क्या सांस फूलना फेफड़ों के कैंसर का लक्षण है? WHO के अनुसार Lung Cancer के 7 संकेत कौन से हैं, जानिए यहां
Fefdo Ke Cancer Ke Lakshan: फेफड़ों का कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसके लक्षण शुरुआती स्टेज में आम दिक्कतों जैसे ही लगते हैं और व्यक्ति इन्हें इग्नोर करता चला जाता है. लेकिन, इन संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए तो ट्यूमर को बढ़ने से रोका जा सकता है.
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महेंद्रपुर गांव पर मंडराता विस्थापन का खतरा: गंगा की लहरों में समा रहा 7000 लोगों का आशियाना
Mahendrapur Village: एक समय था जब महेंद्रपुर गांव अपनी लहलहाती फसलों, दूध और घी की संपन्नता के लिए दूर-दूर तक जाना जाता था. लेकिन आज इस गांव की तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है. यहां के करीब सात हजार ग्रामीण दिन-रात एक अनजाने खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं. गंगा नदी का रौद्र रूप हर दिन गांव की उपजाऊ जमीन को लील रहा है. हालात इतने भयानक हैं कि नदी की तेज धारा अब आबादी से महज सौ मीटर की दूरी पर बह रही है, जिसकी गर्जना लोगों की रातों की नींद उड़ा रही है. आंखों के सामने मिट्टी के बड़े-बड़े टीले ताश के पत्तों की तरह नदी में समाते जा रहे हैं और ग्रामीण बेबस होकर अपने उजड़ते आशियाने को देखने के लिए मजबूर हैं.
विस्थापन का पुराना इतिहास और ग्रामीणों का दर्द
महेंद्रपुर के लिए विस्थापन का यह दर्द नया नहीं है. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि उन लोगों पर छठी बार यह संकट मंडरा रहा है. करीब एक सदी पहले जब गांव में पहली बार कटाव हुआ था, तब चक्की बाजार के आसपास बसा यह इलाका काफी समृद्ध था, जहां स्कूल से लेकर हर बुनियादी सुविधा मौजूद थी. लेकिन गंगा के कहर ने उस पुराने महेंद्रपुर को पूरी तरह से मिटा दिया. इसके बाद साल 1962 से 1965 के बीच नदी ने फिर से अपना विकराल रूप दिखाया और हजारों की आबादी को अपना घर छोड़ना पड़ा. यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। 1972 से 1975 और फिर 1981 में भी भीषण कटाव हुआ. हर बार लोग अपनी उजड़ी हुई दुनिया को समेट कर कुछ दूरी पर फिर से घर बनाते, लेकिन गंगा की लहरें उन्हें फिर से बेघर कर देतीं.
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कई इलाकों में शरण लेने को मजबूर हुए ग्रामीण
लगातार होते कटाव ने गांव की एक बड़ी आबादी को दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया। 1990 में जब नदी ने फिर से गांव की तरफ रुख किया, तो कुछ बचाव कार्य जरूर हुए जिससे गांव पूरी तरह कटने से बच गया, लेकिन खौफ के मारे हजारों लोग गांव छोड़ गए. आज महेंद्रपुर के विस्थापित लोग दरियापुर पंचायत, आजाद नगर कासिमपुर, सोनापुर और साफापुर अंबेडकर नगर जैसे इलाकों में अपनी जिंदगी काट रहे हैं. कभी दस हजार से अधिक की आबादी वाला यह गांव आज कटते-कटते सिर्फ छह-सात हजार की आबादी तक सिमट गया है और अब यह बची हुई आबादी भी अपने वजूद की आखिरी लड़ाई लड़ रही है. बीते तीन सालों में ही गंगा करीब डेढ़ किलोमीटर अंदर आ चुकी है.
बाढ़ के दिनों में नाव ही बनती है एकमात्र सहारा
बरसात के दिनों में इस गांव का संपर्क जिला मुख्यालय से पूरी तरह टूट जाता है. महीनों तक लोग अपनी गाड़ियां गांव से दूर गुप्ता-लखमीनिया बांध या सोनापुर में खड़ी करने को विवश होते हैं. ऐसे में नाव ही आवागमन का एकमात्र जरिया बचती है. सबसे ज्यादा परेशानी तब होती है जब कोई बीमार पड़ जाता है और उसे अस्पताल ले जाना होता है. सरकारी नावों की कमी के कारण लोग निजी स्तर पर नावों की व्यवस्था करते हैं. पिछले कुछ सालों में आई बाढ़ ने यहां के मिडिल स्कूल को भी हफ्तों तक पानी में डुबोए रखा, जिससे बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हुई. ग्रामीणों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि सत्ताधारी दल के नेता सिर्फ चुनाव के समय वोट मांगने आते हैं, लेकिन संकट की इस घड़ी में कोई उनकी सुध लेने नहीं पहुंचता.
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आपदा के बीच भी निखर रही गांव की प्रतिभा
इतनी दुश्वारियों और बार-बार उजड़ने के बावजूद महेंद्रपुर के लोगों ने हार नहीं मानी है. यहां की मिट्टी में पलने वाली प्रतिभाएं देश-विदेश में गांव का नाम रोशन कर रही हैं. इस दियारा इलाके से निकलकर गांव के दो युवा आज अमेरिका में आईआईटीयन के तौर पर रिसर्च और नौकरी कर रहे हैं. इतना ही नहीं, हाल ही में गांव की बेटी रुचि कुमारी ने यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षा पास कर शानदार सफलता हासिल की है. इससे पहले भी गांव के शिवबालक प्रसाद सिंह त्यागी पुलिस अधीक्षक के पद तक पहुंचे थे. यह साबित करता है कि संसाधनों की कमी यहां के युवाओं के हौसले नहीं तोड़ पाई है.
अब बसने के लिए नहीं बची जमीन, ग्रामीणों की गुहार
लगातार कटते गांव के कारण अब ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि अगर यह गांव भी कट गया, तो वे कहां जाएंगे. गांव का रकबा पूरी तरह समाप्त हो चुका है. ग्रामीणों का दर्द है कि अगर वे बेघर होकर बांध, नेशनल हाईवे या रेलवे लाइन के किनारे शरण लेते हैं, तो सरकार उन्हें अतिक्रमणकारी कहकर भगा देगी. ग्रामीणों का सीधा सवाल प्रशासन से है कि असल अतिक्रमण तो गंगा नदी कर रही है, जो उनकी पुश्तैनी जमीन को निगलती जा रही है. ऐसे में सरकार को पहले नदी के इस अतिक्रमण को रोकना चाहिए. गांव वाले अपने स्वाभिमान के साथ अपनी ही जमीन पर जीना चाहते हैं.
बचाव कार्य को लेकर प्रशासन की पहल
हालात की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने भी कुछ कदम उठाए हैं. बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल बेगूसराय के कार्यपालक अभियंता ने अपनी टीम के साथ मौके का मुआयना किया है. उन्होंने इस बात की पुष्टि की है कि कटाव स्थल से घरों की दूरी अब काफी कम रह गई है. स्थिति की नजाकत को समझते हुए उच्चाधिकारियों को पूरे मामले की रिपोर्ट सौंप दी गई है और फिलहाल फौरी राहत के तौर पर बांस के रोल और झाड़ियों की मदद से कटाव रोकने का काम शुरू कर दिया गया है. हालांकि, गांव को बचाने के लिए यह उपाय कितना कारगर होगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा.
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