सुबह उठते ही जोड़ों में जकड़न और दर्द को न करें नजरअंदाज, शरीर दे रहा गंभीर बीमारी का संकेत
नई दिल्ली, 29 अप्रैल (आईएएनएस)। कई लोग सुबह उठते समय शरीर में जकड़न और कमर में खिंचाव जैसी समस्या को महसूस करते हैं और इसे आम बात मानकर अनदेखा कर देते हैं। लेकिन अगर सुबह उठने के बाद जोड़ों की अकड़न लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह शरीर में सूजन, ऑटोइम्यून बीमारी या जोड़ों से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है।
डॉक्टरों के मुताबिक, जब इंसान सोता है, तब शरीर कई घंटों तक लगभग एक ही स्थिति में रहता है। इस दौरान जोड़ों के बीच मौजूद सिनोवियल द्रव, जो हड्डियों को आसानी से चलाने में मदद करता है, थोड़ा गाढ़ा होने लगता है। सामान्य स्थिति में जैसे ही शरीर हरकत में आता है, यह द्रव फिर से सामान्य हो जाता है और जकड़न कम होने लगती है। लेकिन अगर शरीर में सूजन या जोड़ों की बीमारी मौजूद हो, तो यह अकड़न लंबे समय तक बनी रह सकती है। यही वजह है कि कुछ लोगों को सुबह उठने के बाद चलने-फिरने में काफी परेशानी होती है।
मेडिकल रिसर्च के अनुसार, सुबह लंबे समय तक रहने वाली जकड़न रुमेटाइड आर्थराइटिस जैसी बीमारी का संकेत हो सकती है। यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है। इस बीमारी में हाथों और पैरों के जोड़ों में सूजन, गर्माहट और दर्द महसूस हो सकता है। कई मरीजों में सुबह की अकड़न एक घंटे या उससे ज्यादा समय तक बनी रहती है। अगर समय पर इलाज न मिले, तो यह बीमारी जोड़ों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है।
इसके अलावा, ऑस्टियोआर्थराइटिस भी सुबह दर्द और जकड़न का बड़ा कारण माना जाता है। यह बीमारी अधिकतर बढ़ती उम्र में दिखाई देती है। इसमें जोड़ों का कार्टिलेज धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। घुटनों, कूल्हों और रीढ़ की हड्डी में इसका असर ज्यादा देखा जाता है। हालांकि इसमें जकड़न अक्सर कुछ मिनटों में कम हो जाती है, लेकिन लगातार दर्द बने रहना चिंता बढ़ा सकती है।
कुछ मामलों में सुबह की अकड़न फाइब्रोमायल्जिया नाम की समस्या का संकेत भी हो सकता है। इस स्थिति में मांसपेशियों के कुछ हिस्सों पर हल्का दबाव पड़ने पर भी तेज दर्द महसूस होता है। डॉक्टरों का कहना है कि यह समस्या मानसिक तनाव और नींद की खराब गुणवत्ता से भी जुड़ी हो सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि सुबह उठने के बाद हल्की स्ट्रेचिंग करना फायदेमंद हो सकता है। बिस्तर से उठने से पहले हाथ-पैरों को धीरे-धीरे हिलाने से ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है। गर्म पानी से नहाना या हल्की गर्म सिकाई भी मांसपेशियों को आराम देती है। खाने में हल्दी, अदरक, अलसी, अखरोट और विटामिन डी से भरपूर चीजें शामिल करने से सूजन कम करने में मदद मिल सकती है।
--आईएएनएस
पीके/एएस
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
रिपोर्ट: अत्याधिक खाद्य संकट झेलने वाले टॉप 10 देशों में बांग्लादेश शामिल
नई दिल्ली, 29 अप्रैल (आईएएनएस)। ‘2026 ग्लोबल रिपोर्ट ऑन फूड क्राइसिस’ (जीआरएफसी) के अनुसार, वर्ष 2025 में उच्च स्तर की तीव्र खाद्य असुरक्षा का सामना करने वाले लोगों की सबसे बड़ी संख्या वाले शीर्ष 10 देशों में बांग्लादेश भी शामिल है। यह जानकारी ढाका स्थित समाचारपत्र द डेली स्टार में प्रकाशित एक लेख में दी गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश में वर्ष 2025 के अंत तक लगभग 1.6 करोड़ लोग संकट स्तर की खाद्य असुरक्षा या उससे भी बदतर स्थिति का सामना कर रहे थे। यह विश्लेषित आबादी का करीब 17 प्रतिशत हिस्सा है। हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह विश्लेषण देश की कुल आबादी के केवल 59 प्रतिशत हिस्से पर आधारित था, पूरी आबादी पर नहीं।
ढाका विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर डॉ. सलीम रायहान ने अपने लेख में कहा है कि खाद्य असुरक्षा की लगातार बनी रहने वाली स्थिति एक गहरी संरचनात्मक समस्या की ओर इशारा करती है। इसके पीछे कम और अस्थिर आय, कमजोर क्रय शक्ति, क्षेत्रीय असमानता, जलवायु जोखिम, पोषण संबंधी कमजोर परिणाम और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में कमियां जैसी वजहें हैं।
उन्होंने कहा कि कई परिवारों के लिए समस्या यह नहीं है कि बाजार में भोजन उपलब्ध नहीं है, बल्कि यह है कि भोजन उनकी पहुंच से बाहर होता जा रहा है। पौष्टिक आहार महंगा है और लोगों के पास संकट से निपटने के साधन भी खत्म हो चुके हैं।
लेख में कहा गया है कि हाल के वर्षों में बांग्लादेश में खाद्य महंगाई ने परिवारों के व्यवहार को बदल दिया है। कई परिवारों ने प्रोटीन युक्त भोजन कम कर दिया है, सस्ते अनाजों पर निर्भरता बढ़ा दी है, स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च टाल दिया है, अनौपचारिक स्रोतों से कर्ज लिया है और बच्चों की जरूरतों में कटौती की है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जब चावल, खाद्य तेल, दाल, अंडे, मछली और सब्जियां लंबे समय तक महंगी बनी रहती हैं, तो इसका असर पोषण स्तर पर पड़ता है। बच्चे चुपचाप कुपोषण का शिकार होते हैं। महिलाएं अक्सर सबसे अंत में खाना खाती हैं और कम खाती हैं। गरीब परिवारों के बुजुर्ग अनियमित सहायता पर अधिक निर्भर हो जाते हैं।
लेख में यह भी कहा गया है कि वर्ष 2025 में प्रवासी आय (रेमिटेंस) से कुछ राहत जरूर मिली, लेकिन इसे स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। रेमिटेंस का लाभ सभी क्षेत्रों और परिवारों तक समान रूप से नहीं पहुंचता। यह कई परिवारों को सहारा देता है, लेकिन राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा रणनीति का विकल्प नहीं हो सकता।
लेख के अनुसार, बांग्लादेश की खाद्य सुरक्षा चुनौती असमानता का भी सवाल है। देश ने चावल उत्पादन बढ़ाने और मुख्य खाद्यान्न की आपूर्ति बनाए रखने में अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन किया है, लेकिन खाद्य सुरक्षा केवल उपलब्धता का मुद्दा नहीं है; यह पहुंच, पोषण, स्थिरता और सम्मानजनक जीवन से भी जुड़ा विषय है।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि नीति निर्माण का नजरिया “क्या पर्याप्त चावल है?” से बदलकर “क्या गरीब परिवार पूरे साल पौष्टिक भोजन खरीद सकते हैं?” पर केंद्रित होना चाहिए। इसके लिए केवल सामान्य महंगाई दर नहीं, बल्कि खाद्य टोकरी की नियमित निगरानी भी जरूरी है।
--आईएएनएस
डीएससी
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