IATA का दावा, एशिया में सबसे पहले छाएगा विमान ईंधन संकट
ईरान जंग के बीच ‘इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन’ (IATA) का बड़ा दावा सामने आया है. एसोसिएशन के प्रमुख विली वॉल्श ने कहा है कि दुनिया भर के मुसाफिरों के लिए एक गंभीर चेतावनी है. वॉल्श का कहना है कि मध्य पूर्व के संघर्ष के कारण पैदा हुआ ‘जेट फ्यूल’ (विमान ईंधन) का संकट बढ़ रहा है और इसका सबसे पहले असर एशिया में देखने को मिलेगा. इसके बाद यूरोप और अन्य महाद्वीप इसकी जद में आएंगे.
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक विमानन क्षेत्र पर भी साफ दिखाई देने लगा है. International Air Transport Association (IATA) के प्रमुख विली वॉल्श ने चेतावनी दी है कि ‘जेट फ्यूल’ यानी विमान ईंधन का संकट सबसे पहले एशिया को प्रभावित करेगा. यह स्थिति धीरे-धीरे यूरोप और अन्य क्षेत्रों तक भी फैल सकती है.
क्यों गहराया ईंधन संकट?
इस संकट की सबसे बड़ी वजह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जारी तनाव है. यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और ईंधन की सप्लाई होती है. मौजूदा हालात में यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है, जिससे जेट फ्यूल की आपूर्ति बाधित हो गई है.
ईरान-अमेरिका टकराव और क्षेत्रीय अस्थिरता ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ रहा है.
एशिया पर सबसे पहले असर
IATA के मुताबिक, इस संकट का सबसे पहला और गहरा असर एशियाई देशों पर पड़ेगा. वियतनाम और पाकिस्तान जैसे देशों में पहले ही ईंधन की कमी के चलते घरेलू उड़ानों में कटौती शुरू हो चुकी है.
भारत में भी एयरलाइंस ने सरकार से मदद की मांग की है, ताकि ईंधन की आपूर्ति सुचारू बनी रहे और उड़ानों पर असर कम हो.
समर सीजन में बढ़ सकती हैं मुश्किलें
गर्मी की छुट्टियों के दौरान हवाई यात्रा की मांग अपने चरम पर होती है. ऐसे में यदि ईंधन संकट जारी रहता है, तो एयरलाइंस को उड़ानों में कटौती या रद्द करने का फैसला लेना पड़ सकता है. विली वॉल्श ने चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य जल्द नहीं खुला, तो अंतरराष्ट्रीय पर्यटन को बड़ा झटका लग सकता है. इससे यात्रियों की योजनाएं प्रभावित होंगी और एयरलाइन कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.
कोविड जैसे हालात नहीं, लेकिन चिंता बरकरार
हालांकि, IATA प्रमुख ने यह भी स्पष्ट किया कि यह संकट COVID-19 जैसी स्थिति पैदा नहीं करेगा. इसकी वजह यह है कि फिलहाल हवाई यात्रा की मांग मजबूत बनी हुई है और लोग यात्रा करने के लिए तैयार हैं. फिर भी, अगर ईंधन की उपलब्धता में सुधार नहीं हुआ, तो यह स्थिति धीरे-धीरे गंभीर रूप ले सकती है.
मध्य पूर्व का तनाव अब केवल राजनीतिक या सैन्य मुद्दा नहीं रहा, बल्कि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और परिवहन व्यवस्था पर भी दिखने लगा है. विमान ईंधन संकट ने एयरलाइन उद्योग के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस संकट से निपटने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं। फिलहाल यात्रियों और एयरलाइंस दोनों के लिए सतर्क रहने का समय है.
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