Explainer: 93% वोटिंग ने बदला खेल! क्या ममता बनर्जी बचा पाएंगी किला या BJP करेगी बड़ा उलटफेर?
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के दोनों चरणों का मतदान संपन्न हो चुका है। पहले चरण में जहाँ 93.19% का ऐतिहासिक और रिकॉर्ड तोड़ मतदान दर्ज किया गया, वहीं दूसरे चरण में भी भारी हिंसा और तनाव के बावजूद मतदाताओं का उत्साह कम नहीं हुआ।
बंगाल की 294 सीटों पर हुआ यह भारी मतदान न केवल एक आंकड़ा है, बल्कि यह राज्य की भविष्य की राजनीति के लिए एक बड़े 'प्रो-इंकंबेंसी' या 'एंटी-इंकंबेंसी' का संकेत है। अब सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी चौथी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालेंगी या भाजपा का 'परिवर्तन' का नारा इस बार हकीकत बनेगा?
रिकॉर्ड तोड़ मतदान के क्या हैं मायने?
बंगाल में मतदान का प्रतिशत हमेशा से अधिक रहा है, लेकिन इस बार 93% से ऊपर का आंकड़ा कई मायनों में चौंकाने वाला है। राजनीति के गलियारों में इसके दो प्रमुख मायने निकाले जा रहे हैं:
बदलाव की बयार: आमतौर पर बहुत अधिक मतदान को सत्ता के खिलाफ गुस्से का प्रतीक माना जाता है। अगर यह साइलेंट वोटर का गुस्सा है, तो यह ममता बनर्जी के लिए खतरे की घंटी हो सकता है।
गढ़ बचाने की जंग: दूसरी तरफ, टीएमसी का मानना है कि उनकी 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाओं और महिला केंद्रित नीतियों की वजह से महिलाओं ने बढ़-चढ़कर वोट दिया है, जो उनकी सत्ता में वापसी सुनिश्चित करेगा।
ममता बनर्जी का गढ़ और भाजपा की चुनौती
दूसरे चरण की 142 सीटों में से 2021 में टीएमसी ने 123 सीटें जीती थीं। यह इलाका टीएमसी का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। इस बार भाजपा ने यहाँ अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। प्रधानमंत्री मोदी का वाराणसी जैसा भव्य रोड शो और गृह मंत्री की रैलियों ने ध्रुवीकरण और विकास के मुद्दे को एक साथ हवा दी है। अगर भाजपा यहाँ सेंध लगाने में सफल रहती है, तो ममता बनर्जी के लिए बहुमत का आंकड़ा जुटाना नामुमकिन हो जाएगा।
महिला वोटर और 'आरजी कर' कांड का प्रभाव
इस चुनाव में 'नारी शक्ति' सबसे बड़ा फैक्टर बनकर उभरी है। एक तरफ ममता बनर्जी की कल्याणकारी योजनाएं हैं, तो दूसरी तरफ 'आरजी कर' अस्पताल जैसी घटनाओं ने महिला सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पानिहाटी में जिस तरह पीड़िता की मां को घेरा गया और फिर जो जन-आक्रोश दिखा, वह साफ करता है कि इस बार बंगाल की महिलाएं सिर्फ लाभार्थी के तौर पर नहीं, बल्कि एक सजग निर्णायक के तौर पर पोलिंग बूथ तक पहुंची हैं।
भवानीपुर: सत्ता के भविष्य का केंद्र
भवानीपुर सीट इस पूरे चुनाव का उपरिकेंद्र रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी के बीच का मुकाबला सिर्फ एक सीट की जीत-हार नहीं है, बल्कि यह साख की लड़ाई है। 2021 में नंदीग्राम में मिली हार का बदला लेने के लिए ममता यहाँ से अपनी पूरी ताकत लगा रही हैं, जबकि भाजपा सुवेंदु के जरिए यह संदेश देना चाहती है कि ममता अब अपने घर में भी सुरक्षित नहीं हैं।
हिंसा और सुरक्षा बलों की भूमिका
चुनाव आयोग द्वारा 2300 से अधिक कंपनियों की तैनाती और एनआईए की सक्रियता के बावजूद दूसरे चरण में कई जगहों पर बमबाजी और झड़पें हुईं। सुवेंदु अधिकारी के सामने 'चोर-चोर' के नारे लगना और भाजपा उम्मीदवारों पर हमले यह दर्शाते हैं कि जमीन पर संघर्ष बेहद कड़ा है। भारी फोर्स की मौजूदगी ने मतदाताओं को घरों से निकलने का साहस दिया, जिसका परिणाम ऊंचे वोटिंग प्रतिशत के रूप में सामने आया।
4 मई को किसका होगा 'राजतिलक'?
बंगाल का यह चुनाव अब तक का सबसे जटिल चुनाव साबित हुआ है। एक तरफ ममता बनर्जी की 'मृदा पुत्र' वाली छवि है, तो दूसरी तरफ भाजपा का 'सोनार बांग्ला' और 'भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन' का वादा। रिकॉर्ड तोड़ मतदान यह संकेत दे रहा है कि जनता ने अपना फैसला स्पष्ट कर दिया है। यदि यह वोट 'सुरक्षा और न्याय' के नाम पर पड़ा है, तो भाजपा इतिहास रच सकती है, और यदि यह 'योजनाओं और पहचान' के नाम पर है, तो ममता बनर्जी चौथी बार सत्ता की कुर्सी पर काबिज हो सकती हैं।
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