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Mythos AI चमत्कारी भी है और विनाशकारी भी, इसके प्रभावों को लेकर दुनियाभर की सरकारों की नींद उड़ गई है

एआई के क्षेत्र में तेजी से हो रहे विकास के बीच एक नया मॉडल वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। यह है एन्थ्रोपिक द्वारा विकसित मॉडल मिथोस। यह उन्नत प्रणाली जहां साइबर सुरक्षा के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, वहीं इसके संभावित दुरुपयोग को लेकर सरकारों, बैंकों और विशेषज्ञों के बीच गंभीर आशंकाएं भी उभर रही हैं। हम आपको बता दें कि मिथोस एक ऐसा एआई मॉडल है जो कंप्यूटर प्रणालियों में मौजूद छिपी कमजोरियों को पहचानने और उनका फायदा उठाने में सक्षम बताया गया है। कंपनी के अनुसार यह उन त्रुटियों को भी खोज सकता है जिनके बारे में सॉफ्टवेयर बनाने वालों को खुद जानकारी नहीं होती। इन्हें जीरो डे कमजोरियां कहा जाता है, क्योंकि इनके सामने आने के बाद सुधार का समय नहीं मिल पाता। मिथोस की यही क्षमता इसे अत्यंत शक्तिशाली और साथ ही खतरनाक बनाती है।
 
कंपनी ने सात अप्रैल को इस मॉडल के अस्तित्व की घोषणा की थी, लेकिन इसे सार्वजनिक उपयोग के लिए जारी करने से साफ इंकार कर दिया। कारण स्पष्ट है कि यदि यह तकनीक गलत हाथों में चली गई तो वैश्विक साइबर सुरक्षा को गंभीर खतरा हो सकता है। हालांकि, सीमित रूप से कुछ कंपनियों और बैंकों को इसके परीक्षण की अनुमति दी गई है ताकि वह इसके जोखिमों को समझ सकें।

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हाल ही में स्थिति तब और गंभीर हो गई जब यह सामने आया कि कुछ अनधिकृत लोगों ने इस मॉडल तक पहुंच हासिल कर ली थी। यह घटना इस बात का संकेत है कि इतने संवेदनशील उपकरण को पूरी तरह नियंत्रित रखना कितना कठिन है। इससे तकनीकी कंपनियों की क्षमता पर भी सवाल उठे हैं कि वह अपने सबसे जोखिमपूर्ण उत्पादों को कितनी सुरक्षित रख सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार मिथोस केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं बल्कि एआई की तेजी से बढ़ती शक्ति का संकेत है। पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में जिस गति से प्रगति हुई है, उससे यह आशंका भी बढ़ी है कि अन्य कंपनियां भी जल्द ही ऐसे मॉडल विकसित कर सकती हैं। इससे साइबर हमलों और बचाव के बीच एक नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है।

ब्रिटेन के एआई सुरक्षा संस्थान ने भी मिथोस का परीक्षण किया है और इसे पहले के मॉडलों की तुलना में अधिक सक्षम और खतरनाक बताया है। यह मॉडल कई चरणों वाले साइबर हमलों का अनुकरण करने में सफल रहा है और बिना मानवीय निर्देश के कमजोरियों की पहचान कर सकता है। हालांकि, यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह अत्यधिक सुरक्षित प्रणालियों पर कितना प्रभावी होगा। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस मॉडल को लेकर जितनी चर्चा हो रही है, उसमें कुछ हद तक अतिशयोक्ति भी शामिल हो सकती है। उनका कहना है कि कई सस्ते मॉडल भी कुछ कमजोरियों की पहचान करने में सक्षम हैं। इसके अलावा अधिकांश साइबर हमले अब भी साधारण कमजोरियों जैसे कमजोर पासवर्ड या पुराने सॉफ्टवेयर के कारण होते हैं।

फिर भी, मिथोस के संभावित प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में इसका असर बहुत गंभीर हो सकता है। यदि इस तरह की तकनीक का दुरुपयोग हुआ तो भुगतान प्रणाली ठप हो सकती है, लोगों के वेतन और लेनदेन रुक सकते हैं, और व्यापक आर्थिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। इसी कारण अमेरिका में भी इस मॉडल को लेकर उच्च स्तर पर चर्चा हो रही है। वहां की सरकार ने इसके उपयोग और पहुंच को लेकर सख्त रुख अपनाया है और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला माना जा रहा है। प्रारंभिक योजना के तहत सीमित संस्थाओं को ही इसकी पहुंच दी गई है और इसके विस्तार को लेकर भी सावधानी बरती जा रही है।

भारत में भी इस मुद्दे ने तेजी से ध्यान आकर्षित किया है। देश को इस मॉडल के शुरुआती परीक्षण से बाहर रखा गया, जिससे नीति निर्माताओं और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच चिंता बढ़ गई। सरकार अब अमेरिका और कंपनी के साथ बातचीत कर रही है ताकि भारतीय कंपनियों को भी इस तकनीक तक उचित पहुंच मिल सके। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस विषय को अत्यंत गंभीर बताते हुए कहा है कि यह साइबर चुनौती बहुत बड़ी हो सकती है। सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, बैंकों और सुरक्षा एजेंसियों के साथ उच्च स्तरीय बैठकें की हैं। उद्देश्य यह है कि देश के महत्वपूर्ण ढांचे जैसे बैंकिंग नेटवर्क, दूरसंचार और बिजली प्रणाली को सुरक्षित रखा जा सके।

भारत की चिंता केवल पहुंच तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य के जोखिमों को लेकर भी है। यदि अन्य कंपनियां भी इसी तरह के मॉडल विकसित करती हैं और उनका वितरण असमान रहता है, तो कुछ देशों की सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है। यही कारण है कि भारत समान अवसर और संतुलित नीति की मांग कर रहा है।

इसके साथ ही, देश की साइबर सुरक्षा एजेंसियों को भी सतर्क कर दिया गया है। उन्हें संवेदनशील प्रणालियों की जांच करने और सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी तकनीक दोधारी तलवार की तरह है, इसका उपयोग सुरक्षा बढ़ाने के लिए भी किया जा सकता है और हमलों के लिए भी।

बहरहाल, मिथोस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब केवल सुविधा का साधन नहीं रही, बल्कि यह वैश्विक सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और नीति निर्माण का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि दुनिया इस नई तकनीकी शक्ति के साथ संतुलन कैसे बनाती है ताकि इसका लाभ भी मिले और जोखिम भी नियंत्रित रहें।

-नीरज कुमार दुबे

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पंजाब से दिल्ली तक सियासी ‘सुनामी’: संकट में 'आप'

भारत की समकालीन राजनीति में शायद ही कोई घटना इतनी तेजी से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आई हो, जितनी राघव चड्ढा सहित सात राज्यसभा सांसदों के आम आदमी पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने से आई है। राघव चड्ढा सहित 7 सांसदों का भाजपा में विलय केवल एक खबर नहीं बल्कि आम आदमी पार्टी के 15 साल के इतिहास का सबसे बड़ा 'ब्लैकआउट' है। भारतीय राजनीति के क्षितिज पर यह घटनाक्रम एक बड़े ‘पॉलिटिकल अर्थक्वेक’ के रूप में दर्ज हो गया है। आम आदमी पार्टी (आप) के ‘पोस्टर बॉय’ माने जाने वाले राघव चड्ढा सहित राज्यसभा के 7 सांसदों का एक साथ पाला बदलकर भाजपा में शामिल होना न केवल ‘आप’ के लिए एक अस्तित्वगत संकट है बल्कि यह देश की राजनीति की दिशा और दशा बदलने वाला घटनाक्रम भी है। यह सिर्फ दल-बदल नहीं बल्कि सत्ता, विचारधारा और राजनीतिक रणनीति के बीच गहरे संघर्ष का संकेत है। जब राज्यसभा में पार्टी के कुल 10 में से 7 सांसद (दो-तिहाई बहुमत) एक साथ अलग होकर भाजपा में विलय करने का निर्णय लेते हैं तो यह दलबदल नहीं, एक वैचारिक और संगठनात्मक विद्रोह का प्रतीक बन जाता है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब भारतीय राजनीति 2027 के बड़े चुनावी चक्र की ओर बढ़ रही है। ऐसे में इस घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या ‘आप’ का ‘पंजाब किला’ अब ढ़हने के कगार पर है? क्या 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव की पटकथा अभी से लिखी जा चुकी है? और सबसे बड़ा प्रश्न कि क्या यह ‘आप’ के पतन की शुरुआत है या फिर एक अस्थायी राजनीतिक झटका?

‘आप’ के अस्तित्व पर खड़ा सबसे बड़ा सवाल

आम आदमी पार्टी ने इस पूरे घटनाक्रम को केवल राजनीतिक असहमति नहीं बल्कि लोकतंत्र पर सुनियोजित प्रहार करार दिया है। पार्टी नेतृत्व का स्पष्ट आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों के भय, दबाव और राजनीतिक प्रलोभनों के माध्यम से उसके सांसदों को तोड़ा गया, जिसे वह संस्थागत दुरुपयोग की श्रेणी में रखती है। यह आरोप भारतीय राजनीति में सत्ता बनाम विपक्ष की उस पुरानी बहस को फिर जीवित कर देता है, जहां नैतिकता और रणनीति आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं। संवैधानिक दृष्टि से यह कदम और भी दिलचस्प हो जाता है। दलबदल विरोधी कानून की तकनीकी बारीकी (दो-तिहाई सदस्यों के एक साथ अलग होने की शर्त) का उपयोग करते हुए राघव चड्ढ़ा के नेतृत्व में सात सांसदों का भाजपा में विलय यह संकेत देता है कि यह केवल भावनात्मक निर्णय नहीं बल्कि गहन कानूनी सलाह और रणनीतिक योजना का परिणाम था। सबसे गंभीर आघात वैचारिक स्तर पर है। जब भीतर से ही यह स्वर उठे कि पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है तो यह केवल संगठनात्मक संकट नहीं बल्कि पहचान के संकट का संकेत बन जाता है और यही चुनौती ‘आप’ के लिए सबसे कठिन परीक्षा है।

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पंजाब की राजनीति और 2027 का रण

पंजाब की राजनीति में उठी यह हलचल महज दल-बदल नहीं बल्कि सत्ता समीकरणों के पुनर्गठन का संकेत है। इस विद्रोह का सबसे गहरा असर पंजाब की सियासत पर पड़ना तय है। राज्यसभा में पंजाब का प्रतिनिधित्व करने वाले चेहरे (हरभजन सिंह, अशोक मित्तल, संजीव अरोड़ा और विक्रमजीत सिंह साहनी) का पार्टी से अलग होना ‘आप’ की उस सामाजिक पकड़ को कमजोर करता है, जो विविध वर्गों के प्रतिनिधित्व से बनी थी। यह बदलाव केवल संख्या का नहीं बल्कि भरोसे और प्रभाव का क्षरण है। सबसे बड़ी चुनौती भगवंत मान के सामने है। यह उनके नेतृत्व और राजनीतिक संतुलन की सीधी परीक्षा है। राघव चड्ढ़ा को लंबे समय तक सरकार और संगठन के बीच रणनीतिक कड़ी माना जाता रहा, उनके हटने से यह संतुलन डगमगाता दिख रहा है। दूसरी ओर, भाजपा इस घटनाक्रम को अवसर में बदलने की कोशिश में है। भाजपा पंजाब में हमेशा से एक 'छोटा भाई' (अकाली दल के साथ) बनकर रही है लेकिन 7 सांसदों के आने से, जिनमें सिखों और उद्योगपतियों का प्रतिनिधित्व है, भाजपा अब 2027 में 'अकेले दम' पर सरकार बनाने का सपना देख रही है। अब तक सहयोगी राजनीति तक सीमित रही भाजपा अब पंजाब में स्वतंत्र शक्ति बनने की दिशा में आक्रामक कदम बढ़ाती दिख रही है और 2027 का रण अब पहले से कहीं अधिक खुला और अनिश्चित हो गया है।

क्या खत्म हो जाएगी 'आप'?

इतिहास गवाह है कि क्षेत्रीय दल जब ऐसे बड़े विद्रोह का सामना करते हैं तो अक्सर वे या तो बिखर जाते हैं या फिर सिमटकर रह जाते हैं लेकिन आप की स्थिति थोड़ी भिन्न है। इसका सबसे बड़ा कारण है अरविंद केजरीवाल का व्यक्तित्व। आम आदमी पार्टी का आधार अरविंद केजरीवाल की ‘व्यक्तिगत ब्रांडिंग’ पर टिका है। जब तक दिल्ली और पंजाब जैसे अहम राज्यों में उनका जनाधार सुरक्षित है, तब तक ‘आप’ का पूर्ण पतन लगभग असंभव प्रतीत होता है। इसके समानांतर, ‘आप’ की ताकत उसका विकसित कैडर ढांचा है। आप ने पिछले एक दशक में एक मजबूत कैडर तैयार किया है। हालांकि शीर्ष स्तर पर योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और अब राघव चड्ढा जैसे प्रमुख चेहरों का अलग होना पार्टी को बड़ा झटका देता है लेकिन जमीनी कार्यकर्ता अब भी पार्टी की विचारधारा से जुड़े हैं। एक वैकल्पिक, जनोन्मुख और व्यवस्था-विरोधी नेता की केजरीवाल की छवि अब भी पार्टी की सबसे बड़ी पूंजी बनी हुई है।

राष्ट्रीय राजनीति में बदलता खेल

राष्ट्रीय राजनीति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह घटनाक्रम सत्ता-संतुलन को निर्णायक रूप से प्रभावित करता है। राज्यसभा में सात सांसदों के जुड़ने से भाजपा की स्थिति और सुदृढ़ हुई है, जिससे अब महत्वपूर्ण विधेयकों के पारित होने में उसकी छोटे दलों पर निर्भर रहने की बाध्यता कम हो गई है। इसके विपरीत, विपक्षी गठबंधन के लिए यह स्पष्ट झटका है क्योंकि ‘आप’ इस गठबंधन की मुखर आवाज रही है। सबसे गंभीर आघात ‘आप’ की वैचारिक विश्वसनीयता पर पड़ा है। जो पार्टी ‘ईमानदार राजनीति’ को अपनी पहचान मानती रही, उसी के भीतर से वैचारिक विचलन और आरोपों का उठना उसके नैरेटिव को कमजोर करता है। यह स्थिति नेतृत्व शैली पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है, लगातार बड़े चेहरों का अलग होना इस ओर संकेत करता है कि संवाद की कमी और निर्णय प्रक्रिया का केंद्रीकरण आंतरिक असंतोष को जन्म दे रहा है। राष्ट्रीय विस्तार की महत्वाकांक्षा पर भी इसका प्रभाव पड़ना तय है। दिल्ली और पंजाब से आगे बढ़ने की जो रणनीति थी, वह अब धीमी पड़नी तय है, विशेषकर तब, जब पंजाब, जो ‘आप’ का सबसे मजबूत गढ़ है, स्वयं इस राजनीतिक भूकंप के केंद्र में आ खड़ा हुआ है।

आप के लिए अग्निपरीक्षा का समय

यह कहना जल्दबाजी होगी कि 7 सांसदों के जाने से आम आदमी पार्टी खत्म हो जाएगी। राजनीति में रिक्तियां हमेशा भर दी जाती हैं। हालांकि यह निश्चित है कि आप अब अपनी सबसे कठिन अग्निपरीक्षा से गुजर रही है। यदि अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान अगले कुछ महीनों में पंजाब और दिल्ली के कैडर को एकजुट रखने में विफल रहे तो 2027 का चुनाव उनके लिए एक राजनीतिक ढ़लान साबित हो सकता है। दूसरी ओर, भाजपा ने इस ‘मास्टरस्ट्रोक’ के जरिए यह संदेश दे दिया है कि वह दिल्ली और पंजाब की सत्ता के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। बहरहाल, ‘आप’ के लिए चुनौती अब केवल चुनाव जीतना नहीं बल्कि अपने अस्तित्व और साख को बचाए रखना है।

- योगेश कुमार गोयल
(लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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