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डिजिटल तकनीक के साथ बेहतर प्रवासन : मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने दी भारत की नई पहल की जानकारी

संयुक्त राष्ट्र, 8 मई (आईएएनएस)। विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने कहा है कि भारत अब डिजिटल तकनीक के जरिए प्रवासन की प्रक्रिया को और बेहतर बना रहा है। इस नई व्यवस्था के तहत विदेश में नौकरी पाने की प्रक्रिया, जाने से पहले की तैयारी, सही काम का चयन और वतन वापसी जैसे सभी चरणों को एक ही मंच पर लाने का प्रयास किया गया है।

भारत के यूएन मिशन ने गुरुवार को ‘माइग्रेशन गवर्नेंस में डिजिटल इनोवेशन का फायदा उठाना’ थीम पर आधारित कार्यक्रम का आयोजन किया। कार्यक्रम में विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने कहा कि भारत का ई-माइग्रेट प्लेटफॉर्म दिखाता है कि डिजिटल टेक्नोलॉजी अब केवल मददगार उपकरण नहीं रह गई हैं, बल्कि वे गवर्नेंस को नया आकार दे रही हैं।

दूसरे इंटरनेशनल माइग्रेशन रिव्यू फोरम के मौके पर हुए “माइग्रेशन गवर्नेंस में डिजिटल इनोवेशन का फायदा उठाना” कार्यक्रम के दौरान भारत के ई-माइग्रेट सिस्टम को प्रस्तुत किया गया।

उन्होंने कहा कि भारत का समग्र दृष्टिकोण यह मानता है कि प्रवासन केवल लोगों की आवाजाही तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें प्रस्थान से पहले की तैयारी, सुरक्षित यात्रा, सम्मानजनक रोजगार और अंततः वापसी व पुनर्समावेशन भी शामिल हैं।

सिंह ने कहा कि ई-माइग्रेट सिस्टम एम्प्लॉयर्स और रिक्रूटर्स के सत्यापन से शुरू होता है, जिससे संभावित कर्मचारियों को जानकारी की पुष्टि करने और धोखाधड़ी से बचने में मदद मिलती है। इससे हायरिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता आती है।

उन्होंने कहा, “फिलहाल ई-माइग्रेट पोर्टल पर लगभग 2,98,000 रजिस्टर्ड विदेशी एम्प्लॉयर्स और 2,457 सक्रिय रिक्रूटिंग एजेंट्स पंजीकृत हैं।” उन्होंने बताया कि भर्ती प्रक्रिया भी पोर्टल के माध्यम से की जा सकती है।

यह प्लेटफॉर्म वर्कर्स को स्किलिंग, रोजगार, डॉक्यूमेंटेशन, सर्विस डिलीवरी और मल्टीलिंगुअल इंटरफेस जैसी सुविधाएं प्रदान करता है। इसके साथ ही इसमें ऑनलाइन शिकायत निवारण और बिना किसी अतिरिक्त खर्च के पेमेंट ट्रांसफर जैसी सेवाएं भी इंटीग्रेटेड हैं।

भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने कहा कि भारत अपने बनाए डिजिटल टूल्स, जैसे ई-माइग्रेट, सभी को उपलब्ध करा रहा है, क्योंकि देश साउथ-साउथ कोऑपरेशन के लिए प्रतिबद्ध है।

उन्होंने कहा, “हमने इन डिजिटल पब्लिक प्लेटफॉर्म्स का पेटेंट नहीं कराया है। इन्हें मुफ्त में उपलब्ध कराया गया है और ओपन-सोर्स फॉर्मेट में इंटरनेट पर डाला गया है, ताकि हमारे दोस्त और साझेदार अपनी जरूरतों के अनुसार इन्हें अपना सकें।”

उन्होंने आगे कहा, यह न केवल हमारे द्विपक्षीय बल्कि हमारे यूएन-मीडिएटेड साउथ-साउथ कोऑपरेशन फ्रेमवर्क का भी एक हिस्सा है, जो ग्लोबल साउथ में हमारे दोस्तों और साझेदारों की मदद करने के लिए हमारे पास है। हरीश ने कहा कि रिफ्यूजी और माइग्रेंट के बीच अंतर बनाए रखना चाहिए।

इक्वाडोर के ह्यूमन मोबिलिटी के वाइस मिनिस्टर, सॉल पैकुरुकू ने कहा कि उनके देश ने अपनी 100 फीसदी कॉन्सुलर सर्विस ऑनलाइन कर दी हैं और लेबर माइग्रेशन साइकिल में डिजिटल प्लेटफॉर्म की इंटरऑपरेबिलिटी को कोऑर्डिनेट करने में भारत के अनुभव से सीखेंगे।

इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन के सीनियर डायरेक्टर किम एलिंग ने कहा, “भारत दिखा रहा है कि तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ सिस्टम को मॉडर्न बनाने के लिए ही नहीं, बल्कि लोगों की बेहतर सुरक्षा के लिए भी कैसे किया जा सकता है।” उन्होंने कहा कि ई-माइग्रेट ऑपरेशन का स्केल अद्भुत है।

सऊदी अरब के स्थायी प्रतिनिधि अब्दुलअजीज अलवासील ने कहा, “एक बड़े डेस्टिनेशन देश के तौर पर, जहां बड़ी और अलग-अलग तरह के एक्सपैट्रिएट रहते हैं, और 10 मिलियन से ज्यादा विदेशी वर्कर इसके लेबर मार्केट में योगदान देते हैं, किंगडम लेबर मोबिलिटी से जुड़े मौकों और जिम्मेदारियों, दोनों को पहचानता है।”

उन्होंने कहा, “सऊदी अरब ने अपने लेबर मार्केट को आधुनिक बनाने और माइग्रेशन गवर्नेंस फ्रेमवर्क को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय परिवर्तन कार्यक्रम के तहत कई सुधार किए हैं।”

उन्होंने कहा कि इसका किवा प्लेटफॉर्म लेबर से जुड़ी सर्विसेज के लिए एक सेंट्रल इंटरफेस है, जिसमें कॉन्ट्रैक्ट ऑथेंटिकेशन, जॉब मोबिलिटी, वीजा जारी करना, प्रोफिशिएंट चेंज और कम्प्लायंस मॉनिटरिंग शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि यह वर्कर्स, एम्प्लॉयर्स और रेगुलेटर्स को एक यूनिफाइड डिजिटल इकोसिस्टम के जरिए जोड़ता है।

--आईएएनएस

केके/एएस

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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World Thalassemia Day 2026: सिर्फ खून की बीमारी नहीं है थैलेसीमिया! बच्चों और युवाओं के दिमाग पर भी डालती है असर

World Thalassemia Day 2026: थैलेसीमिया को आमतौर पर खून से संबंधित बीमारी माना जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता है. लंबे समय तक थैलेसीमिया से जूझ रहे कई मरीजों में याददाश्त कमजोर होना, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी, मानसिक थकान और पढ़ाई या काम में फोकस की कमी जैसी समस्याएं भी देखने को मिल सकती हैं. खासतौर पर बच्चों और किशोरों में यह समस्या आम होती है. इससे उनके मानसिक विकास और रोजमर्रा की जिंदगी पर गहरा असर पड़ता है.

आज है वर्ल्ड थैलेसीमिया डे

आज यानी 8 मई 2026 को विश्व थैलेसीमिया दिवस मनाया जा रहा है. इस दिन का मुख्य उद्देश्य थैलेसीमिया रोग के बारे में जागरूकता बढ़ाना है. इस अनुवांशिक बीमारी की रोकथाम के लिए समाज को प्रोत्साहित करना है. यह दिन TIF, थैलेसीमिया इंटरनेशनल फेडरेशन द्वारा वर्ष 1994 में शुरू किया गया था. इस साल की थीम है- Hidden No More: Finding the Undiagnosed, Supporting the Unseen.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

मैरिंगो एशिया इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो एंड स्पाइन (MAIINS) के चेयरमैन डॉ. प्रवीण गुप्ता के अनुसार थैलेसीमिया को केवल ब्लड डिसऑर्डर समझना गलत होगा. अगर मरीज की नियमित मॉनिटरिंग और सही इलाज न हो तो इसका असर दिमाग की कार्यक्षमता पर भी पड़ सकता है. कई मरीजों में ब्रेन फॉग, ध्यान की कमी और मानसिक थकान जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं.

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थैलेसीमिया क्या है?

Thalassemia एक आनुवंशिक बीमारी है. यह माता-पिता से बच्चों को होती है. इस रोग में शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा कम हो जाती है. ऐसे मरीजों को बार-बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है. यदि माता-पिता में से किसी को माइनर थैलेसीमिया है तो पूरी संभावना है कि बच्चे को थैलेसीमिया का गंभीर प्रकार हो सकता है.

थैलेसीमिया से क्यों प्रभावित होता है दिमाग?

थैलेसीमिया में शरीर पर्याप्त मात्रा में हेल्दी रेड ब्लड सेल्स नहीं बना पाता है. इसका असर हमारे शरीर में ऑक्सीजन सप्लाई पर पड़ता है. दिमाग को सही तरीके से काम करने के लिए लगातार ऑक्सीजन और पोषण की जरूरत होती है. जब यह सप्लाई प्रभावित होती है, तो धीरे-धीरे मानसिक क्षमता पर असर पड़ सकता है. डॉ. गुप्ता बताते हैं कि लंबे समय तक एनीमिया रहने से बच्चों में सीखने की क्षमता, ध्यान केंद्रित करने की शक्ति और याददाश्त प्रभावित हो सकती है. कई बार मरीज पढ़ाई में कमजोर महसूस करने लगते हैं या चीजों को जल्दी भूलने लगते हैं.

आयरन ओवरलोड भी बन सकता है बड़ा कारण

थैलेसीमिया मरीजों को अक्सर बार-बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है. लगातार ट्रांसफ्यूजन की वजह से शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ सकती है, जिसे आयरन ओवरलोड कहा जाता है. विशेषज्ञों के मुताबिक शरीर में अतिरिक्त आयरन सिर्फ लिवर और हार्ट ही नहीं बल्कि दिमाग को भी प्रभावित कर सकता है. यह ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ाता है, जिससे न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है. डॉ. गुप्ता कहते हैं कि यदि आयरन लेवल को समय पर कंट्रोल न किया जाए तो मरीजों में मानसिक थकान, चिड़चिड़ापन और कॉग्निटिव फंक्शन में गिरावट देखने को मिल सकती है.

किन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?

थैलेसीमिया मरीजों और उनके परिवारों को कुछ संकेतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए-

  • बार-बार भूलना
  • पढ़ाई या काम में ध्यान न लगना
  • लगातार थकान महसूस होना
  • मानसिक सुस्ती या ब्रेन फॉग
  • मूड में बदलाव
  • चिड़चिड़ापन या चिंता
  • सिरदर्द और कमजोरी

विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार इन लक्षणों को सामान्य कमजोरी या तनाव समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि यह दिमाग पर पड़ रहे असर का संकेत हो सकते हैं.

बच्चों में ज्यादा जरूरी है निगरानी

डॉक्टरों के अनुसार थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों में न्यूरोलॉजिकल मॉनिटरिंग बेहद जरूरी है क्योंकि यह उम्र दिमागी विकास के लिए महत्वपूर्ण होती है. यदि बच्चा पढ़ाई में पिछड़ने लगे, बार-बार चीजें भूलने लगे या उसके व्यवहार में बदलाव दिखे तो तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए. डॉ. गुप्ता बताते हैं कि समय पर इलाज, नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन और आयरन कंट्रोल थेरेपी से इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

मानसिक स्वास्थ्य भी होता है प्रभावित

थैलेसीमिया जैसी लंबी बीमारी केवल शरीर ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालती है. बार-बार अस्पताल जाना, इलाज का तनाव और सामान्य जीवन से अलग महसूस करना मरीजों में एंग्जायटी और डिप्रेशन का कारण बन सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि परिवार का सहयोग, काउंसलिंग और सकारात्मक माहौल मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं.

कैसे रखें दिमाग को स्वस्थ?

डॉ. प्रवीण गुप्ता के अनुसार कुछ जरूरी सावधानियां थैलेसीमिया मरीजों में दिमागी समस्याओं के खतरे को कम कर सकती हैं-

  1. नियमित हेल्थ चेकअप और न्यूरोलॉजिकल मॉनिटरिंग
  2. आयरन लेवल की समय-समय पर जांच
  3. संतुलित और पोषण से भरपूर डाइट
  4. पर्याप्त नींद और फिजिकल एक्टिविटी
  5. मानसिक तनाव को कम करना
  6. डॉक्टर की सलाह के अनुसार इलाज जारी रखना

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