अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के एक ताजा सोशल मीडिया पोस्ट ने अटलांटिक के दोनों किनारों पर राजनीतिक भूकंप ला दिया। ट्रंप ने जर्मनी से अमेरिकी सैनिकों को कम करने या उन्हें पूरी तरह वापस बुलाने की संभावना जताकर पेंटागन और नाटो सहयोगियों को गहरे संकट में डाल दिया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष ने वैश्विक शक्तियों के बीच तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि संभावित फैसले की जानकारी स्वयं पेंटागन के शीर्ष अधिकारियों को भी नहीं थी। रिपोर्ट्स के अनुसार सैन्य अधिकारियों को ट्रंप के ट्रुथ सोशल पोस्ट के बाद ही इस योजना का पता चला। हाल ही में अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने दुनिया भर में तैनात अमेरिकी बलों की व्यापक समीक्षा की थी। जिसमें यूरोप से सैनिकों को हटाने का कोई उल्लेख नहीं था। पेंटागन के एक सूत्र ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि हमारा ध्यान ईरान के मोर्चे पर केंद्रित था। जर्मनी से पीछे हटना हमारी रणनीतिक गणना का हिस्सा नहीं था। इस कूटनीतिक दरार की शुरुआत जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिस मे्स के एक कड़े बयान से हुई।
मैट्स ने ईरान के साथ अमेरिका के युद्ध की आलोचना करते हुए कहा कि वाशिंगटन के पास कोई एग्जिट स्ट्रेटेजी नहीं है और अमेरिकी सेना वहां अपमानित हो रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जर्मनी इस संघर्ष में अमेरिका का आंख मूंद कर साथ नहीं देगा और ना ही अपने हवाई क्षेत्र का उपयोग करने की खुली अनुमति देगा। ट्रंप ने इस आलोचना को व्यक्तिगत अपमान के तौर पर लिया। उन्होंने जवाबी हमला करते हुए कहा कि जर्मनी अपनी रक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर है। लेकिन जब सहयोग की बात आती है तो वह पीछे हट जाता है। ट्रंप ने चांसलर को सलाह दी कि वे अमेरिका को सिखाने के बजाय जर्मनी के ऊर्जा संकट और आर्थिक गिरावट पर ध्यान केंद्रित करें। अब सवाल यह है कि अमेरिका अगर जर्मनी में तैनात अपने सभी सैनिकों को वापस बुला लेता है तो इससे क्या फर्क पड़ेगा? आपको बता दें कि इसके परिणाम केवल सैन्य नहीं बल्कि ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण होंगे। जर्मनी स्थित रमस्टीन एयरबेस अमेरिका के वैश्विक सैन्य संचालन का हृदय है।
इसकी अनुपस्थिति में नेटो की त्वरित कार्रवाही की क्षमता आधी रह जाएगी। इसके अलावा पोलैंड और बाल्टिक देशों जैसे पूर्वी यूरोपीय देश जो रूस को एक बड़े खतरे के रूप में देखते हैं वे खुद को असुरक्षित महसूस करेंगे। यूरोप की रणनीतिक स्वायता खतरे में पड़ सकती है और अगर अमेरिका ने 38,000 सैनिक वापस बुलाए तो इससे नाटो का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।
अमेरिका के पीछे हटने से नेटो की प्रासंगिकता पर सवाल उठेंगे। अगर गठबंधन का सबसे बड़ा साझेदार ही अपनी प्रतिबद्धताओं से पीछे हटता है तो सामूहिक सुरक्षा का सिद्धांत यानी आर्टिकल फाइव कमजोर पड़ जाएगा। जर्मनी के कई शहर जैसे स्टगार्ड और कैसलॉटन अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर आर्थिक रूप से निर्भर है। सैनिकों की वापसी से वहां के स्थानीय व्यवसायों को अरबों डॉलर का नुकसान होगा। दूसरी ओर विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की अनुपस्थिति रूस और चीन जैसे देशों को यूरोप में अपना प्रभाव बढ़ाने का सुनहरा अवसर प्रदान करेगी। विश्लेषकों का एक वर्ग इसे ट्रंप की पुरानी प्रेशर टैक्टिक्स मान रहा है। जिसका उद्देश्य यूरोपीय देशों को रक्षा बजट बढ़ाने और ईरान के मुद्दे पर अमेरिका का साथ देने के लिए मजबूर करना है। हालांकि जिस तरह से ट्रंप ने पेंटागन को दरकिनार कर यह बयान दिया है उससे यह साफ है कि वे इस बार केवल चेतावनी नहीं दे रहे बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को बदलने का मन बना चुके हैं। देखना यह होगा कि जर्मनी से सैनिकों को कम करने या वापस बुलाने के फैसले पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आगे क्या बयान देते हैं और आगे क्या फैसला लेते हैं।
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नई दिल्ली, 2 मई (आईएएनएस)। भारत के ऑटो सेक्टर में वित्त वर्ष 2026 के दौरान मांग के आधार पर सुधार देखने को मिला, लेकिन यह सुधार हर सेगमेंट में समान नहीं था। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, शहरी क्षेत्रों की मांग और प्रीमियम वाहनों की बढ़ती पसंद ने इस रिकवरी को आगे बढ़ाया, जबकि ग्रामीण मांग कुछ कमजोर रही।
डेलॉयट इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, दोपहिया वाहनों ने इस रिकवरी में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। इनके थोक बिक्री में साल-दर-साल 10.7 प्रतिशत और खुदरा बिक्री में 13.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में प्रीमियम गाड़ियों का ट्रेंड जारी रहा, जहां मिड-साइज एंट्री सेगमेंट की हिस्सेदारी बढ़ी, जबकि पारंपरिक एंट्री-लेवल सेगमेंट कमजोर पड़ा।
कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में भी सुधार देखा गया, जहां यह लगभग 12.6 प्रतिशत की दर से बढ़ा। यह बढ़ोतरी इंफ्रास्ट्रक्चर गतिविधियों और पुराने वाहनों को बदलने की मांग के कारण हुई।
रिपोर्ट में कहा गया है, इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को अपनाने की रफ्तार बढ़ रही है, लेकिन यह अभी भी असमान है। लागत और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण इनकी पहुंच सीमित बनी हुई है।
दोपहिया बाजार में प्रीमियम मोटरसाइकिल की मांग में 40.7 प्रतिशत और स्कूटर की मांग में 18.5 प्रतिशत की मजबूत बढ़ोतरी देखी गई। इलेक्ट्रिक दोपहिया की बिक्री 21.8 प्रतिशत बढ़ी, लेकिन कुल ईवी हिस्सेदारी सिर्फ 6.5 प्रतिशत तक ही पहुंच पाई।
ईवी अपनाने में केरल 14.1 प्रतिशत के साथ आगे रहा, जबकि कर्नाटक और ओडिशा में भी अच्छी बढ़ोतरी देखी गई। वहीं महाराष्ट्र में बिक्री बढ़ने के बावजूद हिस्सेदारी घटकर 9.2 प्रतिशत रह गई, क्योंकि पारंपरिक इंजन वाले वाहनों की मांग फिर बढ़ी।
रिपोर्ट में कहा गया कि वित्त वर्ष 2026 के दूसरे हिस्से में जीएसटी में बदलाव और कीमतों में कमी के कारण 350सीसी से कम वाली मोटरसाइकिलें सस्ती हो गईं, जिससे उनकी कीमतें कम्यूटर बाइक्स के करीब आ गईं।
पूरे ऑटो सेक्टर में एंट्री-लेवल वाहनों की मांग दबाव में रही, जबकि शहरी बाजारों में प्रीमियम और नए फीचर्स वाले वाहनों ने ग्रोथ को संभाले रखा।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भारत-यूरोप फ्री ट्रेड एग्रीमेंट और नई ईवी नीतियां आने वाले समय में इस सेक्टर को और मजबूती दे सकती हैं।
पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में भी सुधार देखा गया, जहां कंपनियों ने संतुलित तरीके से बिक्री बढ़ाई और ग्राहकों ने अपनी बजट सीमा के अंदर बेहतर और प्रीमियम विकल्प चुने।
--आईएएनएस
डीबीपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
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