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राष्ट्रीय डेंगू दिवस: छोटे मच्छरों से सेहत को बड़ा खतरा, जानें क्या करें क्या नहीं

नई दिल्ली, 15 मई (आईएएनएस)। डेंगू के बढ़ते मामलों को नियंत्रित करने और जागरूकता फैलाने के उद्देश्य के साथ हर साल 16 मई को ‘राष्ट्रीय डेंगू दिवस’ मनाया जाता है। इस साल की थीम “डेंगू नियंत्रण के लिए सामुदायिक भागीदारी: जांचें, साफ करें और ढकें” है। इस दिन को लेकर पूरे देश में विशेष जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, ताकि लोग डेंगू से बचाव के उपाय अपनाएं और इस बीमारी को फैलने से रोका जा सके।

डेंगू एक वायरल बीमारी है, जो मच्छरों के काटने से फैलती है। यह ‘एडीज एजिप्टी’ नामक मच्छर से होता है। संक्रमित मच्छर के काटने के 5-6 दिनों बाद लक्षण दिखने शुरू हो जाते हैं। यह बीमारी तेजी से फैल सकती है और महामारी का रूप ले सकती है। देश के लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में डेंगू के मामले देखने को मिल जाते हैं।

डेंगू के मुख्य लक्षण पर नजर डालें तो अचानक तेज बुखार आना, तेज सिरदर्द, आंखों के पीछे दर्द, खासकर आंख हिलाने पर साथ ही मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द, भूख और स्वाद का कम होना, शरीर पर खसरे जैसे दाने, जी मिचलाना और उल्टी होना।

वहीं, डेंगू के गंभीर लक्षणों में बार-बार उल्टी, नाक-मुंह से खून आना, त्वचा पर रैशेज, बेचैनी, तेज प्यास लगना, कमजोर नाड़ी और सांस लेने में तकलीफ शामिल है। अगर ऐसे लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

डेंगू के लिए कोई विशेष टीका या दवा नहीं है, इसलिए बचाव ही सबसे बेहतर उपाय है। हेल्थ एक्सपर्ट बताते हैं कि क्या करें और क्या नहीं। इसके लिए घर में लगे कूलर, टब, बाल्टी, गमले आदि में जमा पानी हफ्ते में कम से कम एक बार जरूर निकाल दें। नालियों और कूड़ेदानों में पानी जमा न होने दें। बचाव के लिए दिन के समय मच्छर भगाने वाली दवाओं जैसे एयरोसोल आदि का इस्तेमाल करें। पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें और सोते समय मच्छरदानी का इस्तेमाल करें। वहीं, बच्चों को शॉर्ट्स या आधी आस्तीन वाले कपड़ों में बाहर न खेलने दें।

मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर के अनुसार, भारत सरकार डेंगू की रोकथाम के लिए कई ठोस कदम उठा रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत एनवीबीडीसीपी यानी नेशनल वेक्टर बोर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम के तहत देशभर में जागरूकता, निगरानी और उपचार की व्यवस्था की गई है। 869 सेंटिनल सर्विलांस अस्पताल (एसएसएच) स्थापित किए गए हैं, जहां डेंगू की जांच की सुविधा है।

इसके साथ ही 27 एडवांस्ड रेफरल लेबोरेटरीज (एआरएल) इन अस्पतालों को सपोर्ट करती हैं। जांच किट मुफ्त उपलब्ध कराई जाती हैं और राज्यों को तकनीकी दिशानिर्देश, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता दी जाती है। समय-समय पर एडवाइजरी जारी की जाती हैं, ताकि संभावित प्रकोप को समय रहते रोका जा सके। सरकार का जोर सामुदायिक भागीदारी पर है। अगर हर व्यक्ति अपने घर, मोहल्ले और कार्यस्थल को मच्छरों से मुक्त रखे तो डेंगू को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

--आईएएनएस

एमटी/वीसी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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स्वाद और सेहत का संगम 'शहतूत', फल ही नहीं, पत्तियां भी पोषक तत्वों का खजाना

नई दिल्ली, 15 मई (आईएएनएस)। प्रकृति ने ऐसे कई फल-फूल दिए हैं, जो स्वाद के साथ ही सेहत के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं। ऐसा ही गर्मियों में मिलने वाला फल है शहतूत, जो न सिर्फ स्वादिष्ट, बल्कि सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है। इसका वैज्ञानिक नाम मोरस इंडिका है।

बिहार सरकार का वन, जलवायु एवं पर्यावरण विभाग शहतूत के सेवन से मिलने वाले फायदों से अवगत कराता है। यह पेड़ स्वाद और सेहत का अनोखा संगम है। शहतूत के रसीले फल तो खाए जाते हैं, लेकिन इसकी पत्तियां भी पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं और रेशम उद्योग की नींव हैं। शहतूत एक तेजी से बढ़ने वाला मध्यम आकार का पेड़ है, जो आमतौर पर 10 से 15 मीटर की ऊंचाई तक पहुंच जाता है।

इसके फल बेहद रसीले और मीठे होते हैं। ये सफेद, गुलाबी या गहरे बैंगनी रंग के हो सकते हैं। स्वाद के साथ-साथ ये फल औषधीय गुणों से भी भरपूर होते हैं। लोग इन्हें ताजा खाने के अलावा जूस, जेली, मुरब्बा और सूखे रूप में भी इस्तेमाल करते हैं।

शहतूत के फलों में विटामिन, मिनरल्स, एंटीऑक्सीडेंट और फाइबर प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। ये फल रक्त शुद्ध करने, पाचन सुधारने, एनीमिया दूर करने और इम्युनिटी बढ़ाने में कारगर माने जाते हैं। आयुर्वेद और लोक चिकित्सा में शहतूत का इस्तेमाल सदियों से किया जा रहा है।

शहतूत की पत्तियां सिर्फ रेशम के कीड़ों का भोजन ही नहीं हैं, बल्कि इनमें भी ढेर सारे पोषक तत्व पाए जाते हैं। इन पत्तियों को चाय, पाउडर और सब्जी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। पत्तियों में प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम और एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर होते हैं। इनका सेवन ब्लड शुगर कंट्रोल करने और कोलेस्ट्रॉल कम करने में फायदेमंद है।

सेहत और स्वाद के साथ ही शहतूत का पेड़ रेशम उद्योग का भी आधार है। रेशम के कीड़े इन्हीं पत्तियों को खाकर रेशम पैदा करते हैं। भारत में शहतूत की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार का साधन भी बनती है। इस पेड़ की छाल गहरे भूरे रंग की और खुरदरी होती है। पेड़ पर्यावरण के लिए भी बहुत उपयोगी है क्योंकि यह तेजी से बढ़ता है और मिट्टी को मजबूत बनाए रखने में मदद करता है।

--आईएएनएस

एमटी/एबीएम

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