिर एनालॉग पनीर है क्या? आसान भाषा में समझें तो ऐसे उत्पाद में दूध के एक या ज्यादा हिस्सों को गैर-दुग्ध सामग्री से आंशिक या पूरी तरह बदल दिया जाता है। इसमें वनस्पति वसा या तेल जैसे पदार्थ इस्तेमाल हो सकते हैं और इसे इस तरह तैयार किया जाता है कि यह देखने और इस्तेमाल में असली डेयरी प्रोडक्ट जैसा लगे। समस्या तब और बड़ी हो जाती है, जब ग्राहक को इसकी जानकारी दिए बिना इसे असली पनीर के नाम पर बेच दिया जाए।

होटल में ‘पनीर’ ऑर्डर किया तो ग्राहक को पता ही नहीं चलता

आदेश में होटल, रेस्टोरेंट, ढाबे, कैटरिंग और स्ट्रीट फूड का खास तौर पर जिक्र है। यहां ग्राहक पैकेट नहीं देखता। वह मेन्यू में ‘पनीर’ पढ़कर डिश ऑर्डर करता है। ऐसे में अगर उसमें एनालॉग इस्तेमाल हुआ है और इसकी जानकारी नहीं दी गई तो ग्राहक के पास यह जानने का कोई तरीका नहीं बचता कि उसने असली डेयरी पनीर खाया या उसका विकल्प। प्रदेश में हुई जांच के दौरान ऐसे मामले भी सामने आए, जहां एनालॉग उत्पादों को ‘पनीर’, ‘मलाई पनीर’ और ‘फ्रेश पनीर’ जैसे नामों से बेचे जाने की बात सामने आई।

हर एनालॉग प्रोडक्ट को ‘जहरीला’ नहीं मानता आदेश

यहां एक बात महत्वपूर्ण है। आदेश यह नहीं कहता कि हर डेयरी एनालॉग अपने आप में असुरक्षित या जहरीला है। चिंता इसकी सामग्री, पोषण और खासकर असली डेयरी उत्पाद बताकर बेचे जाने को लेकर है। असली डेयरी पनीर और एनालॉग के प्रोटीन, वसा और दूसरे पोषक तत्व अलग हो सकते हैं। यानी ग्राहक पैसे पनीर के दे और उसे मिले कुछ और, मामला स्वास्थ्य के साथ सीधे ग्राहक के अधिकार और उसकी जेब से भी जुड़ जाता है।

एक साल तक रह सकता है बैन

यह रोक फिलहाल तत्काल प्रभाव से लागू हो गई है। FSSAI द्वारा डेयरी एनालॉग के लिए व्यापक और अंतिम नियम तय किए जाने तक या अधिकतम एक साल तक यह आदेश प्रभावी रह सकता है। इससे पहले आदेश में बदलाव या इसे वापस भी लिया जा सकता है। हालांकि फ्रोजन डेजर्ट, प्रोसेस्ड चीज और मिक्स्ड फैट स्प्रेड जैसे पहले से मानकीकृत उत्पादों को इस प्रतिबंध से बाहर रखा गया है।

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सटोरिए सतीश सनपाल को लगा बड़ा झटका, हाई कोर्ट ने खारिज की सभी 6 याचिकाएं, जानिए पूरा मामला?

विदेश में बैठकर सट्टे का कारोबार चलाने वाले सटोरिए सतीश सनपाल को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। दरअसल हाई कोर्ट के जस्टिस हिमांशु जोशी की एकल पीठ ने सतीश सनपाल के खिलाफ जबलपुर के विभिन्न थानों में दर्ज छह अलग-अलग प्राथमिकियों को निरस्त करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने सतीश सनपाल की ओर से दायर सभी छह याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए उन्हें खारिज कर दिया।

वहीं इस मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऑनलाइन या इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से किए जाने वाले अपराधों में केवल इस आधार पर आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती कि वह घटना के समय देश में मौजूद नहीं था। कोर्ट ने कहा कि आरोपी का घटनास्थल या संबंधित देश में शारीरिक रूप से मौजूद न होना उसे अपने आप आपराधिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता।

जबलपुर के अलग-अलग थानों में दर्ज हैं 6 FIR

दरअसल सटोरिए सतीश सनपाल के खिलाफ जबलपुर पुलिस ने कार्रवाई की है। उसके खिलाफ जबलपुर के अलग-अलग थानों में कुल छह एफआईआर दर्ज हैं। सतीश सनपाल ने इन सभी प्राथमिकियों को निरस्त कराने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया था।

वहीं याचिकाकर्ता की ओर से दायर याचिकाओं में जबलपुर के ओमती थाने में दर्ज तीन एफआईआर, सिविल लाइन्स थाने में दर्ज एक एफआईआर, लॉर्डगंज थाने में दर्ज एक एफआईआर और मदन महल थाने में दर्ज एक एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी। इन सभी मामलों में पुलिस ने ऑनलाइन क्रिकेट सट्टे से जुड़े कथित अवैध कारोबार के आरोपों के तहत मुकदमे दर्ज किए हैं।

सनपाल ने कहा – 2020 से दुबई में रह रहा हूं

दरअसल सतीश सनपाल की ओर से पैरवी कर रहे वकीलों ने अदालत में दलील दी कि वह 14 मार्च 2020 से लगातार दुबई में रह रहा है और इस दौरान एक बार भी भारत वापस नहीं आया। याचिका में दावा किया गया कि उसकी गैरमौजूदगी का फायदा उठाकर उसे बदनाम करने की दुर्भावनापूर्ण नीयत से अलग-अलग थानों में ये झूठे मुकदमे दर्ज कराए गए हैं। इसी आधार पर सनपाल ने अपने खिलाफ दर्ज सभी आपराधिक मामलों को निरस्त करने की मांग की थी।

सरकार ने किया याचिकाओं का विरोध

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ब्रह्मदत्त सिंह ने इन याचिकाओं का विरोध किया। उन्होंने अदालत के सामने दलील दी कि तकनीकी युग में अपराध करने के लिए आरोपी का मौके पर शारीरिक रूप से मौजूद होना जरूरी नहीं है। उन्होंने कहा कि आरोपी विदेश में बैठकर भी भारत में अपराध को संचालित कर सकता है।

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हाई कोर्ट ने कहा – यह मिनी ट्रायल का चरण नहीं

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि सह-आरोपी के बयानों की विश्वसनीयता, गवाहों के मुकरने की स्थिति और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की सत्यता की जांच करना निचली अदालत का काम है। अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट धारा 528 के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए मिनी-ट्रायल की तरह साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं कर सकता। कोर्ट ने माना कि यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें पहली नजर में आरोपों को पूरी तरह झूठा, बेबुनियाद या असंभव माना जा सके। इसलिए इस शुरुआती स्तर पर एफआईआर और चल रही आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता है।

निचली अदालत में जारी रहेगी सुनवाई

सभी छह याचिकाएं खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि जबलपुर के न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में लंबित मामलों की कार्यवाही कानून के मुताबिक जारी रहेगी। हालांकि, याचिकाकर्ता को ट्रायल के दौरान अपने सभी कानूनी बचाव रखने की स्वतंत्रता होगी।

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