अरब देशों में संघर्ष से शिक्षा संकट गहराया, 10 करोड़ से ज्यादा बच्चे प्रभावित: यूनेस्को
बेरूत, 4 मई (आईएएनएस)। यूनेस्को की एक रिपोर्ट में सोमवार को चेतावनी दी गई कि क्षेत्र में बढ़ते संघर्ष की वजह से अरब देशों में शिक्षा व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। इससे दस करोड़ से ज्यादा बच्चों पर असर पड़ा है और पहले से कमजोर सिस्टम टूटने की कगार पर पहुंच गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कम से कम 15 देशों में शिक्षा प्रभावित हुई है। स्कूल बंद होने, पढ़ाई तक कम पहुंच और ऑनलाइन पढ़ाई पर निर्भर होने की वजह से करीब 5.2 करोड़ स्कूली बच्चों की पढ़ाई में बाधा आई है। इससे पहले ही इस क्षेत्र में लगभग तीन करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर थे।
गाजा पट्टी में हालात बहुत खराब हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि वहां शिक्षा व्यवस्था लगभग पूरी तरह टूट चुकी है। करीब 97.5 प्रतिशत स्कूल या तो खराब हो चुके हैं या पूरी तरह नष्ट हो गए हैं, और 6.37 लाख से ज्यादा बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं।
लेबनान भी इससे काफी प्रभावित हुआ है। वहां 1,100 से ज्यादा सरकारी स्कूलों को शरण स्थल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है और कम से कम 570 स्कूल बंद हैं या संघर्ष वाले इलाकों में हैं। इससे 2.4 लाख से ज्यादा छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हुई है।
पूरे क्षेत्र में पढ़ाई अब इमरजेंसी और हाइब्रिड मॉडल (ऑफलाइन + ऑनलाइन) में चल रही है, लेकिन इसमें सबको बराबर सुविधा और अच्छी गुणवत्ता नहीं मिल पा रही है। यूनेस्को ने यह भी बताया कि बच्चों में मानसिक तनाव बढ़ रहा है और लंबे समय तक पढ़ाई का नुकसान होने और स्कूल छोड़ने का खतरा भी बढ़ गया है।
सीरिया में हालात और मुश्किल हो गए हैं, क्योंकि लेबनान से लोग वापस आ रहे हैं। इससे वहां की पहले से कमजोर शिक्षा व्यवस्था पर और दबाव पड़ रहा है। कई लौटने वाले बच्चों को तुरंत पढ़ाई की जरूरत है, लेकिन स्कूल या तो भरे हुए हैं या शरण स्थल बने हुए हैं। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई छूट रही है और दोबारा दाखिला लेना भी मुश्किल हो रहा है।
इसका असर सिर्फ संघर्ष वाले इलाकों तक सीमित नहीं है। इराक में करीब 7,500 स्कूल, जिनमें 20 लाख छात्र पढ़ते हैं, ऑनलाइन पढ़ाई पर चले गए हैं। वहीं खाड़ी देशों में एहतियात के तौर पर कुछ समय के लिए स्कूल बंद किए गए हैं और ऑनलाइन पढ़ाई शुरू की गई है।
यूनेस्को ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए तो इस क्षेत्र को लंबे समय के लिए बड़ा नुकसान हो सकता है और एक पूरी पीढ़ी की पढ़ाई बर्बाद हो सकती है।
संस्था फिलहाल इमरजेंसी मदद बढ़ा रही है, जैसे अस्थायी स्कूल बनाना, डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए पढ़ाई और बच्चों को मानसिक सहारा देना। साथ ही, उसने अंतरराष्ट्रीय मदद की भी अपील की है ताकि बच्चों की पढ़ाई जारी रखी जा सके और भविष्य में मजबूत शिक्षा व्यवस्था फिर से खड़ी की जा सके।
--आईएएनएस
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चुनावी नतीजों के बाद विपक्षी खेमे में पसरा सन्नाटा, केरलम की जीत भी नहीं भर पायी हार के जख्म
Keralam Election Result: पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने आने के बाद देश की राजनीति में एक नई बहस छिड़ गई है. केरलम में कांग्रेस गठबंधन की जीत ने पार्टी को एक बड़ी राहत तो दी है, लेकिन बंगाल, तमिलनाडु, असम और पुडुचेरी में मिली करारी हार ने उत्साह पर पानी फेर दिया है. विपक्षी दलों को उम्मीद थी कि इस बार वे बीजेपी और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों को कड़ी टक्कर देंगे, लेकिन नतीजों ने उनके दावों की पोल खोल दी है. कांग्रेस के लिए केरलम की जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बंगाल और तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों में विपक्षी गठबंधन पूरी तरह बिखर गया है. ऐसे में कांग्रेस खुद को विपक्ष के नेतृत्व के तौर पर पेश तो कर रही है, लेकिन मायूसी कम होने का नाम नहीं ले रही है.
राहुल गांधी का रुख और कांग्रेस की प्रतिक्रिया
चुनाव नतीजों के तुरंत बाद कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने केरलम की जनता का आभार जताया. उन्होंने इस जीत को लोकतंत्र की जीत बताया. वहीं, कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने माना कि केरलम के अलावा बाकी राज्यों के नतीजे पार्टी की उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहे हैं. उन्होंने कहा कि पार्टी इन नतीजों से निराश नहीं है और विचारधारा की लड़ाई जारी रहेगी. कांग्रेस अब जल्द ही हार के कारणों का गहराई से विश्लेषण करने की तैयारी में है. पार्टी के भीतर इस बात पर चर्चा हो रही है कि आखिर क्यों असम जैसे राज्यों में जीत हाथ से निकल गई.
असम में गुटबाजी और संगठन की कमजोरी
असम में कांग्रेस को बड़ी जीत की उम्मीद थी, लेकिन वहां पार्टी को असफलता हाथ लगी. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि राज्य में संगठन की कमजोरी और बड़े नेताओं के बीच आपसी गुटबाजी हार का सबसे बड़ा कारण बनी. इसके अलावा परिसीमन के बाद बदली परिस्थितियों को समझने में भी पार्टी नाकाम रही. बंगाल और तमिलनाडु में कांग्रेस की स्थिति पहले से ही बहुत कमजोर थी, इसलिए वहां की हार का राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा असर नहीं पड़ा, लेकिन असम की हार ने पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल जरूर तोड़ा है.
विपक्षी एकता को लगा बड़ा झटका
बंगाल में टीएमसी की हार ने विपक्षी एकता की मुहिम को कमजोर कर दिया है. ममता बनर्जी की हार के बाद अब यह माना जा रहा है कि वे केंद्रीय राजनीति में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश करेंगी, जिससे विपक्षी दलों के भीतर वर्चस्व की जंग और तेज हो सकती है. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, आने वाले दिनों में तमिलनाडु में डीएमके के भीतर और बंगाल में टीएमसी के भीतर अंदरूनी कलह देखने को मिल सकती है. विपक्षी खेमे में यह मायूसी आने वाले समय में एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत दे रही है.
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