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मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू, संवैधानिक मर्यादाओं को तोड़ता विपक्ष

पश्चिम बंगाल के साथ पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के पश्चात् जो तस्वीर निर्मित हुई है, वह कड़वाहट और मिठास दोनों का ही स्वाद दे रही है। विपक्ष के राजनीतिक दल जहाँ एक ओर तमिलनाडु और केरल के मनमाफिक परिणाम देखकर मिठास का स्वाद ले रहा है, वहीं पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम को सभी विपक्षी दल भाजपा की प्रायोजित जीत के रूप में प्रचारित करने का असंवैधानिक कार्य कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी को इस बार जनता ने विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है, लेकिन ममता बनर्जी कुर्सी से चिपके रहने के अंदाज में पराजय को स्वीकार करने का मानस नहीं बना पा रही हैं।
 
लोकतान्त्रिक मर्यादा के तहत उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी का त्याग करना चाहिए। लेकिन ममता बनर्जी ऐसा न करके एक प्रकार से लोक के निर्णय को ठेंगा दिखाने का कार्य कर रही हैं। खास बात यह है कि विपक्ष के कुछ अन्य दल भी तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी के इस कदम का समर्थन करती हुई लग रही हैं। लोकतंत्र में विरोध करने का सभी को अधिकार है, लेकिन यह विरोध संवैधानिक मर्यादायों के तहत ही होना चाहिए।

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देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है, ज़ब चुनाव में पराजित हो जाने के बाद मुख्यमंत्री अपना त्याग पत्र देने से मना कर रहा है, ममता बनर्जी का यह रवैया निश्चित ही जनमत के साथ विश्वासघात ही कहा जाएगा। लोकतंत्र का असली आशय यही होता है कि जनता अपने बीच में से अपने प्रतिनिधि चुनकर अपनी सरकार बनाती है। जनता ने जनादेश दे दिया है। विपक्ष को भी यह स्वीकार करना चाहिए। पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम यह संदेश प्रवाहित कर रहे हैं कि अब देश में तुष्टिकरण के दिन ख़त्म हो गए हैं। जनता भी ऐसा ही चाहती है। मजेदार तथ्य यह है कि बंगाल के चुनाव के साथ ही पांच राज्य असम, केरल, तमिलनाडु और पंडिचेरी में भी चुनाव हुए असम को छोड़ दिया जाए तो सभी राज्यों में परिणाम सत्ता के विरोध में ही आए, लेकिन सवाल यह है कि इन राज्यों के परिणाम पर कोई आरोप नहीं लगा रहा। इसके पीछे यही कारण माना जा रहा कि वहां भाजपा नहीं जीती। भाजपा की जीतना विपक्ष को कभी नहीं पचा। विपक्ष का व्यवहार ऐसा होता जा रहा है जैसे ये केवल सत्ता के लिए ही बने हैं। चुनाव में जय पराजय होती ही है, केवल एक को ही विजय मिलती है।

पश्चिम बंगाल के बारे में यह सभी जानते हैं कि ममता सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार चरम पर था। जनता भी इस भ्रष्टाचार से त्रस्त रही और प्रशासनिक अधिकारी भी। इसी के चलते तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के विरोध में एक राजनीतिक हवा बनी। भाजपा ने अपने प्रचार के दौरान ममता के भ्रष्टाचार को लेकर जमकर हमला बोला। इसके विपरीत विपक्ष के अन्य दल भी इन मुद्दों पर मुखर रहे। कांग्रेस ने सार्वजनिक रूप से ममता को निशाने पर लिया। इसका आशय स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में ममता सरकार के विरोध में लहर थी। दूसरी एक और प्रमुख बात यह भी है कि पश्चिम बंगाल में पिछले जितने भी चुनाव हुए, उनमें हिंसा के माध्यम से मतदाताओं को भयभीत करने का काम भी खुलेआम हुआ। ऐसा कोई भी चुनाव नहीं हुआ, जिसे हिंसा मुक्त कहा जा सकता हो। इस बार के विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने हिंसा मुक्त चुनाव करके दिखा दिया। इसी कारण आम मतदाता बिना किसी भय के मतदान केंद्र तक पहुँचने में सफल हुआ। इसी ने भाजपा की राह आसान की।

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत का एक बड़ा कारण यह भी माना जा रहा है कि वहां की मतदाता सूची से फर्जी नाम विलोपित किए गए। इन नामों में कई तो ऐसे थे, जो इस दुनिया में नहीं हैं। हालांकि यह एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है, इसलिए इसे खास मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। प्रति वर्ष मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने का क्रम चलता है। बंगाल का मामला बांग्लादेशी घुसपैठियों से जुडा था, इसलिए वहां एसआईआर जरुरी था। इससे जहाँ विदेशी मतदाता चुनाव में वोट का प्रयोग करने से वंचित हो गया, वहीं ऐसे मतदाता भी चुनाव में हिस्सा नहीं ले सके, जो फर्जी थे। उल्लेखनीय है कि पूर्व के चुनाव में यह वोट भी उपयोग में आते थे, इनके वोट कैसे पड़ते थे और कौन उंगली से बटन दबाता था, इसमें भले ही संदेह हो, लेकिन इसका आरोप तृणमूल के कार्यकर्ताओं पर ही लगते थे। इसी हिंसा को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने सुरक्षा बलों की तैनाती कराई। सुरक्षा बल केवल नागरिक सुरक्षा एवं भय मुक्त मतदान के लिए ही लगाया, लेकिन ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सहित विपक्ष के कई राजनीतिक दलों ने उनकी निष्ठा पर ही सवाल उठा दिए।
 
पश्चिम बंगाल के इस बार के चुनाव में ऐसे कई कारण रहे जो भाजपा की जीत और तृणमूल कांग्रेस की हार में काफी प्रभावी रहे। उसमें तृणमूल सरकार विरोधी लहर तो थी ही, साथ ही जो मुस्लिम वोट पूरा का पूरा तृणमूल को मिलता था, इस बार नहीं मिल सका। उसके पीछे मुसलमान नेताओं की सक्रियता रही। इस चुनाव में एक ओर ओवैसी की पार्टी मैदान में थी, वहीं हुमायूं कबीर ने एक नई पार्टी बनाकर ममता की परेशानी में बढ़ोत्तरी की। इस कारण मुसलमान वर्ग के वोट निश्चित ही विभाजित हो गए। इसके साथ ही राज्य का हिन्दू मतदाता कुछ ज्यादा सक्रियता के साथ मैदान में उतर आया। यह मतदाता निश्चित ही भाजपा के पक्ष में गया। इसलिए विपक्ष की ओर से यह कहना कि एसआईआर के कारण या चुनाव आयोग द्वारा भाजपा का साथ देने के आरोप प्रथम दृष्टि में ही तर्कहीन से लगते हैं। अब ममता बनर्जी को अपनी हार की समीक्षा करनी ही चाहिए, जो कमियां रही, उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

चुनाव परिणाम के बाद आरोप प्रत्यारोप का खेल जारी है। इसमें विपक्ष बिना प्रमाण के भाजपा और चुनाव आयोग पर आरोप लगा रहा है। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा विरोधी अन्य राजनीतिक दल जिस प्रकार के आरोप लगा रहे हैं, वह केवल जुबानी ही हैं। उसके पुख्ता प्रमाण किसी के पास नहीं हैं। ऐसी राजनीति न तो लोकतंत्र को सुरक्षित रख सकती है और न ही देश का भला कर सकती है। विपक्ष को सच को स्वीकार करने की मानसिकता बनानी होगी। हर बात के लिए नकारात्मक राय रखना विपक्ष की मजबूरी हो सकती है, लेकिन इसे स्वस्थ लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। जो अच्छा है उसे अच्छा कहना ही होगा। क्योंकि जनता जिस सच के साथ रहती है, विपक्ष को भी उसी सच के साथ ही चलना होगा। विपक्ष को यह भी समझना चाहिए कि आज देश का वातावरण परिवर्तित हो चुका है या हो रहा है। विपक्ष निश्चित रूप से सरकार पर आरोप लगाए, लेकिन जन भावना का अनादर करने से बचना होगा, नहीं तो जैसा पश्चिम बंगाल का परिणाम आया, वैसा अन्य राज्यों का भी आ सकता है।

- सुरेश हिंदुस्तानी 
वरिष्ठ पत्रकार

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भूत बंगला के मेकर्स पर नॉन पेमेंट के आरोप:दावा- वेंडर्स के 48 लाख रुपए बकाया, बालाजी टेलीफिल्म्स ने आरोपों को किया खारिज

कुछ वेंडर्स ने अक्षय कुमार स्टारर फिल्म भूत बंगला के मेकर्स पर पेमेंट न करने का आरोप लगाया है। दावा है कि वेंडर्स के फिल्म की प्रोडक्शन कंपनी बालाजी टेलीफिल्म्स पर 48 लाख रुपए बकाया हैं। ये दावे तब सामने आए हैं, जब एकता कपूर फिल्म की सक्सेस का जश्न मनाते हुए खुशी जाहिर कर रही हैं। मिड डे की रिपोर्ट के अनुसार, भूत बंगला में काम करने वाले वेंडर्स ने कहा है कि पेमेंट कई महीनों से फंसी हुई हैं। एक बार जब फिल्म रिलीज हो जाती हो तो पैसे मिलना मुश्किल होता है। 90 दिनों में पेमेंट क्लियर होना, अब पुरानी बात हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार, बालाजी टेलीफिल्म्स ने दो वेंडर्स की पेमेंट नहीं की है। प्रोडक्शन हाउस को एक वेंडर को 30 लाख और दूसरे वेंडर को 18 लाख रुपए देने हैं। कई महीनों से अपने 18 लाख का इंतजार कर रहे एक वेंडर ने नाराजगी जाहिर कर कहा है कि ऐसी बड़ी बजट की फिल्मों में ऐसा होना स्थिति के और खराब होने का संकेत है। राइटर ने भी लगाए नॉन पेमेंट के आरोप वेंडर्स के अलावा फिल्म के राइटर प्रांजल कृपलानी ने भी प्रोड्यूसर आलोक कुमार चौबे और संजय गुप्ता को 50 हजार रुपए की पेमेंट रोकने पर लीगल नोटिस भेजा था। पोर्टल से बात करते हुए एक क्रू मेंबर ने ये भी कहा है कि जनवरी में भोपाल में हुई शूटिंग के समय प्रोड्यूसर के पास फंड कम पड़ गया था। तब उन्हें जिन होटलों में ठहराया गया था, वहां की भी पेमेंट लंबे समय तक नहीं हो सकी, जिससे क्रू को पेमेंट पूरी होने तक वहीं रोककर रखा गया था। रिपोर्ट में बालाजी टेलीफिल्म्स के हवाले से वेंडर्स के इन दावों को खारिज किया गया है। प्रोडक्शन टीम का कहना है कि सिर्फ भूत बंगला ही नहीं बल्कि प्रोडक्शन के सभी प्रोजेक्ट्स से जुड़े लोगों की कॉन्ट्रैक्ट में लिखी गई पेमेंट क्लियर हो चुकी है। बॉक्स ऑफिस पर भूत बंगला ने कमाए 232 करोड़ अक्षय कुमार स्टारर फिल्म भूत बंगला 17 अप्रैल को सिनेमाघरों में रिलीज हुई है। इस फिल्म ने अब तक वर्ल्डवाइड 232 करोड़ का कलेक्शन कर लिया है। हाल ही में फिल्म की प्रोड्यूसर एकता कपूर ने अक्षय कुमार और प्रियदर्शन के साथ तस्वीरें शेयर कर उन्हें इस प्रोजेक्ट की सक्सेस का श्रेय देते हुए धन्यवाद कहा है।

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दोस्ती से बढ़कर है ये रिश्ता! पुराने साथी शपूर जादरान का हाल जानने अस्पताल पहुंचे मोहम्मद नबी और राशिद खान, दुआओं में झुका पूरा अफगानिस्तान

अफगानिस्तान क्रिकेट टीम के पूर्व तेज गेंदबाज शपूर जादरान का ग्रेटर नोएडा के एक अस्पताल में इलाज चल रहा है. जादरान एक दुर्लभ बीमारी से जूझ रहे हैं. जादरान के लिए पूरा अफगानिस्तान दुआ मांग रही है. इसी बीच उनके पुराने साथी मोहम्मद नबी और राशिद खान उनसे मिलने अस्पताल पहुंचे. Thu, 14 May 2026 09:26:19 +0530

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