बलूचिस्तान को लेकर एक बार फिर जबरदस्त बवाल मचा हुआ और इस बार यह मामला सिर्फ स्थानीय शांति तक सीमित नहीं बल्कि इसमें चीन, अमेरिका और पाकिस्तान के बीच चल रहा खेल खुलकर सामने आ गया। बलूचिस्तान पहले से अस्थिर रहा है, लेकिन अब यहां की शांति और भी विस्फोटक होती जा रही है। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने अपने खनन क्षेत्र में अमेरिका को बड़ी हिस्सेदारी देने का फैसला कर लिया है। यानी साफ अब वो चीन के साथ-साथ अमेरिका को भी मैदान में उतार कर खेल बदलना चाहता है। रिपोर्ट के मुताबिक इस नई डील की शुरुआत एक बेहद दिलचस्प तरीके से हुई। पिछले साल पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को रत्नों से भरा एक खास तोहफा दिया था। हालांकि इसकी तस्वीर भी सोशल मीडिया पर बड़ी वायरल हुई। यह सिर्फ एक गिफ्ट नहीं था बल्कि एक संकेत था कि बलूचिस्तान की जमीन में छुपे सोने और तांबे के भंडार से अमेरिका अरबों डॉलर कमा सकता है।
इसके बाद करीब 1.3 बिलियन डॉलर के निवेश की राह खुली। हालांकि आपको बता दें बलूचिस्तान में चीन लंबे वक्त से कई बड़े प्रोजेक्ट चला रहा है। कई सालों तक पाकिस्तान और चीन ने मिलकर इस इलाके में विकास के नाम पर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट चलाए। चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर के जरिए चीन ने यहां भारी निवेश भी किया और इसे अपने वैश्विक नेटवर्क का अहम हिस्सा बनाने की कोशिश की। लेकिन चीन ने जो गलती की थी शायद अब अमेरिका भी वही गलती करने जा रहा है। चीन बलूचिस्तान में तो घुस गया लेकिन बलोच लोगों से ना तो उसका प्रोजेक्ट सुरक्षित रहा और ना ही उसके इंजीनियर्स। लंबे समय से वहां की बलोच लिबरेशन आर्मी चीन के इस प्रोजेक्ट का विरोध कर रही है और इस विरोध में कई चीनी इंजीनियर्स और पाकिस्तानी सैनिक मारे जा चुके हैं। और वहीं अमेरिका से जिस डील को पाकिस्तान गेम चेंजर मान रहा था अब वो भी हिंसा की आग में फंस चुका है। क्योंकि पिछले एक साल में बलोच लिबरेशन आर्मी ने वहां पर कई बड़े हमले किए हैं। हाल ही में बीएलए ने 12 इलाकों में 18 जगहों को निशाना बनाया था। जिसमें 58 से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी। ये हमले खासतौर पर उन रास्तों पर हुए जो रिकोडक खदान की तरफ जाते हैं। यानी सीधे-सीधे पाकिस्तान के इस बड़े प्रोजेक्ट को चुनौती।
अब हालात यह है कि जिन विदेशी ताकतों को पाकिस्तान यहां लाकर ताकत दिखाना चाहता था। वही अब डरने लगी हैं। बैरिक गोल्ड जैसी कंपनियों ने भी सुरक्षा हालात खराब होने के चलते अपने प्रोजेक्ट धीमे कर दिए हैं। इस पूरे विवाद का एक और खतरनाक पहलू है बदलता हुआ विद्रोह। पहले यह आंदोलन सीमित था लेकिन अब पढ़े लिखे बलोच युवा भी इसमें शामिल हो रहे हैं। उन्हें लगता है कि उनकी जमीन से संसाधन निकालकर बाहरी ताकतों को बेचा जा रहा है। ऊपर से मानवाधिकार उल्लंघन और जबरन गायब किए गए लोगों के आरोप इस आग में और घी डाल रहे हैं। कुल मिलाकर पहले तो पाकिस्तान ने चीन को झटका दिया। अमेरिका को एक तरह से बलूचिस्तान में घुसाने का फैसला लिया और अब बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी के कई हमलों ने एक तरह से चीन और अमेरिका की गर्दन यहां पर फंसा दी है। कुल मिलाकर बलूचिस्तान अब सिर्फ एक खनिज क्षेत्र नहीं रहा। यह एक जंग का मैदान बन चुका है। चीन, अमेरिका और पाकिस्तान तीनों अपनी जगह अपनी चाल चल रहे हैं।
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दुनिया युद्ध की आग में हर रोज जल रही है। चाहे पश्चिम एशिया की धक हो या फिर रूस यूक्रेन की भयंकर तबाही। लेकिन अब इन महासंकटों के बीच भारत ने एक ऐसा आर्थिक ब्रह्मास्त्र चला है जिससे पूरी दुनिया हैरान हो गई। दरअसल आज भारत केवल एक मुखदर्शक नहीं है बल्कि विश्व मित्र की भूमिका में है। जहां एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शांति का संदेश देते हैं। वहीं दूसरी तरफ हमारे यानी भारत के प्रवासी भारतीय अपनी मेहनत से देश की नींव मजबूत कर रहे हैं। यही वजह है कि मॉ्गन स्टैनली की ताजा रिपोर्ट भारत की इसी बढ़ती साख की गवाही दे रही है। बिल्कुल विदेश से पैसा घर भेजने के मामले में भारतीय प्रवासियों ने नया रिकॉर्ड बना दिया है। भारत को मिलने वाली रेमिटेंस यानी प्रवासियों द्वारा भेजा गया धन 138 बिलियन पहुंचने का अनुमान है। यह पिछले साल से 15% अधिक हैं। यह विशाल धनराशि हमारे व्यापार घाटे का 40 से 45% हिस्सा अकेले संभाल लेती है।
भारत जो बाहर से खरीदता है उसका आधा भुगतान हमारे विदेशों में बैठे वीर सिपाही या फिर आप इन्हें श्रमिक कह सकते हैं वो कर देते हैं। वैसे अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच छिड़ा युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है। जीसीसी देशों यानी कि यूएई, सऊदी अरब, क़तर में काम कर रहे लाखों भारतीयों के रोजगार पर खतरा मंडराता दिख रहा है। पर्यटन, लॉजिस्टिक और निर्माण जैसे क्षेत्रों में सुस्ती दिखाई दे रही है और एक समय था जब भारत पूरी तरह खाड़ी देशों पर निर्भर था। लेकिन अब खेल पलट चुका है। यूएसए और विकसित देशों से अब कुल रेमिटेंस का 42% हिस्सा आ रहा है और भारतीय अब सिर्फ मजदूरी नहीं बल्कि दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों और अर्थव्यवस्थाओं को चला रहे हैं। लेकिन केरल जैसे राज्यों के लिए यह खबर चिंताजनक है जहां की 20% रेमिटेंस सीधे खाड़ी देशों से आती है। अगर युद्ध लंबा खिसता है तो हमें एक होम कमिंग पॉलिसी की जरूरत होगी ताकि लौटने वाले हुनरमन भारतीयों को देश के निर्माण में लगाया जा सके।
वैसे रेमिटेंस पर आरबीआई के पुराने सर्वे के मुताबिक कुल रकम में से ज्यादातर इस्तेमाल पारिवारिक जरूरतों के लिए किया जाता है। कुछ रकम को डिपॉजिट और निवेश के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है और इस तिमाही में रेमिटेंस बढ़ने की एक वजह यह भी है कि त्योहारों और शादियों की वजह से इस दौरान प्रवासी भारतीय काफी रकम अपने घर भेज रहे हैं। खैर भारत की असली ताकत उसकी सेना के साथ-साथ उसकी आर्थिक रीड भी है और मॉर्गन स्टैनली की ये रिपोर्ट हमें सचेत करती है और गौरवान्वित भी करती है।
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