महापौर रवि लांडगे की फोटो से मचा बवाल, मिसिंग लिंक पर 'नो-स्टॉप' नियम की उड़ाई धज्जियां
मुंबई, 5 मई (आईएएनएस)। मुंबई-पुणे एक्सप्रेस-वे की मिसिंग लिंक परियोजना पर वाहन रोककर सेल्फी लेने पर सख्त चेतावनी के बावजूद नियमों की धज्जियां उड़ाने का ताजा मामला सामने आया है। पिंपरी-चिंचवड़ के महापौर रवि लांडगे की सेल्फी वाली तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गई हैं, जिससे प्रशासन पर दोहरे मानदंड अपनाने के आरोप लग रहे हैं।
महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास महामंडल (एमएसआरडीसी) ने महज 24 घंटे पहले ही हाई-स्पीड एक्सप्रेस-वे पर वाहन खड़ा करके फोटो, सेल्फी या रील बनाने पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी जारी की थी। इसके बावजूद महापौर रवि लांडगे मुंबई में पीएमआरडीए की बैठक में जा रहे थे, तभी मिसिंग लिंक वाले नए पुल पर रुक गए और फोटो सेशन किया। बाद में उन्होंने ये तस्वीरें अपने फेसबुक अकाउंट पर भी पोस्ट कर दीं।
सोशल मीडिया पर इस घटना ने तीखी बहस छेड़ दी है। आम नागरिकों ने सवाल उठाया है कि जब आम वाहन चालकों पर तुरंत जुर्माना लगाया जा रहा है, तो जनप्रतिनिधियों पर क्यों चुप्पी साधी जा रही है? लोगों का कहना है कि नियम सबके लिए एक समान होने चाहिए।
राजमार्ग पुलिस के अनुसार, अब तक मिसिंग लिंक क्षेत्र में नियम तोड़ने वाले करीब 100 आम वाहन चालकों पर 500 रुपए का जुर्माना लगाया जा चुका है। पूरे क्षेत्र में 24x7 सीसीटीवी निगरानी की जा रही है। एमएसआरडीसी ने स्पष्ट किया है कि हाई-स्पीड एक्सप्रेस-वे पर अचानक वाहन रोकना न सिर्फ ट्रैफिक बाधित करता है, बल्कि तेज रफ्तार वाले वाहनों के बीच गंभीर दुर्घटना का खतरा भी बढ़ाता है।
प्रोजेक्ट में हल्के वाहनों के लिए 100 किमी/घंटा और भारी वाहनों के लिए 80 किमी/घंटा की सख्त गति सीमा तय की गई है।
महापौर रवि लांडगे से इस मामले पर प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। यह घटना मुंबई-पुणे एक्सप्रेस-वे के मिसिंग लिंक प्रोजेक्ट की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है।
--आईएएनएस
एससीएच
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असम चुनाव नतीजों ने उड़ाई कांग्रेस की नींद, 19 में से 18 विधायक मुस्लिम; क्या सिमट रहा है जनाधार?
Assam Election Result: असम विधानसभा चुनाव के हालिया नतीजों ने राज्य की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है. कांग्रेस पार्टी ने इस चुनाव में जो सीटें जीती हैं, उनके विश्लेषण से एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है. पार्टी के कुल 19 नए विधायकों में से 18 विधायक मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. इस आंकड़े ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, क्योंकि यह साफ संकेत देता है कि कांग्रेस का आधार अब असम के केवल कुछ खास इलाकों और समुदायों तक ही सीमित होकर रह गया है.
हिंदू उम्मीदवारों में केवल डॉक्टर जोय प्रकाश दास ही ऐसे व्यक्ति हैं जो नौबोइचा विधानसभा सीट से जीत हासिल करने में कामयाब रहे हैं. बाकी सभी सीटों पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है.
परिसीमन के बावजूद कांग्रेस का अच्छा प्रदर्शन
राज्य में साल 2023 में हुए परिसीमन के बाद मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 35 से घटकर करीब 23 रह गई थी. इसके पीछे मुख्य उद्देश्य चुनावी प्रभाव को संतुलित करना बताया गया था. इस बदलाव का असर साफ तौर पर नतीजों में दिखाई दे रहा है. कांग्रेस ने अल्पसंख्यक बहुल बराक वैली और निचले असम में तो अपनी साख बचा ली है, लेकिन बाकी हिस्सों में उसे भारी नुकसान हुआ है. यहां तक कि कई जगहों पर एआईयूडीएफ जैसी पार्टियों ने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई है, फिर भी कांग्रेस इन क्षेत्रों में 16 सीटें निकालने में सफल रही है. उसकी सहयोगी पार्टी रायजोर दल ने भी इस क्षेत्र में एक सीट पर कब्जा जमाया है.
बदरुद्दीन अजमल को करना पड़ा हार का सामनाा
अगर चुनाव परिणामों की गहराई से पड़ताल करें तो पता चलता है कि बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा है. उसने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन उसे केवल दो सीटों पर ही संतोष करना पड़ा. वहीं दूसरी ओर, एनडीए की सहयोगी असम गण परिषद ने भी एक अल्पसंख्यक बहुल सीट पर जीत दर्ज की है. तृणमूल कांग्रेस ने भी इस बार असम में अपना खाता खोलकर सबको चौंका दिया है. बिलासीपारा जैसी महत्वपूर्ण सीट पर असम गण परिषद के जिबेश रॉय ने कांग्रेस के अमृत बादशाह को बेहद कड़े मुकाबले में हराया. इस हार के पीछे एआईयूडीएफ की उम्मीदवार सबाना अख्तर को माना जा रहा है, जिन्होंने कांग्रेस के हिस्से के वोट काट लिए.
नतीजों के बाद मंथन शुरू
कांग्रेस के भीतर भी इन नतीजों को लेकर मंथन का दौर शुरू हो गया है. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के एक वरिष्ठ पर्यवेक्षक ने बताया कि परिसीमन की वजह से निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदल गई थीं, जिसका सीधा फायदा सत्ताधारी बीजेपी को मिला. उनका कहना है कि मुस्लिम प्रभावित सीटों की संख्या 41 से घटकर 26 रह गई है, जिससे कांग्रेस के लिए जीत की गुंजाइश कम हो गई. हालांकि पार्टी का वोट प्रतिशत पिछले चुनाव के मुकाबले 29.67 प्रतिशत से बढ़कर 29.84 प्रतिशत हो गया है, लेकिन सीटों की संख्या में गिरावट आना पार्टी के भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा है.
कांग्रेस ने जमीनी स्तर पर कितना काम किया?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल परिसीमन को दोष देकर कांग्रेस अपनी कमियों को छिपा नहीं सकती है. जानकारों का कहना है कि यह नतीजे बताते हैं कि पिछले पांच सालों में कांग्रेस ने अपना दायरा बढ़ाने के लिए जमीन पर कोई ठोस काम नहीं किया. अगर पार्टी को असम में फिर से मजबूती से खड़ा होना है, तो उसे अपनी कार्यप्रणाली और संगठन के ढांचे में बड़े बदलाव करने होंगे. केवल एक समुदाय के भरोसे राजनीति करना लंबे समय में पार्टी के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है. असम की राजनीति अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां विकास और ध्रुवीकरण के बीच की खाई और गहरी होती जा रही है.
आगे कैसी चुनौती?
आने वाले समय में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह कैसे दोबारा समाज के सभी वर्गों का विश्वास हासिल करे. ऊपरी असम के इलाकों में पार्टी की पकड़ लगातार ढीली पड़ रही है, जहां कभी वह बेहद मजबूत हुआ करती थी. अगर कांग्रेस ने समय रहते अपनी रणनीति नहीं बदली, तो आने वाले चुनावों में उसकी राह और भी मुश्किल हो सकती है. फिलहाल, असम के इन चुनावी नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य की राजनीतिक जमीन पूरी तरह से बदल चुकी है और अब नए समीकरणों के साथ ही आगे बढ़ा जा सकता है.
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