केजरीवाल और मनीष सिसोदिया गांधी समाधि पर जाकर हुए नतमस्तक, सत्याग्रह के मार्ग पर डटे रहने की मांगी शक्ति
Delhi News: दिल्ली की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है. आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया मंगलवार को राजघाट पहुंचे. वहां उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर नतमस्तक होकर देश की वर्तमान परिस्थितियों में सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया. इस मौके पर उनके साथ पार्टी के तमाम विधायक और बड़ी संख्या में उत्साहित कार्यकर्ता भी मौजूद थे. राजघाट का माहौल पूरी तरह से भक्ति और संकल्प से भरा नजर आया, जहां नेताओं ने बापू को याद करते हुए उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने की बात कही.
सत्याग्रह के मार्ग पर चलने का संकल्प
अरविंद केजरीवाल ने राजघाट पर मत्था टेकने के बाद कहा कि महात्मा गांधी ने दुनिया को सत्याग्रह की ताकत दिखाई थी. आज जब देश में चुनौतियां बड़ी हैं, तो उन्हें फिर से उसी मार्ग की याद आई है. उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी पूरी टीम बापू के आशीर्वाद से इस कठिन पथ पर पूरी निष्ठा के साथ अडिग रहेगी. केजरीवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी अपनी भावनाओं को साझा करते हुए लिखा कि बापू की प्रार्थना उन्हें हमेशा शक्ति प्रदान करती है. उन्होंने यह विश्वास जताया कि सत्य के रास्ते पर चलते हुए कितनी भी मुश्किलें आएं, वे पीछे नहीं हटेंगे.
न्यायपालिका के प्रति सम्मान
मीडिया से बातचीत के दौरान अरविंद केजरीवाल ने एक महत्वपूर्ण बयान दिया. उन्होंने कहा कि वे देश की न्याय प्रणाली और अदालतों का दिल से सम्मान करते हैं. उन्होंने याद दिलाया कि इसी न्याय व्यवस्था की वजह से आज वे और उनके साथी आजाद हैं और उन्हें जमानत मिली है. हालांकि, उन्होंने यह भी इशारा किया कि कुछ ऐसी असाधारण परिस्थितियां बन गई हैं, जिनके कारण उन्हें सत्याग्रह जैसा बड़ा कदम उठाना पड़ रहा है. केजरीवाल ने बताया कि उन्होंने अपनी बात और चिंताओं को एक पत्र के माध्यम से जज साहिबा तक भी पहुंचा दिया है, जिसमें विस्तार से सारी बातों का जिक्र किया गया है.
मनीष सिसोदिया ने दिखाई अटूट निष्ठा
दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भी इस अवसर पर बापू को याद किया. उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी ने हमेशा सिखाया कि सत्य के लिए आत्मबल की जरूरत होती है. सिसोदिया ने बताया कि राजघाट आकर उनका संकल्प और भी मजबूत हुआ है. उन्होंने कहा कि आज के समय में सत्य की राह पर चलना आसान नहीं है, लेकिन बापू की प्रेरणा उन्हें हर बाधा से लड़ने की हिम्मत देती है. उनके अनुसार, यह सत्याग्रह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने की एक बड़ी कोशिश है.
कार्यकर्ताओं में दिखा भारी उत्साह
राजघाट पर मौजूद आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं में भारी जोश देखने को मिला. कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी करते हुए अपने नेताओं का समर्थन किया. पार्टी के नेताओं का मानना है कि गांधी जी के दिखाए रास्ते पर चलकर ही वे मौजूदा राजनीतिक चुनौतियों का मुकाबला कर सकते हैं. पूरी पार्टी ने एक सुर में यह संदेश देने की कोशिश की कि वे किसी भी दबाव में झुकने वाले नहीं हैं. इस यात्रा के माध्यम से आम आदमी पार्टी ने जनता को यह बताने का प्रयास किया है कि उनकी राजनीति गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित है और वे न्याय के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेंगे.
राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज
केजरीवाल और सिसोदिया की इस राजघाट यात्रा को आगामी चुनावों और मौजूदा कानूनी विवादों के संदर्भ में काफी अहम माना जा रहा है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आप नेतृत्व एक बार फिर से 'सत्याग्रह' के जरिए जनता की सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहा है. बापू की समाधि पर जाकर संकल्प लेना यह दर्शाता है कि पार्टी अब अपनी लड़ाई को जमीन पर और भी आक्रामक तरीके से लड़ने की योजना बना रही है. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सत्याग्रह का यह मार्ग दिल्ली की राजनीति में क्या नया मोड़ लेकर आता है.
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पाकिस्तान पस्त : मध्य पूर्व तनाव और होर्मुज स्ट्रेट संकट से खाद की किल्लत से सरकार परेशान
नई दिल्ली, 28 अप्रैल (आईएएनएस)। मध्य पूर्व में चल रहे तनाव के बीच पाकिस्तान खाद संकट का सामना कर रहा है, जिससे उसकी कृषि अर्थव्यवस्था की बड़ी कमजोरियां सामने आ रही हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से वैश्विक उर्वरक बाजारों में बड़ा झटका लगा है। इसके चलते यूरिया की कीमतें एक महीने से भी कम समय में लगभग 47 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं।
डेली मिरर की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि वह यूरिया उत्पादन में लगभग आत्मनिर्भर है, लेकिन इस भू-राजनीतिक संकट ने यह दिखा दिया है कि वह फॉस्फेट आधारित उर्वरकों, खासकर डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है।
यह असंतुलन इस बात को दिखाता है कि कई वर्षों की नीतियों ने एक तरफ यूरिया उत्पादन को मजबूत किया, लेकिन दूसरी तरफ डीएपी जैसे उर्वरकों की आपूर्ति को कमजोर छोड़ दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की उर्वरक नीति लंबे समय से घरेलू उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस पर सब्सिडी देने पर केंद्रित रही है, जिससे देश में यूरिया का बड़ा उत्पादन हो सका। इसी वजह से पाकिस्तान अपनी नाइट्रोजन आधारित उर्वरक की जरूरत ज्यादातर देश में ही पूरी कर लेता है। लेकिन, फॉस्फेट उर्वरकों को लेकर ऐसी कोई मजबूत नीति नहीं बनाई गई, जिसके कारण डीएपी पूरी तरह आयात पर निर्भर हो गया।
डीएपी पाकिस्तान की कुल उर्वरक खपत का लगभग 15-18 प्रतिशत हिस्सा है और यह गेहूं, चावल और कपास जैसी प्रमुख फसलों के लिए बहुत जरूरी है।
यूरिया के विपरीत, डीएपी बनाने के लिए रॉक फॉस्फेट की जरूरत होती है, जो पाकिस्तान में मौजूद नहीं है। देश में इसका उत्पादन बहुत सीमित है और यह मुख्य रूप से फौजी फर्टिलाइजर कंपनी के एक ही प्लांट (पोर्ट कासिम) में होता है, जो सालाना करीब 8 लाख टन उत्पादन करता है। जबकि देश की कुल मांग 13 लाख से 23 लाख टन के बीच रहती है।
अब यह आपूर्ति की कमी अंतरराष्ट्रीय हालात से और बढ़ गई है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत फॉस्फेट व्यापार होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है और इसके बंद होने से सप्लाई रुक गई है, जिससे डीएपी की कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं।
पाकिस्तान अपनी लगभग आधी जरूरत मध्य पूर्व से आयात करता है। इसलिए वहां की रुकावट का सीधा असर देश पर पड़ा है। इससे उर्वरक की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी दोनों हो गई हैं।
इसका असर अब खेतों तक दिखने लगा है। रबी सीजन (अक्टूबर से जनवरी) में डीएपी की बिक्री 23 प्रतिशत गिर गई है, क्योंकि इसकी कीमत बढ़कर लगभग 14,000 रुपए प्रति 50 किलो बैग तक पहुंच गई है।
महंगे दामों के कारण कई किसान डीएपी का इस्तेमाल कम कर रहे हैं या उसकी जगह यूरिया का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह तरीका खेती के लिए सही नहीं है और इससे फसल को नुकसान हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट सिर्फ बाहरी हालात की वजह से नहीं है, बल्कि यह कई वर्षों की नीतिगत गलतियों का भी नतीजा है।
रिपोर्ट के अनुसार, सरकार हर साल उर्वरक कंपनियों को गैस सब्सिडी के तौर पर 200 अरब रुपए से ज्यादा देती रही, लेकिन फॉस्फेट उत्पादन बढ़ाने या वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था बनाने पर ध्यान नहीं दिया गया।
आलोचकों का कहना है कि इस सब्सिडी से उद्योग को फायदा तो हुआ, लेकिन उर्वरक आपूर्ति की मूल कमजोरी को दूर नहीं किया गया।
--आईएएनएस
एवाई/एबीएम
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