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Shaurya Path: Kargil War के दौरान क्या America ने सचमुच India के GPS Signals Degradation कर धोखा दिया था?

हाल ही में आई वॉर ड्रामा सीरीज ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ ने कारगिल युद्ध से जुड़े कई अहम पहलुओं को फिर चर्चा में ला दिया है। खासकर उस दौर में जीपीएस जैसी तकनीक के लिए विदेशी निर्भरता और अमेरिकी सैन्य-स्तरीय जीपीएस सुविधा नहीं मिलने की बात ने यह सवाल फिर खड़ा किया है कि युद्ध जैसे संकट के समय किसी दूसरे देश की तकनीक पर कितना भरोसा किया जा सकता है। कारगिल की यही सीख आज भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता को और भी महत्वपूर्ण बनाती है।

यहीं से कारगिल की कहानी सिर्फ एक युद्ध की कहानी नहीं रह जाती। यह उस भारत की कहानी बन जाती है जिसने पहाड़ों पर गोलियों के बीच सीखा कि अगली लड़ाई केवल बंदूक और मिसाइल से नहीं, बल्कि सैटेलाइट, नेविगेशन, सेंसर और स्वदेशी तकनीक से भी जीती जाएगी।

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1999 की गर्मियों में पूरा देश कारगिल की बर्फीली चोटियों की ओर देख रहा था। मई की शुरुआत में ऊंची पहाड़ियों पर संदिग्ध गतिविधियों की खबरें आने लगीं थीं। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के नेतृत्व वाली पहली पेट्रोलिंग पार्टी के पकड़े जाने और उसके सदस्यों के साथ अमानवीय व्यवहार ने संकट की भयावहता का संकेत दे दिया। इसके बाद स्थिति तेजी से स्पष्ट हुई कि पाकिस्तानी घुसपैठिए 14,000 से 18,000 फीट की ऊंचाई पर रणनीतिक चोटियों पर जम चुके थे।

फिर आया वह आदेश जिसने युद्ध की दिशा बदल दी। 26 मई को भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर शुरू किया। चुनौती असाधारण थी। दुनिया की किसी वायुसेना ने इस पैमाने पर इतनी ऊंचाई पर एयर-टू-ग्राउंड युद्ध नहीं लड़ा था। पतली हवा में इंजन का थ्रस्ट घट रहा था, हथियार प्रणालियां कम ऊंचाई के हिसाब से कैलिब्रेट थीं और कुछ मीटर की चूक बम को लक्ष्य से किलोमीटर दूर घाटी में गिरा सकती थी। ऊपर से राजनीतिक आदेश साफ था कि LoC पार नहीं करनी है। यानी लड़ाई सिर्फ दुश्मन से नहीं थी। लड़ाई भूगोल, मौसम, ऊंचाई, तकनीकी सीमाओं और समय, चारों से एक साथ थी।

शुरुआती दिनों में भारतीय वायुसेना को भारी कीमत चुकानी पड़ी। 27 मई 1999 को फ्लाइट लेफ्टिनेंट के. नचिकेता का मिग-27 इंजन फेल होने के बाद नियंत्रण से बाहर होने लगा और उन्हें विमान से इजेक्ट करना पड़ा। वे पाकिस्तानी सेना के कब्जे में चले गए और बाद में उन्हें यातनाएं दी गईं। उसी दौरान नचिकेता का पता लगाने के लिए चोटियों के बीच उड़ रहे स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा अपने मिग-21 को थोड़ा नीचे लेकर आए। इसी बीच, पाकिस्तानी सेना ने उनके विमान पर स्टिंगर मिसाइल दागी, जिससे विमान क्षतिग्रस्त हो गया और आहूजा को भी इजेक्ट करना पड़ा। वह सुरक्षित रूप से नीचे उतरे, लेकिन पाकिस्तानी सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया और हिरासत में यातनाएं देने के बाद उनकी हत्या कर दी गयी। भारत को बाद में उनका शव वापस मिला, जिस पर अमानवीय यातनाओं और गोली लगने के निशान थे।

इसके अलावा, स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर के नेतृत्व वाला एमआई-17 हेलीकॉप्टर भी स्टिंगर मिसाइल की चपेट में आ गया था। इस हमले में पुंडीर समेत चार वायुसेनाकर्मी शहीद हुए। शुरुआती नुकसान ने भारतीय वायुसेना को अपनी रणनीति पर तत्काल पुनर्विचार के लिए मजबूर किया। दुश्मन की कंधे से दागी जाने वाली मिसाइलों के खतरे को देखते हुए वायुसेना ने ऊंचाई से हमले की नई रणनीति अपनाई और आगे चलकर जीपीएस-सहायता प्राप्त बमबारी तथा मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमानों के इस्तेमाल ने अभियान की दिशा ही बदल दी।

उस दौरान जीपीएस और हाथ में पकड़े जाने वाले कैमरों जैसी उपलब्ध तकनीक का तत्काल संचालन संबंधी जरूरतों के लिए इस्तेमाल किया गया। पायलटों ने हमले के लिए नई रणनीतियां और नए कोण विकसित किए। कम ऊंचाई वाले तोशे मैदान अभ्यास क्षेत्र में इनका परीक्षण किया गया और वहां मिले आंकड़ों को 18,000 फीट तक की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप दोबारा समायोजित किया गया। यह कोई जुगाड़ नहीं था; यह युद्ध के दबाव में पैदा हुआ रणक्षेत्र का नवाचार था।

लेकिन जीपीएस की कहानी में भी एक बड़ा मिथक है। हम आपको बता दें कि उपलब्ध विवरण वेब सीरीज ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में दिखाई गई कहानी से विपरीत बातें कहते हैं। विवरण के अनुसार, अमेरिका ने जानबूझकर भारत के जीपीएस संकेत को बिगाड़कर भारतीय सेना को धोखा नहीं दिया था। तत्कालीन वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ के अनुसार, समस्या भारतीय सैन्य नक्शों में इस्तेमाल होने वाली पुरानी एवरेस्ट स्फेरॉयड संदर्भ प्रणाली और जीपीएस में इस्तेमाल होने वाली डब्ल्यूजीएस-84 निर्देशांक प्रणाली के बीच अंतर से पैदा हुई थी। पायलटों को कागजी नक्शों पर लक्ष्यों को चिह्नित करके समोच्च रेखाओं की गणना करनी पड़ती थी और निर्देशांकों में मैन्युअल रूप से सुधार करना पड़ता था।

साथ ही उस समय अमेरिका की चयनात्मक उपलब्धता नीति के तहत नागरिक जीपीएस की सटीकता जानबूझकर घटाई जाती थी और भारत, 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण, सैन्य-स्तरीय एनकोडेड जीपीएस सेवा तक पहुंच से वंचित था। यही तकनीकी निर्भरता आगे चलकर भारत की रणनीतिक सोच में निर्णायक साबित हुई।

इसके अलावा, उस समय बेंगलुरु स्थित विमान एवं प्रणाली परीक्षण प्रतिष्ठान में विमानों को तेजी से लेजर-निर्देशित बमों और लाइटनिंग लक्ष्य-निर्देशन उपकरणों के लिए तैयार किया गया था। जून की शुरुआत तक मिराज-2000 विमान अभियान के लिए तैयार हो चुके थे। 17 जून को मुंथो धालो में पाकिस्तानी रसद अड्डे पर हमला हुआ, जिसने उनकी आपूर्ति व्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया। इसके बाद टाइगर हिल पर मिराज-2000 के सटीक हमलों ने जमीनी सैनिकों के लिए निर्णायक बढ़त तैयार की।

उधर, युद्ध के बाद यह एहसास गहरा हुआ कि युद्धकाल में स्थिति-निर्धारण और दिशा-निर्धारण जैसी बुनियादी क्षमताओं के लिए भी किसी विदेशी शक्ति पर निर्भर रहना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा जोखिम है। इसी सोच से भारत ने अपना स्वतंत्र क्षेत्रीय उपग्रह-आधारित दिशा-निर्धारण तंत्र विकसित करने की दिशा पकड़ी और आगे चलकर नाविक सामने आया। यह प्रणाली भारत और उसकी सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर तक के क्षेत्र को कवर करने के लिए तैयार की गई।

NavIC की असली ताकत सिर्फ मोबाइल फोन में रास्ता दिखाना नहीं है। इसका एक खुला सिग्नल आम नागरिक उपयोग के लिए है, जबकि एन्क्रिप्टेड प्रतिबंधित सिग्नल सैन्य उपयोग के लिए बनाया गया है। भारत ने अपनी जरूरतों के मुताबिक ऐसी व्यवस्था तैयार की जिसमें संकट की घड़ी में नेविगेशन की चाबी किसी बाहरी शक्ति के हाथ में न रहे।

अब नाविक की अगली पीढ़ी भी तैयार हो रही है। एनवीएस श्रृंखला के नए उपग्रह पुराने उपग्रहों की कई कमियों को दूर कर रहे हैं। इनमें ज्यादा लंबी उम्र, बेहतर संकेत और भारत में ही बनाए गए परमाणु घड़ियों जैसी अहम तकनीकें शामिल हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें एल-1 संकेत भी जोड़ा गया है। इससे नाविक को अब विशेष उपकरणों तक सीमित रखने के बजाय आम स्मार्टफोन में भी सीधे इस्तेमाल करना आसान हो जाएगा।

देखा जाये तो यही कारगिल की सबसे बड़ी रणनीतिक विरासत है। आज नेविगेशन सिर्फ Google Maps का मामला नहीं है। यह मिसाइलों की दिशा, युद्धपोतों की स्थिति, सीमावर्ती गश्त और सैन्य अभियानों की सटीकता से जुड़ा है। 1999 में भारत ने बर्फीली चोटियों पर लड़ते हुए एक सबक सीखा था कि युद्ध के मैदान में आत्मनिर्भरता कोई नारा नहीं, युद्धक क्षमता है। कारगिल की चोटियों पर भारतीय पायलटों ने जब पतली हवा, सीमित तकनीक और असंभव लगते लक्ष्यों के बीच रास्ता बनाया था, तब शायद उन्हें अंदाजा नहीं था कि उस संघर्ष की एक अदृश्य लड़ाई अंतरिक्ष में भी शुरू हो चुकी है। वह लड़ाई थी किसी और के GPS पर निर्भर भारत और अपने नेविगेशन सिस्टम वाले भारत के बीच।

बहरहाल, उस दौर से मिली सीख को मोदी सरकार ने गंभीरता से लिया। मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के पहले दिन से ही रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकता बनाया और हथियारों, मिसाइलों, विमानों, तोपों, युद्धपोतों से लेकर रक्षा तकनीक तक देश में ही विकसित और निर्मित करने पर जोर दिया। अब इन प्रयासों के नतीजे भी दिखाई देने लगे हैं। भारत न केवल अपनी सेनाओं की जरूरतों के लिए तेजी से स्वदेशी प्रणालियां तैयार कर रहा है, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों को भी रक्षा उपकरण निर्यात करने की स्थिति में पहुंच रहा है। यानी कारगिल के समय जिस तकनीकी निर्भरता ने भारत को अपनी कमजोरियां दिखाईं थीं, आज वही भारत रक्षा आत्मनिर्भरता के रास्ते पर आगे बढ़कर अपनी सामरिक स्वतंत्रता को मजबूत कर रहा है।

-नीरज कुमार दुबे

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UP RERA Report: 2022-23 में होमबायर्स की शिकायत वाले टॉप 20 बिल्डर

यूपी रेरा की 2022-23 की रिपोर्ट ने रियल एस्टेट सेक्टर की चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है. इसमें उन 20 बिल्डरों की सूची जारी की गई है जिनके खिलाफ होमबायर्स की सर्वाधिक शिकायतें दर्ज हुईं.

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  Sports

Gautam Gambhir को भज्जी की सलाह: Rohit-Virat के Experience पर जताएं भरोसा, उम्र नहीं Performance है पैमाना

भारत के महान स्पिनर हरभजन सिंह ने हैरानी व्यक्त करते हुए कहा कि अगर लियोनेल मेस्सी खेल सकते हैं, तो विराट कोहली और रोहित शर्मा क्यों नहीं? उन्होंने इन दोनों दिग्गज खिलाड़ियों का समर्थन करते हुए कहा कि अगर उनमें खेलने की प्रतिबद्धता है तो वे अगले साल होने वाले वनडे विश्व कप में खेल सकते हैं। पीटीआई के मुख्यालय में एक पॉडकास्ट साक्षात्कार में 46 वर्षीय पूर्व ऑफ स्पिनर ने रोहित और कोहली के भविष्य को लेकर चल रही अंतहीन बहस पर अपने विचार व्यक्त किए।

यह दोनों खिलाड़ी 35 वर्ष से अधिक उम्र के हैं और अब केवल एक ही प्रारूप में खेलते हैं। हरभजन ने साक्षात्कार के दौरान यह भी खुलासा किया कि उनकी आत्मकथा तैयार है और उसके इस वर्ष के आखिर में प्रकाशित होने की उम्मीद है। हरभजन ने कहा, ‘‘खिलाड़ी कोई भी हो, मेरा मानना ​​है कि मापदंड प्रदर्शन होना चाहिए, उम्र नहीं।’’ उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विश्व कप में वैभव सूर्यवंशी जैसे होनहार लेकिन अपेक्षाकृत अनुभवहीन युवा खिलाड़ी की तुलना में कोहली और रोहित पर उम्मीदों का कहीं अधिक बोझ होगा। रोहित और कोहली ने अब तक जो प्रतिबद्धता दिखाई है, उसे देखते हुए हरभजन ने कहा कि वे वही कर सकते हैं जो 39 वर्षीय मेस्सी ने हाल ही में हुए फुटबॉल विश्व कप में दिखाया था।

मेस्सी ने अपने व्यक्तिगत कौशल के दम पर अर्जेंटीना को फाइनल तक पहुंचाया था। जब भी वह गेंद लेकर आगे बढ़ते तो विरोधी टीम की रक्षापंक्ति को भेद देते थे। जब अगले साल दक्षिण अफ्रीका, जिम्बाब्वे और नामीबिया में वनडे विश्व कप होगा, तब रोहित 40 साल और कोहली 39 साल केहो जाएंगे। हरभजन ने कहा, ‘‘विराट भले ही 39 साल के हों, लेकिन अगर वह अभी भी मैदान पर 20 साल के खिलाड़ियों को पीछे छोड़ रहे हैं, तो उनकी उम्र मायने नहीं रखती। लियोनेल मेस्सी को ही देख लीजिए। 40 (39) साल की उम्र में भी पांच खिलाड़ी उन्हें रोक नहीं पाते। अगर किसी खिलाड़ी के पास ऐसी फिटनेस और कौशल हो कि पांच विरोधी भी उसे रोक न सकें, तो हम जानते हैं कि कौशल ही सर्वोपरि है।’’

हरभजन ने कोहली को श्रेय देते हुए कहा कि उन्होंने खिलाड़ियों को लगातार यह कहकर जीत का आत्मविश्वास जगाया कि कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि फिटनेस के मामले में कोहली ने ही उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और उन्हें यह अहसास दिलाया कि उनकी क्षमता उनकी सोच से कहीं अधिक है। उन्होंने कहा, ‘‘यह बदलाव सबसे पहले विराट कोहली 2014-15 में कप्तान बनने के बाद लाए थे। उससे पहले हम यह नहीं सोचते थे कि हम आखिरी दिन 400 रन का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं।

विराट ने अपने साथियों से कहा, ‘चलो कम से कम कोशिश तो करते हैं। हम हार सकते हैं, लेकिन अगर हम कोशिश करते रहेंगे तो एक दिन हम आखिरी पारी में 400 से अधिक रन जरूर बना लेंगे।’’ हरभजन ने कहा, ‘‘अगर हमें आखिरी दिन 10 विकेट लेने हों, तो हम इसके लिए पूरी कोशिश करेंगे। जीतने की मानसिकता और ड्रॉ से संतुष्ट न होने का जज़्बा विराट कोहली में है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान फिटनेस संस्कृति को बढ़ावा देना था। फिटनेस क्रांति लाने का 90 प्रतिशत श्रेय कोहली को जाता है।

फिटनेस के बारे में मेरी धारणा सहनशक्ति थी, लेकिन विराट ने इस टीम को यह विश्वास दिलाया कि अगर आप फिट हैं, तो आप हवा में उड़ सकते हैं।’’ इसलिए हरभजन की मुख्य कोच गौतम गंभीर को सलाह है कि वे इन दोनों खिलाड़ियों के अनुभव पर भरोसा करें। उन्होंने कहा, ‘‘अगर मैं कोच होता तो मेरा काम उन्हें मंच प्रदान करना होता, क्योंकि रोहित और विराट से मेरी अपेक्षाएं वैभव सूर्यवंशी से कहीं अधिक होतीं। इन दोनों के पास अनुभव है। इनके पास 300 मैचों का अनुभव है जो सूर्यवंशी के पास नहीं है। यह जरूर है सूर्यवंशी आकर गेंदबाजों की जमकर धुनाई कर सकते हैं, लेकिन विराट और रोहित के पास वो अनुभव है।’’

हरभजन ने कहा, ‘‘फिटनेस हमारी प्राथमिकता है और प्रदर्शन मायने रखता है। प्रदर्शन ही अंतिम मापदंड है। इसलिए यदि ये दोनों खिलाड़ी रन बना सकते हैं और श्रेयस (अय्यर) या यशस्वी (जायसवाल) जैसी फिटनेस रखते हैं तो बाकी कुछ भी मायने नहीं रखता।’’ जालंधर के रहने वाले हरभजन ने अपने शानदार करियर में टेस्ट क्रिकेट में 416 और वनडे क्रिकेट में 269 विकेट लिए। उन्होंने कहा कि खिलाड़ी आमतौर पर जानते हैं कि उन्हें अपने करियर को कब समाप्त करना है। उन्होंने याद किया कि कैसे उनके शरीर ने उन्हें संन्यास लेने की औपचारिक घोषणा करने से पूरे छह साल पहले ही रुकने का संकेत दे दिया था।

उन्होंने कहा, ‘‘रोहित और विराट को इसका जवाब अपने भीतर से ही मिलेगा। आपको तब अहसास होता है जब आप उस मुकाम पर पहुंच जाते हैं जहां आपको संन्यास लेना पड़ता है।’’ हरभजन ने आधिकारिक तौर पर दिसंबर 2021 में संन्यास लिया, लेकिन उन्होंने अपना आखिरी टेस्ट मैच 2015 में गॉल में श्रीलंका के खिलाफ खेला था, जहां दिनेश चांदीमल ने उनकी गेंद की जमकर धुनाई की थी जिससे उन्हें अहसास हुआ कि शायद लाल गेंद के क्रिकेट को अलविदा कहने का समय आ गया है।

उन्होंने कहा, ‘‘आपको तब अहसास होता है जब आप उस मुकाम पर पहुंच जाते हैं जहां अगर आपको खेलना जारी रखना है, तो आपको पहले से ज्यादा मेहनत करनी होगी। आप 35 साल से अधिक उम्र के हैं और आपसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि आप वही करें जो आप 18 या 20 साल की उम्र में करते थे।’’ उन्होंने कहा, ‘‘उस समय आपके नाम पर 400 विकेट दर्ज होते हैं और आपसे उसी स्तर का प्रदर्शन करने की अपेक्षा की जाती है। कई खिलाड़ी प्रदर्शन में आई गिरावट से उबर सकते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी होंगे जिन्हें लगेगा, ‘बस अब बहुत हो गया।’ अगर आप में हिम्मत है तो खेलना जारी रखने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो अपने शरीर की बात सुननी चाहिए।’’ हरभजन ने स्वीकार किया कि रविचंद्रन अश्विन का अच्छा प्रदर्शन करने वाले ऑफ-स्पिनर के रूप में उभरना भी उस समय उनके लिए चुनौतीपूर्ण साबित हुआ था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘‘अश्विन पहले से ही अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे। आपको यह वास्तविकता स्वीकार करनी होगी कि यह खिलाड़ी (अश्विन) अच्छा खेल रहा है। अगर मुझे अश्विन को पीछे छोड़ना होता तो मुझे बिल्कुल नए सिरे से शुरुआत करनी पड़ती और उतनी ही मेहनत करनी पड़ती जितनी मैंने अपने पहले 400 विकेट के लिए की थी।

क्या मैं ऐसा कर पाता? मेरी अंतरात्मा ने इसका जवाब दिया कि मैं ऐसा नहीं कर सकता।’’ हरभजन ने 2027 में होने वाले विश्व कप के लिए भारत की वनडे टीम के बारे में बात करते हुए कहा कि अभी एक साल बाकी है, इसलिए वह फिलहाल उसके संयोजन को लेकर ज्यादा चिंतित नहीं हैं। उन्होंने कहा, ‘‘जब आपके पास बहुत सारे विकल्प होते हैं, तो यह भी एक समस्या हो सकती है, हालांकि विकल्प होना अच्छी बात है। अब जब वनडे विश्व कप की बात आती है, तो मेरा मानना ​​है कि टूर्नामेंट के शुरू होने से छह महीने पहले ही टीम प्रबंधन को मुख्य टीम को लेकर स्पष्ट हो जाना चाहिए और खिलाड़ियों को पता होना चाहिए कि उनकी भूमिका क्या है।

Thu, 13 Aug 2026 13:42:46 +0530

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