काठमांडू, 5 मई (आईएएनएस)। नेपाल सरकार ने मंगलवार को एक नई ऑनलाइन सेवा शुरू की है, जिसके तहत जमीन के रास्ते से नेपाल आने वाले विदेशी पर्यटक अब अपने वाहनों का रजिस्ट्रेशन और फीस का भुगतान डिजिटल तरीके से कर सकेंगे।
इस कदम का मकसद भारत और अन्य देशों से आने वाले उन पर्यटकों की सुविधा बढ़ाना है, जो सड़क मार्ग से नेपाल की यात्रा करते हैं।
नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले ने इस सिस्टम की शुरुआत की, जिसे कस्टम विभाग ने लागू किया है।
अब भारतीय पर्यटक और अन्य विदेशी यात्री, जो अपने निजी वाहनों से नेपाल आते हैं, वे घर बैठे ही ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं और जरूरी फीस भी जमा कर सकते हैं।
पहले ऐसे वाहनों को सीमा (कस्टम) पर जाकर अस्थायी परमिट लेना पड़ता था।
इसके अलावा, यात्रियों को अपने ठहरने के दौरान परमिट रिन्यू कराने के लिए फिर से कस्टम ऑफिस जाना पड़ता था, और समय पर न करने पर जुर्माना भी लग सकता था। अब यह ऑनलाइन हो गया है, जिससे यात्रा और आसान हो जाएगी।
इस सेवा की शुरुआत करते हुए वित्त मंत्री वागले ने कहा कि यह सिस्टम पर्यटकों को सीमा पर होने वाली परेशानियों से बचाएगा।
उन्होंने कहा, “यह पहल सरकार की अच्छे शासन और बेहतर सार्वजनिक सेवा देने की प्रतिबद्धता का हिस्सा है। हम चाहते हैं कि पर्यटकों को कोई दिक्कत न हो और उन्हें तेज और अच्छी सेवा मिले।”
कस्टम विभाग के महानिदेशक श्याम प्रसाद मैनाली ने बताया कि नेपाल में विदेशी पर्यटक वाहनों का परमिट सिस्टम अब पूरी तरह डिजिटल हो गया है।
उन्होंने कहा कि अब यात्री खुद ऑनलाइन अपने वाहन की जानकारी भर सकते हैं, जिससे प्रक्रिया ज्यादा पारदर्शी और आसान हो गई है।
पर्यटक वाहन ऑनलाइन या बैंक काउंटर के जरिए जरूरी फीस जमा कर सकते हैं। जो लोग ऑनलाइन भुगतान करेंगे, उन्हें ईमेल पर एक क्यूआर कोड मिलेगा, जिसे सीमा पर दिखाकर नेपाल में प्रवेश किया जा सकेगा।
विभाग के अनुसार, क्यूआर कोड वाले वाहन बिना किसी परेशानी के अपनी यात्रा कर सकते हैं। अगर परमिट की समय-सीमा खत्म हो जाती है, तो यात्री नेपाल के अंदर रहते हुए भी ऑनलाइन इसे बढ़ा सकते हैं।
इस सेवा का इस्तेमाल करने के लिए उपयोगकर्ताओं को कस्टम विभाग की वेबसाइट पर जाना होगा, “हमारी सेवाएं” सेक्शन में जाकर “टीआईवी” मॉड्यूल चुनना होगा और वहां अपनी जानकारी भरनी होगी।
प्रक्रिया पूरी होने के बाद क्यूआर कोड जारी किया जाएगा, जिसका उपयोग फीस भुगतान और प्रवेश के लिए किया जाएगा।
विभाग ने बताया कि यह टेम्पररी इम्पोर्ट ऑफ व्हीकल (टीआईवी) मॉड्यूल नेपाल के नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम के तहत बनाया गया है, ताकि विदेशी यात्रियों के लिए देश में प्रवेश आसान हो सके।
--आईएएनएस
एवाई/डीकेपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
Continue reading on the app
एआई के क्षेत्र में तेजी से हो रहे विकास के बीच एक नया मॉडल वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। यह है एन्थ्रोपिक द्वारा विकसित मॉडल मिथोस। यह उन्नत प्रणाली जहां साइबर सुरक्षा के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, वहीं इसके संभावित दुरुपयोग को लेकर सरकारों, बैंकों और विशेषज्ञों के बीच गंभीर आशंकाएं भी उभर रही हैं। हम आपको बता दें कि मिथोस एक ऐसा एआई मॉडल है जो कंप्यूटर प्रणालियों में मौजूद छिपी कमजोरियों को पहचानने और उनका फायदा उठाने में सक्षम बताया गया है। कंपनी के अनुसार यह उन त्रुटियों को भी खोज सकता है जिनके बारे में सॉफ्टवेयर बनाने वालों को खुद जानकारी नहीं होती। इन्हें जीरो डे कमजोरियां कहा जाता है, क्योंकि इनके सामने आने के बाद सुधार का समय नहीं मिल पाता। मिथोस की यही क्षमता इसे अत्यंत शक्तिशाली और साथ ही खतरनाक बनाती है।
कंपनी ने सात अप्रैल को इस मॉडल के अस्तित्व की घोषणा की थी, लेकिन इसे सार्वजनिक उपयोग के लिए जारी करने से साफ इंकार कर दिया। कारण स्पष्ट है कि यदि यह तकनीक गलत हाथों में चली गई तो वैश्विक साइबर सुरक्षा को गंभीर खतरा हो सकता है। हालांकि, सीमित रूप से कुछ कंपनियों और बैंकों को इसके परीक्षण की अनुमति दी गई है ताकि वह इसके जोखिमों को समझ सकें।
हाल ही में स्थिति तब और गंभीर हो गई जब यह सामने आया कि कुछ अनधिकृत लोगों ने इस मॉडल तक पहुंच हासिल कर ली थी। यह घटना इस बात का संकेत है कि इतने संवेदनशील उपकरण को पूरी तरह नियंत्रित रखना कितना कठिन है। इससे तकनीकी कंपनियों की क्षमता पर भी सवाल उठे हैं कि वह अपने सबसे जोखिमपूर्ण उत्पादों को कितनी सुरक्षित रख सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार मिथोस केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं बल्कि एआई की तेजी से बढ़ती शक्ति का संकेत है। पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में जिस गति से प्रगति हुई है, उससे यह आशंका भी बढ़ी है कि अन्य कंपनियां भी जल्द ही ऐसे मॉडल विकसित कर सकती हैं। इससे साइबर हमलों और बचाव के बीच एक नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है।
ब्रिटेन के एआई सुरक्षा संस्थान ने भी मिथोस का परीक्षण किया है और इसे पहले के मॉडलों की तुलना में अधिक सक्षम और खतरनाक बताया है। यह मॉडल कई चरणों वाले साइबर हमलों का अनुकरण करने में सफल रहा है और बिना मानवीय निर्देश के कमजोरियों की पहचान कर सकता है। हालांकि, यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह अत्यधिक सुरक्षित प्रणालियों पर कितना प्रभावी होगा। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस मॉडल को लेकर जितनी चर्चा हो रही है, उसमें कुछ हद तक अतिशयोक्ति भी शामिल हो सकती है। उनका कहना है कि कई सस्ते मॉडल भी कुछ कमजोरियों की पहचान करने में सक्षम हैं। इसके अलावा अधिकांश साइबर हमले अब भी साधारण कमजोरियों जैसे कमजोर पासवर्ड या पुराने सॉफ्टवेयर के कारण होते हैं।
फिर भी, मिथोस के संभावित प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में इसका असर बहुत गंभीर हो सकता है। यदि इस तरह की तकनीक का दुरुपयोग हुआ तो भुगतान प्रणाली ठप हो सकती है, लोगों के वेतन और लेनदेन रुक सकते हैं, और व्यापक आर्थिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। इसी कारण अमेरिका में भी इस मॉडल को लेकर उच्च स्तर पर चर्चा हो रही है। वहां की सरकार ने इसके उपयोग और पहुंच को लेकर सख्त रुख अपनाया है और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला माना जा रहा है। प्रारंभिक योजना के तहत सीमित संस्थाओं को ही इसकी पहुंच दी गई है और इसके विस्तार को लेकर भी सावधानी बरती जा रही है।
भारत में भी इस मुद्दे ने तेजी से ध्यान आकर्षित किया है। देश को इस मॉडल के शुरुआती परीक्षण से बाहर रखा गया, जिससे नीति निर्माताओं और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच चिंता बढ़ गई। सरकार अब अमेरिका और कंपनी के साथ बातचीत कर रही है ताकि भारतीय कंपनियों को भी इस तकनीक तक उचित पहुंच मिल सके। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस विषय को अत्यंत गंभीर बताते हुए कहा है कि यह साइबर चुनौती बहुत बड़ी हो सकती है। सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, बैंकों और सुरक्षा एजेंसियों के साथ उच्च स्तरीय बैठकें की हैं। उद्देश्य यह है कि देश के महत्वपूर्ण ढांचे जैसे बैंकिंग नेटवर्क, दूरसंचार और बिजली प्रणाली को सुरक्षित रखा जा सके।
भारत की चिंता केवल पहुंच तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य के जोखिमों को लेकर भी है। यदि अन्य कंपनियां भी इसी तरह के मॉडल विकसित करती हैं और उनका वितरण असमान रहता है, तो कुछ देशों की सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है। यही कारण है कि भारत समान अवसर और संतुलित नीति की मांग कर रहा है।
इसके साथ ही, देश की साइबर सुरक्षा एजेंसियों को भी सतर्क कर दिया गया है। उन्हें संवेदनशील प्रणालियों की जांच करने और सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी तकनीक दोधारी तलवार की तरह है, इसका उपयोग सुरक्षा बढ़ाने के लिए भी किया जा सकता है और हमलों के लिए भी।
बहरहाल, मिथोस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब केवल सुविधा का साधन नहीं रही, बल्कि यह वैश्विक सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और नीति निर्माण का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि दुनिया इस नई तकनीकी शक्ति के साथ संतुलन कैसे बनाती है ताकि इसका लाभ भी मिले और जोखिम भी नियंत्रित रहें।
-नीरज कुमार दुबे
Continue reading on the app