इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में बिना हिसाब की नकदी मिलने के मामले में संसद की तीन सदस्यीय जांच समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को साबित माना है। बुधवार को संसद के दोनों सदनों में पेश 126 पन्नों की रिपोर्ट में समिति ने न्यायमूर्ति वर्मा की सफाई को “टालमटोल भरी”, “भ्रामक” और कुछ हिस्सों में “झूठी” करार दिया। हालांकि समिति ने यह निष्कर्ष नहीं दिया कि बरामद नकदी व्यक्तिगत रूप से न्यायमूर्ति वर्मा की थी, क्योंकि इसके लिए पर्याप्त प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं मिले।
हम आपको याद दिला दें कि विवाद की शुरुआत 14 मार्च 2025 को दिल्ली स्थित न्यायमूर्ति वर्मा के सरकारी आवास के परिसर में आग लगने के बाद हुई थी। आग बुझाने के दौरान आउटहाउस के एक कमरे में बड़ी मात्रा में बिना हिसाब की नकदी मिली, जिसमें कुछ नोट जले हुए भी थे। घटना के बाद न्यायिक भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितता के आरोपों को लेकर व्यापक विवाद खड़ा हो गया। न्यायमूर्ति वर्मा ने नकदी की जानकारी होने से इंकार किया और अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया।
मामले में भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा कराई गई आंतरिक जांच में भी न्यायमूर्ति वर्मा की सफाई को असंतोषजनक माना गया था। इसके बाद उन्हें इस्तीफा देने या न्यायिक पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया का सामना करने को कहा गया। उन्होंने इस्तीफा देने से इंकार किया और रिपोर्ट राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री को भेजी गई। विभिन्न दलों के सांसदों के समर्थन से लोकसभा में उनके खिलाफ प्रस्ताव स्वीकार किए जाने के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के तहत तीन सदस्यीय वैधानिक समिति गठित की।
समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने की। इसमें तत्कालीन बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्रीकृष्ण चंद्रशेखर, जिन्हें बाद में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया गया, और वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य भी शामिल थे।
जांच समिति ने पाया कि जिस स्टोररूम में नकदी मिली, उसे न्यायमूर्ति वर्मा के नियंत्रण से बाहर बताना स्वीकार्य नहीं है। कमरे में उनके निजी सामान से जुड़ी एक बंद अलमारी होने समेत अन्य परिस्थितियों को देखते हुए समिति ने परिसर और न्यायमूर्ति के बीच पर्याप्त संबंध माना। इस आधार पर पहला आरोप साबित हुआ।
दूसरे आरोप के संबंध में समिति ने जली हुई नकदी और उससे जुड़े भौतिक साक्ष्यों को सुरक्षित नहीं रखे जाने पर गंभीर आपत्ति जताई। समिति को इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला कि न्यायमूर्ति वर्मा ने स्वयं नकदी हटाई थी, लेकिन उसने माना कि उनके संस्थागत नियंत्रण वाले परिसर से मिले महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी से वह मुक्त नहीं हो सकते। घर और प्रतिष्ठान से जुड़े लोगों की भूमिका की भी जांच की गई और दूसरा आरोप भी साबित माना गया।
तीसरे आरोप पर समिति ने न्यायमूर्ति वर्मा के बदलते बचाव को निर्णायक रूप से खारिज किया। शुरुआत में नकदी की जानकारी से इंकार करने के बाद उन्होंने साजिश, नकदी रखे जाने और साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया में खामियों के आरोप लगाए। समिति के अनुसार ये दलीलें नकदी की मौजूदगी और उपलब्ध साक्ष्यों को संतोषजनक ढंग से स्पष्ट नहीं कर सकीं। न्यायमूर्ति वर्मा का गवाही के लिए स्वयं कटघरे में न आना और जिरह का सामना न करना भी समिति के लिए प्रतिकूल रहा।
हम आपको याद दिला दें कि न्यायमूर्ति वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को संसदीय जांच जारी रहने के दौरान न्यायिक पद से इस्तीफा दे दिया था। वहीं अब रिपोर्ट संसद में पेश होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनके इस्तीफे के बावजूद इस मामले में आगे की संवैधानिक या संसदीय कार्रवाई संभव है या नहीं। कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम की प्रक्रिया मुख्यतः कार्यरत न्यायाधीश के खिलाफ लागू होती है। इसलिए यह मामला अब केवल आरोपों की पुष्टि तक सीमित रहेगा या संसद इस्तीफे के बावजूद आगे की कार्रवाई पर विचार करेगी, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
बहरहाल, समिति की रिपोर्ट ने फिलहाल इतना स्पष्ट कर दिया है कि नकदी के व्यक्तिगत स्वामित्व का निर्णायक प्रमाण न होने के बावजूद न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की ओर से उसके अस्तित्व, संरक्षण और बाद में उसके गायब होने की परिस्थितियों का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
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