पांच दिनों की जद्दोजहद के बाद विजय थलपति को मिला समर्थन, आखिर कहां फंस रहा था पेंच?
विजय थलपति की पार्टी टीवीके का 120 विधायकों का समर्थन मिल चुका है. अब उन्होंने चेन्नई में राज्यपाल से मुलाकात करके सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है. अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी टीवीके (TVK) की पार्टी को 107 सीटें मिली हैं. इसके बाद उन्हें बाहर से 13 सीटों का समर्थन मिल चुका है.
विजय को सरकार बनाने का निमंत्रण
आपको बता दें कि इससे पहले विजय का मामला बहुमत पर अटक गया था. तमिलनाडु विधानसभा में बहुमत को लेकर 118 विधायकों का समर्थन जरूरी है.टीवीके के पास 107 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस, CPI और CPM का समर्थन मिलने के बाद यह संख्या 116 तक पहुंच जाएगी. विजय को उम्मीद थी कि VCK और IUML के समर्थन के बाद रास्ता साफ हो सकेगा. मगर अंतिम समय में तस्वीर पूरी तरह से बदल गई है. IUML ने साफ कहा कि अब भी डीएमके गठबंधन के साथ खड़ी है. उसने टीवीके को समर्थन नहीं दिया. वहीं VCK ने तुरंत समर्थन पत्र को देने के बजाय बैठक बुलाकर निर्णय टाल दिया. इस वजह से राज्यपाल ने विजय को सरकार बनाने का निमंत्रण देने से मना कर दिया है.
समर्थन को लेकर सस्पेंस बढ़ाया
राजनीतिक गलियारों में सबसे अधिक चर्चा VCK के रुख पर है. ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि पार्टी ने समर्थन के बदले सत्ता में हिस्सेदारी और डिप्टी सीएम के पद जैसी शर्तों को तय किया गया है. हालांकि आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है. वहीं दूसरी ओर टीवीके नेताओं का दावा है कि उन्हें जल्द जरूरी समर्थन मिल सकता है.
इस बीच एक और विवाद तब और खड़ा हो गया जब एएमएमके विधायक के समर्थन पत्र को लेकर फर्जीवाड़े के आरोप लगाए गए. पार्टी प्रमुख टीटीवी दिनाकरन ने पुलिस को शिकायत देकर ऐसा दावा किया कि टीवीके ने गलत दस्तावेज पेश किए. इसके बाद राजनीतिक माहौल काफी गरमा गया.
‘मुझे SI नहीं बनना…’, पढ़ाई के लिए दिल्ली पुलिस के अफसर ने खुद मांगा डिमोशन
नई दिल्ली: आमतौर पर पुलिस विभाग में हर अधिकारी प्रमोशन पाकर ऊंचे पद तक पहुंचने का सपना देखता है. सालों की मेहनत, फील्ड ड्यूटी और सीनियरिटी के बाद सब-इंस्पेक्टर (SI) का पद मिलना गर्व की बात मानी जाती है. लेकिन दिल्ली पुलिस में एक ऐसा मामला सामने आया है जो इस सोच को पूरी तरह उलट देता है. एक सब-इंस्पेक्टर ने खुद ही डिमोशन मांग लिया. उनका नाम मनीष है. उन्होंने साफ-साफ कहा- “मुझे सब-इंस्पेक्टर नहीं बनना, मैं वापस कांस्टेबल बनना चाहता हूं.”
पढ़ाई की लगन ने बदला फैसला
मनीष पढ़ाई में बेहद तेज और महत्वाकांक्षी हैं. वे आगे की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना चाहते थे, लेकिन सब-इंस्पेक्टर बनने के बाद उनकी जिम्मेदारियां इतनी बढ़ गईं कि पढ़ाई के लिए समय ही नहीं बच पा रहा था. जांच, रिपोर्ट लिखना, कोर्ट ड्यूटी, कानून व्यवस्था संभालना और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश - इन सबके बीच व्यक्तिगत जीवन और अध्ययन लगभग नामुमकिन हो गया था. आखिरकार उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को प्रार्थना पत्र सौंप दिया और स्पष्ट रूप से डिमोशन की मांग कर दी.
विभाग भी हैरान, फिर मंजूरी
जब यह मामला उत्तर-पूर्वी दिल्ली जिले तक पहुंचा, तो शुरू में अधिकारी स्तब्ध रह गए. पुलिस में डिमोशन की मांग शायद ही कभी देखने को मिलती है. अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (DCP) संदीप लांबा ने पूरी जांच और प्रक्रिया के बाद मनीष की अर्जी को मंजूरी दे दी. उन्हें दोबारा कांस्टेबल के पद पर तैनात कर दिया गया. यह फैसला पूरे दिल्ली पुलिस विभाग में चर्चा का विषय बन गया. सोशल मीडिया पर भी लोग इस अनोखे कदम पर बात कर रहे हैं.
पद से ज्यादा महत्व दिया भविष्य को
मनीष का यह फैसला कई मायनों में अनोखा और साहसिक है. आज के दौर में जहां लोग बेहतर सैलरी, बड़े पद और प्रतिष्ठा के लिए हर तरह की कुर्बानी देने को तैयार रहते हैं, वहां मनीष ने पद और पावर से ऊपर अपनी पढ़ाई, भविष्य और मानसिक शांति को तरजीह दी. वे इस बात के जीवंत उदाहरण बन गए कि सफलता का मापदंड हर किसी के लिए अलग हो सकता है. किसी के लिए बड़ा ओहदा सफलता है, तो किसी के लिए अपने सपनों को पूरा करने का समय.
वर्क-लाइफ बैलेंस का बड़ा संदेश
यह घटना पुलिस जैसी हाई-प्रेशर जॉब में वर्क-लाइफ बैलेंस की अहमियत पर भी सवाल उठाती है. लंबी ड्यूटी, अनिश्चित कार्य घंटे और लगातार तनाव कई पुलिसकर्मियों के निजी जीवन और स्वास्थ्य को प्रभावित करता है. मनीष का कदम उन हजारों युवाओं और कर्मचारियों के लिए प्रेरणा बन सकता है जो अपने करियर और व्यक्तिगत विकास के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं. कई लोग इस फैसले को “साहसिक” और “प्रेरणादायक” बता रहे हैं. कुछ इसे पागलपन भी कह रहे हैं, लेकिन ज्यादातर इसे ईमानदार और साहसी कदम मान रहे हैं.
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