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वित्त वर्ष 2026 में दोपहिया वाहनों की बिक्री में उछाल, शहरी मांग और प्रीमियम सेगमेंट ने बढ़ाया ऑटो बाजार: रिपोर्ट

नई दिल्ली, 2 मई (आईएएनएस)। भारत के ऑटो सेक्टर में वित्त वर्ष 2026 के दौरान मांग के आधार पर सुधार देखने को मिला, लेकिन यह सुधार हर सेगमेंट में समान नहीं था। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, शहरी क्षेत्रों की मांग और प्रीमियम वाहनों की बढ़ती पसंद ने इस रिकवरी को आगे बढ़ाया, जबकि ग्रामीण मांग कुछ कमजोर रही।

डेलॉयट इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, दोपहिया वाहनों ने इस रिकवरी में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। इनके थोक बिक्री में साल-दर-साल 10.7 प्रतिशत और खुदरा बिक्री में 13.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में प्रीमियम गाड़ियों का ट्रेंड जारी रहा, जहां मिड-साइज एंट्री सेगमेंट की हिस्सेदारी बढ़ी, जबकि पारंपरिक एंट्री-लेवल सेगमेंट कमजोर पड़ा।

कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में भी सुधार देखा गया, जहां यह लगभग 12.6 प्रतिशत की दर से बढ़ा। यह बढ़ोतरी इंफ्रास्ट्रक्चर गतिविधियों और पुराने वाहनों को बदलने की मांग के कारण हुई।

रिपोर्ट में कहा गया है, इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को अपनाने की रफ्तार बढ़ रही है, लेकिन यह अभी भी असमान है। लागत और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण इनकी पहुंच सीमित बनी हुई है।

दोपहिया बाजार में प्रीमियम मोटरसाइकिल की मांग में 40.7 प्रतिशत और स्कूटर की मांग में 18.5 प्रतिशत की मजबूत बढ़ोतरी देखी गई। इलेक्ट्रिक दोपहिया की बिक्री 21.8 प्रतिशत बढ़ी, लेकिन कुल ईवी हिस्सेदारी सिर्फ 6.5 प्रतिशत तक ही पहुंच पाई।

ईवी अपनाने में केरल 14.1 प्रतिशत के साथ आगे रहा, जबकि कर्नाटक और ओडिशा में भी अच्छी बढ़ोतरी देखी गई। वहीं महाराष्ट्र में बिक्री बढ़ने के बावजूद हिस्सेदारी घटकर 9.2 प्रतिशत रह गई, क्योंकि पारंपरिक इंजन वाले वाहनों की मांग फिर बढ़ी।

रिपोर्ट में कहा गया कि वित्त वर्ष 2026 के दूसरे हिस्से में जीएसटी में बदलाव और कीमतों में कमी के कारण 350सीसी से कम वाली मोटरसाइकिलें सस्ती हो गईं, जिससे उनकी कीमतें कम्यूटर बाइक्स के करीब आ गईं।

पूरे ऑटो सेक्टर में एंट्री-लेवल वाहनों की मांग दबाव में रही, जबकि शहरी बाजारों में प्रीमियम और नए फीचर्स वाले वाहनों ने ग्रोथ को संभाले रखा।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भारत-यूरोप फ्री ट्रेड एग्रीमेंट और नई ईवी नीतियां आने वाले समय में इस सेक्टर को और मजबूती दे सकती हैं।

पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में भी सुधार देखा गया, जहां कंपनियों ने संतुलित तरीके से बिक्री बढ़ाई और ग्राहकों ने अपनी बजट सीमा के अंदर बेहतर और प्रीमियम विकल्प चुने।

--आईएएनएस

डीबीपी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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ट्रंप-मर्ज विवाद के बीच सुर्खियों में जर्मनी से सैनिक हटाने का अमेरिकी फैसला, मिलिट्री बेस की वजह आखिर क्या?

वॉशिंगटन/बर्लिन, 2 मई (आईएएनएस)। अमेरिका की जर्मनी में तैनात अपनी सेना हटाने का फैसला ले लिया है। तमाम अमेरिकी मीडिया आउटलेट्स ने शनिवार को इसकी वजह के साथ फैसले की सूचना दी। ईरान को लेकर जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के बयान पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नाराजगी के बाद ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में तनाव बढ़ा और सैन्य वापसी का ऐलान कर दिया गया। सवाल उठता है कि आखिर जर्मनी को क्यों जरूरत है अमेरिकी सेना की, क्या है इसका इतिहास?

जर्मनी में अमेरिकी सेना की मौजूदगी की शुरुआत दूसरे विश्व युद्ध के समय, 1945 में हुई थी। जब नाजी शासन ने सरेंडर किया, तब देश में 16 लाख अमेरिकी सैनिक थे; यह संख्या एक साल के भीतर घटकर 3 लाख से भी कम रह गई थी, और ये सैनिक मुख्य रूप से अमेरिकी कब्जे वाले इलाके का इंतजाम संभाल रहे थे।

शीत युद्ध शुरू होने तक जर्मनी में अमेरिकी मौजूदगी लगातार कम होती रही। इस दौरान, अमेरिकी सेना का मकसद नाजीवाद को खत्म करने से बदलकर जर्मनी को फिर से खड़ा करना हो गया, ताकि वह सोवियत संघ के खिलाफ एक मजबूत दीवार की तरह खड़ा हो सके। 1949 में नाटो और पश्चिमी जर्मनी के बनने के साथ ही, ये मिलिट्री बेस हमेशा के लिए वहीं जम गए।

शीत युद्ध के चरम पर, अमेरिका जर्मनी में करीब 50 बड़े बेस और 800 से ज़्यादा जगहों से अपना काम चला रहा था। इनमें बड़े-बड़े हवाई अड्डों और बैरकों से लेकर जासूसी करने वाले ठिकाने तक शामिल थे। 1989 में बर्लिन की दीवार गिरने और उसके दो साल बाद सोवियत संघ की टूट के बाद से, इनमें से कई बेस बंद हो चुके हैं।

1960, 1970 और 1980 के दशकों में, जर्मनी में अमेरिकी सैनिकों की संख्या अक्सर 2,50,000 से अधिक रहती थी। इसके अलावा, लाखों लोग—यानी सैनिकों के परिजन—इन बेस के अंदर या आस-पास ही रहते थे। ये बेस धीरे-धीरे अपने आप में पूरे-पूरे अमेरिकी शहरों जैसे बन गए थे, जहां उनके अपने स्कूल, दुकानें और सिनेमाघर मौजूद थे।

अमेरिकी रक्षा विभाग के डेटा के अनुसार यूरोप में करीब 68,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जिनमें से लगभग 36,400 सिर्फ जर्मनी में मौजूद हैं। ये सैनिक 20 से 40 सैन्य अड्डों में फैले हैं, जिनकी संख्या बेस की परिभाषा के आधार पर अलग-अलग मानी जाती है।

जर्मनी स्थित स्टटगार्ट मुख्यालय यूनाइटेड स्टेट्स यूरोपियन कमांड और यूनाइटेड स्टेट्स अफ्रीका कमांड का केंद्र है, जो यूरोप और अफ्रीका में अमेरिकी सैन्य अभियानों का संचालन करते हैं। इसके अलावा, रामस्टीन एयरबेस अमेरिका की यूरोप स्थित वायुसेना का मुख्यालय है, जहां करीब 8,500 वायुसेना कर्मी तैनात हैं।

बवेरिया क्षेत्र में ग्राफेनवोहर, विलसेक और होहेनफेल्स जैसे अड्डे यूरोप के सबसे बड़े अमेरिकी सैन्य प्रशिक्षण क्षेत्रों में शामिल हैं। वहीं, विस्बाडेन में अमेरिकी सेना यूरोप और अफ्रीका का मुख्यालय स्थित है। लैंडस्टूल मेडिकल सेंटर अमेरिका के बाहर सबसे बड़ा सैन्य अस्पताल माना जाता है।

शीत युद्ध के बाद इन सैन्य अड्डों की भूमिका में बड़ा बदलाव आया। अब ये केवल रक्षा ठिकाने नहीं, बल्कि अमेरिका के लिए “फॉरवर्ड स्टेजिंग” (अग्रिम पड़ाव) और लॉजिस्टिक्स हब बन चुके हैं। यहीं से इराक, अफगानिस्तान और हालिया पश्चिम एशिया अभियानों जैसे युद्धों को समर्थन मिला है।

ट्रंप पहले भी जर्मनी में तैनात सैनिकों को लेकर सख्त रुख अपना चुके हैं। 2020 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान उन्होंने जर्मनी को “अपराधी” बताते हुए वहां से सैनिकों की संख्या एक-तिहाई घटाने की बात कही थी। उस समय उन्होंने जर्मनी के कम रक्षा खर्च और नॉर्ड स्ट्रीम 2 गैस पाइपलाइन को समर्थन देने पर नाराजगी जताई थी।

हालांकि, ट्रंप की उस घोषणा ने पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय), नाटो और जर्मन अधिकारियों को चौंका दिया था, क्योंकि इस बारे में पहले कोई औपचारिक जानकारी साझा नहीं की गई थी। योजना के तहत कुछ सैनिकों को अमेरिका वापस बुलाने और कुछ को पोलैंड और इटली में तैनात करने का प्रस्ताव था।

लेकिन इस कदम को अमेरिकी कांग्रेस में दोनों दलों के विरोध और भारी लॉजिस्टिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। बाद में जो बाइडेन ने 2021 में इस योजना को रोक दिया और अंततः इसे रद्द कर दिया।

वर्तमान में, जर्मनी में अमेरिकी सेना की मौजूदगी को केवल यूरोप की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि अमेरिका की वैश्विक सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा माना जाता है। ऐसे में ट्रंप और मर्ज के बीच बढ़ता बयानबाजी का टकराव इस मुद्दे को और संवेदनशील बना रहा है, जिसका असर आने वाले समय में अमेरिका-यूरोप संबंधों और वैश्विक सुरक्षा संतुलन पर पड़ सकता है।

--आईएएनएस

केआर/

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